असातीजाः (उस्ताद) को तब्लीग और बातिल फ़िरक़ों के रद्द में जाने की छुट्टी देना १५९८

अरबी मदारिस और मकातिब के असातीजाः (उस्ताद) को तब्लीगी जमा’त में जाने के लिए माहना (मंथली) तीन दिन या सालाना (इयरली) एक चिल्लाह या ज़िन्दगी के चार महीने या एक साल की छुट्टी तनखाह के साथ दी जा सकती है या नहीं?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

अगर ज़रूरत हो तो दी जा सकती है. ता’अलीम का मक़सूद दीन की इशाअत है, आखिर मद्रसह वाले मद्रसह के पैसे से रिसालाह भी निकालते हैं, मद्रसह के पैसे से वाअज़ (बयान) के लिए भी भेजते हैं, जलसों में शिरकत के लिए भी भेजते हैं, यह सब के सब ता’अलीम के मक़ासिद हैं, अगर वहाँ के लोग इस सफर को मुनासिब समझते हैं और उसकी ज़रूरत भी है तो वहाँ (जमा’त, तरबियती कैम्प में तन्खा के साथ छुट्टी) कर सकते हैं.

(हक़ीक़त-ए-तब्लीग सफा ११०)

हज़रत सैय्यद मुफ़्ती अब्दुर रहीम लाजपुरी रहमतुल्लाह अलैहि लिखते हैं के ; मदारिस वाले मुदर्रिस (उस्ताज़) बढ़ाये. मद्रसह की ईमारत में काफी से ज़ाइद पैसे खर्च कर देते हैं. हाला के मद्रसह की ईमारत मक़सूद बिज़ ज़ात नहीं,  मक़सूद ए असली ता’अलीम है, फिर असातिज़ा के इज़ाफ़े और उनकी तनख्वाहों (सैलरी) के इज़ाफ़े में कोताही क्यों की जाए ?

खुलासा : यह है के ता’अलीमी काम के साथ तब्लीग में मशगुली भी होनी चाहिए, दीनी अंजुम (कमीटी) तब्लीगी काम की ज़िम्मेदारी से सुबुक दोष (बरी) नहीं हो सकते, लिहाज़ा ता’अलीम के साथ तब्लीग में भी दिलचस्पी लें और मुदर्रिसीन को जारी वज़ीफ़े (तनख्वाह) के साथ तब्लीगी काम के लिए इजाज़त दें.

शैखुल इस्लाम हज़रत मदनी रहमतुल्लाह अलैहि का मलफ़ूज़ इसी क़िस्म के एक सवाल के जवाब में तहरीर फरमाते हैं के ; मुझ को यह मालूम हुवा है के ब’आज मिम्बराने शूरा को उन मुदर्रिसीन की तनख्वाहों के जारी (चालू) रखने के मुताल्लिक़ ऐतराज और शुबहात हैं. मुसलमानो के इदारे ता’लीमिययह सिर्फ ता’अलीमी खिदमत अंजाम देने के लिए नहीं बनाये गए, बल्कि मुसलमानो की मज़हबी और दीनी और दूसरी ज़रूरी खिदमत भी उनके फ़राइज़ में से हैं. यही वजह है के जंग ए रूम और रूस के ज़माने में हज़रत नानौतवी रहमतुल्लाह अलैहि ने दौरे किये और एक अज़ीमुषशान मिक़्दार चंदे की जमा करके तूर्की को भेजी, उस ज़माने में दारुल उलूम देवबंद में छुट्टी रही. (ता’अलीम बंध रही) और तनख्वाहें दी गई.

शुद्धि और संगठन वगैरह की नहूसत के ज़माने में मालिकाना राजपूतों वगैरह इलाक़े में मुदर्रिसीन और उलमा के वुफूद (जमा’तें) भेजी गयी और उनकी तनख्वाहें जारी रखी गयी.

(फतावा रहीमियह जदीद जिल्द ४ सफा १४५ किताबुल इल्म व उलमा)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२७ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

उतराण (उत्तरायण मकर सक्रांति) के दिन खाना बेचना १६०५

ख़ास उतराण (पतंग के गैरों तहवार) के दिन मस्जिदे और मदरसह की आमदनी के लिए खाना बेचना और उन पैसों को मस्जिद मद्रसह में इस्तेमाल करना कैसा है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

उतराण के दिन का खाना बेचा जायेगा तो इस में खरीदार हर क़िस्म के लोग होंगे, तेहवार मनाने वाले भी होंगे और तेहवार न मनाने वाले भी होंगे. रही बात यह के उस खाने को खा कर पतंग उड़ाना गाना सुनना वगैरह गुनाहों के काम करेंगे,  तो यह उनके अपने अमल हैं, खाना बेचने वाले इसके ज़िम्मेदार नहीं हैं, इसलिए उस दिन खाना बेचने को न-जाइज़ या हराम नहीं कहेंगे.

फिर भी उसी दिन खाना बेचने में उनकी उस दिन की ज़ियाफ़तों-पार्टियों (जो खुराफात से भरी होती हैं) की हौसला अफ़ज़ाई होती है, और उनकी रौनक में इज़ाफ़ा होता है, और पैसों को दीनी काम में इस्तेमाल करना है, लिहाज़ा उस दिन इन लोगों को टारगेट बनाकर खाना बेचना इमानि हमिययत और गैरत के खिलाफ है, लिहाज़ा इस से परहेज़ करना बेहतर है.

(फतावा रहीमियः ९/१९५ करांची से माखूज़)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०४ जमादि उल अव्वल १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

कैश बेक लेने का हुक्म १६२१

कोई भी कार्ड से पेमेंट कर के ऑनलाइन मोबाइल वगैरह खरीदने  के बाद, या बिजली का बिल, मोबाइल रिचार्ज करने के बाद, ऑफर में कैश बेक कुछ फीसद-टका पैसा वापस आता है।

क्या वो जाइज़ है या नहीं ?

कया उसको डिस्काउंट की तरह गिना जा सकता है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

अगर ये कैश बेक सभी- स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया वगैरह बैंक के डेबिट कार्ड ईस्तिअमाल करने पर मिलता है तो ये खरीदार को शोक पैदा करने और उभारने के लिए एक तरह का इनाम और बख्शिश है। ताके उन का ऑनलाइन ट्रान्जेशन ज़यादा हो, ये भी जाइज़ है।

अगर ये कैश बेक बैंक ने ही खुद खोल रखा है, जैसे के पेटीएम, इजी पैसा, एम-पैसा कंपनी देती है तो जाइज़ है, क्यूँ के बेचनेवाले को क़ीमत कम लेने का भी इख़्तियार होता है लिहाज़ा ये शकल भी जाइज़ है।

(कदूरि किताबुल बूयुअ सफा १२

मुवासतूल फिकहिययह अल कुवेतिययह से माखूज़)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२१ जुमाद अल उला १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

तसदीक़ :मुफ़्ती जुनैद पालनपुरी जोगेश्वरी मुंबई

 

पतंग कट गई तो उस का मालिक कोन १६०८

पतंग कट गई और मेरे घर  टेरेस (छत) पर गिरी, अब इस का मालिक कोन ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

पतंग उड़ाना शरई एतेबार से तो ना-जाइज़ हे, लेकिन अगर कोई शख्स पतंग उडाता हे और उसकी पतंग कट जाये और दूसरे आदमी को मिले या लूट लेवे तो उस का मालिक नहीं बन जाता, बल्कि शरई एतेबार से उसके मालिक को लौटाना ज़रूरी हे,

अगर मालिक न मिले तो फाड़ देना ज़रूरी हे. क्यूंकि कट जाने से वो उसकी मलिकी से नहीं निकलेगा.

मुस्तफ़द

फतवा कास्मियाह: २४/३६४, ३६५

(मुफ़्ती) बन्दे इलाही कुरैशी गणदेवी

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०७ जुमाद अल उला १४४० हिजरी

तस्दीक

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

ब्लड (खून) देकर गिफ्ट (हदीया) लेना १६९३

ब्लड कैंप में जो हज़रात ब्लड देते है या ख़िदमत करते है उन को ज़िम्मेदारों की तरफ से गिफ्ट दी जाती है, तो उस गिफ्ट का लेना किस के लिए जाइज़ और किस के लिए नाजाइज़ है ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

ब्लड को बेचना यानि उस का कोई एवज़-बदला लेना हराम है। लिहाज़ा जिन लोगों ने खून दिया है उन को गिफ्ट लेना जाइज़ नहीं।

हां, जिन हज़रात ने खून नहीं दिया है, बल्के कैंप को क़ामयाब बनाने के लिए ख़िदमत दी है, या कैंप में किसी मेहमान को बुलाया हो उन के लिए गिफ्ट लेना जाइज़ है।

(निजामुल फ़तावा जिल्द १ सफा ३५६ से माखूज़)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
०४~शा’बान~अल~मुअज़्ज़म~१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

वोट किसे देना चाहिए १७००

वोट किस को देना चाहिए ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हज़रत मुफ़्ती महमूद हसन गंगोही रहमतुल्लाह खलीफा ए हज़रत शैख़ ज़करिया रह. के खलीफा लिखते है के:
इस जम्हूरी सेक्युलर बिन सांप्रदायिक मुल्क में वोट इस्लाम और कुफ्र की बुन्याद पर नहीं दिए जाते, बलके जिस शख्स के मुताल्लिक़ ये उम्मीद हो के वह तमामिन्नास की खिदमत करेगा पहुंचाएगा दिलवाएगा ज़ुल्म रोकेगा (हमारे इमान और शरीअत पर हमला नहीं करेगा, अगर दुनयावी तरक़्क़ी ज़यादा नहीं कराएगा) उस को वोट देना चाहिए ।

(अपक्ष और छोटी छोटी पार्टियां जो जित ही न सके उन को वोट देकर अपना वोट जाये न करे)

(मौजूदा हालात मुसलमानों को आपस मे हिम्मत अफ़ज़ाइ करने की नही है, किसी मज़बूत एक ही पार्टी को पूरा इलाका वोट दे, इस बात का खास ख्याल रखे के हमारे वोट किसी भी तरह तक़सीम ना हो जाये)

फतावा दीनिययह ३/३७५ से माखूज़.

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
१२~शा’बान~अल~मुअज़्ज़म~१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

वोटिंग की शरई हैसियत, सही उम्मीदवार ना हो तो १६९९

वोट देने की शरई हैसियत क्या है??

बासलाहियात और ईमानदार उम्मीदवार ना हो तो वोट देना चाहिये या नहीं,??

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हज़रात मुफ़्ती मुहमद शफी रहमतुल्लाह अलैहि लिखते है जिस का खुलासा है कि वोट की शरई हैसियत 3 है,

1- वकालत :- जिस उम्मीदवार को हम वोट दे रहे हैं हम उसे अपना वकील नायाब बना रहे हैं ,की फलां हमारे ज़रूरत और खिदमत,
आप हमारे जानिब से अंजाम दे देना,

2- शहादत:- हम इस बात की गवाही देते हैं कि फलां शख्स फलां ओहदे और मनसब के लायक है और खिदमत की सलाहियत रखने वाला और अमानतदार है,

3- सिफारिश:- अपने बड़े हाकिम गवर्नर को ये दरखास्त करने के इस शख्श को फलां ओहदा ओर मनसब दे दिया जाये तो बेहतर होगा,,

लिहाज़ा जो उम्मीदवार दुसरे उम्मीदवारों के मुकाबले इन हैसियतों की ऐहलियात- सलाहियत रखता हो उस को वोट देना वाजिब है,

ऐसे उम्मीदवार जिसमे ओहदे की ऐहलियात और सलाहियत दूसरों के मुकाबले में न हो या कम हो उस को सिर्फ रिश्तेदारी दोस्ती, क़ौमियात की बुनियाद पर वोट देना गुनाह है

और वोट ही ना देना गवाही छुपाने के जैसा है,
और अगर ज़ालिम हाकिम मुसल्लत हो गया तो ये ना देने वाले गैर लायक़ को देने वाले भी उस के जीताने में शरीक शुमार होंगे,उसके गुनाह और ज़ुल्म का वबाल उन पर भी होगा,

लिहाज़ा हर मुसलमान मर्द और औरत को सहीह उम्मीदवार ना हो तो भी अपना नुकसान कम करने की निय्यत से भी वोट देना शरअन ज़रूरी है

जवाहिरुल फ़िक़ह से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
११~शा’बान~अल~मुअज़्ज़म~१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

शादी में तोहफे के लेन देन की खराबियां १६००

शादी में खाने के बाद पैसे का कवर, नयोता, हदया, वेहवार देना कैसा है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

फकीहुल असर हज़रत मुफ्ती रशीद लुधयानी रहमतुल्लाहि अलय्हि तहरीर फ़रमाते है : ऐसे न्यौते में चंद खराबियाँ है।

१।

ये हदया (वेहवार ,चांदला) की रक़म या सामान ज़बर्दस्ती वसूल किया जाता है, इस तौर पर के न देनेवालों बुरा कहा जाता है।

(आजकल तो निकलने के रस्ते पर टेबल ही लगा दिया जाता और नाम लिखे जाते है, इसलिए आदमी शरमा शरमी में न देने का इरादा हो तो भी दे देता है, शर्म में डालकर दिली रज़ामंदी के बगैर वसूल करना भी जाइज़ नहीं)

२।

देनेवाली की निय्यत शोहरत और नाम कमाने की होती है, ऐसी निय्यत से जाइज़ काम भी ना जाइज़ हो जाते है।

३।

उस रस्म को फ़र्ज़ और वाज़िब की तरह पाबन्दी और एहतेमाम से अदा किया जाता है

(हैसिय्यत या इरादा न हो तो भी देते है)

हालां के इस क़िस्म की पाबन्दी और ज़रूरी समझने से जाइज़ और मुस्तहब  काम को भी छोड़ देना वाज़िब हो जाता है।

४।

ये रक़म और सामान बा क़ायदा लिखा जाता है, जिन का मोके पर अदा करना ज़रूरी समझा जाता है, और सख्त ज़रूरत के बगैर क़र्ज़ का लेन दैन ना जाइज़ है।

क़र्ज़ होने की सूरत में उस की आदायगी ,मौत होने की सुरत में उस में विरासत की तक़सीम उस का ईस्तिअमाल और इन्तिक़ाल के बाद आइन्दह ये क़र्ज़ा किस को अदा किया जाये इस के बहुत से पेचीदह मसाइल खड़े हो जाते है, जो मुफ़्तियाँन व उलेमा ए किराम से मालूम किये जा सकते है।

लिहाज़ा ये लैन दैन नाजाइज़ है।

(अहसनुल फ़तावा ५/१४८ से माखूज़)

و اللہ اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२९ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.