aaj ka sawal hindi

अरबी मदारिस और मकातिब के असातीजाः (उस्ताद) को तब्लीगी जमा’त में जाने के लिए माहना (मंथली) तीन दिन या सालाना (इयरली) एक चिल्लाह या ज़िन्दगी के चार महीने या एक साल की छुट्टी तनखाह के साथ दी जा सकती है या नहीं?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

अगर ज़रूरत हो तो दी जा सकती है. ता’अलीम का मक़सूद दीन की इशाअत है, आखिर मद्रसह वाले मद्रसह के पैसे से रिसालाह भी निकालते हैं, मद्रसह के पैसे से वाअज़ (बयान) के लिए भी भेजते हैं, जलसों में शिरकत के लिए भी भेजते हैं, यह सब के सब ता’अलीम के मक़ासिद हैं, अगर वहाँ के लोग इस सफर को मुनासिब समझते हैं और उसकी ज़रूरत भी है तो वहाँ (जमा’त, तरबियती कैम्प में तन्खा के साथ छुट्टी) कर सकते हैं.

(हक़ीक़त-ए-तब्लीग सफा ११०)

हज़रत सैय्यद मुफ़्ती अब्दुर रहीम लाजपुरी रहमतुल्लाह अलैहि लिखते हैं के ; मदारिस वाले मुदर्रिस (उस्ताज़) बढ़ाये. मद्रसह की ईमारत में काफी से ज़ाइद पैसे खर्च कर देते हैं. हाला के मद्रसह की ईमारत मक़सूद बिज़ ज़ात नहीं,  मक़सूद ए असली ता’अलीम है, फिर असातिज़ा के इज़ाफ़े और उनकी तनख्वाहों (सैलरी) के इज़ाफ़े में कोताही क्यों की जाए ?

खुलासा : यह है के ता’अलीमी काम के साथ तब्लीग में मशगुली भी होनी चाहिए, दीनी अंजुम (कमीटी) तब्लीगी काम की ज़िम्मेदारी से सुबुक दोष (बरी) नहीं हो सकते, लिहाज़ा ता’अलीम के साथ तब्लीग में भी दिलचस्पी लें और मुदर्रिसीन को जारी वज़ीफ़े (तनख्वाह) के साथ तब्लीगी काम के लिए इजाज़त दें.

शैखुल इस्लाम हज़रत मदनी रहमतुल्लाह अलैहि का मलफ़ूज़ इसी क़िस्म के एक सवाल के जवाब में तहरीर फरमाते हैं के ; मुझ को यह मालूम हुवा है के ब’आज मिम्बराने शूरा को उन मुदर्रिसीन की तनख्वाहों के जारी (चालू) रखने के मुताल्लिक़ ऐतराज और शुबहात हैं. मुसलमानो के इदारे ता’लीमिययह सिर्फ ता’अलीमी खिदमत अंजाम देने के लिए नहीं बनाये गए, बल्कि मुसलमानो की मज़हबी और दीनी और दूसरी ज़रूरी खिदमत भी उनके फ़राइज़ में से हैं. यही वजह है के जंग ए रूम और रूस के ज़माने में हज़रत नानौतवी रहमतुल्लाह अलैहि ने दौरे किये और एक अज़ीमुषशान मिक़्दार चंदे की जमा करके तूर्की को भेजी, उस ज़माने में दारुल उलूम देवबंद में छुट्टी रही. (ता’अलीम बंध रही) और तनख्वाहें दी गई.

शुद्धि और संगठन वगैरह की नहूसत के ज़माने में मालिकाना राजपूतों वगैरह इलाक़े में मुदर्रिसीन और उलमा के वुफूद (जमा’तें) भेजी गयी और उनकी तनख्वाहें जारी रखी गयी.

(फतावा रहीमियह जदीद जिल्द ४ सफा १४५ किताबुल इल्म व उलमा)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२७ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

ख़ास उतराण (पतंग के गैरों तहवार) के दिन मस्जिदे और मदरसह की आमदनी के लिए खाना बेचना और उन पैसों को मस्जिद मद्रसह में इस्तेमाल करना कैसा है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

उतराण के दिन का खाना बेचा जायेगा तो इस में खरीदार हर क़िस्म के लोग होंगे, तेहवार मनाने वाले भी होंगे और तेहवार न मनाने वाले भी होंगे. रही बात यह के उस खाने को खा कर पतंग उड़ाना गाना सुनना वगैरह गुनाहों के काम करेंगे,  तो यह उनके अपने अमल हैं, खाना बेचने वाले इसके ज़िम्मेदार नहीं हैं, इसलिए उस दिन खाना बेचने को न-जाइज़ या हराम नहीं कहेंगे.

फिर भी उसी दिन खाना बेचने में उनकी उस दिन की ज़ियाफ़तों-पार्टियों (जो खुराफात से भरी होती हैं) की हौसला अफ़ज़ाई होती है, और उनकी रौनक में इज़ाफ़ा होता है, और पैसों को दीनी काम में इस्तेमाल करना है, लिहाज़ा उस दिन इन लोगों को टारगेट बनाकर खाना बेचना इमानि हमिययत और गैरत के खिलाफ है, लिहाज़ा इस से परहेज़ करना बेहतर है.

(फतावा रहीमियः ९/१९५ करांची से माखूज़)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०४ जमादि उल अव्वल १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

कोई भी कार्ड से पेमेंट कर के ऑनलाइन मोबाइल वगैरह खरीदने  के बाद, या बिजली का बिल, मोबाइल रिचार्ज करने के बाद, ऑफर में कैश बेक कुछ फीसद-टका पैसा वापस आता है।

क्या वो जाइज़ है या नहीं ?

कया उसको डिस्काउंट की तरह गिना जा सकता है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

अगर ये कैश बेक सभी- स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया वगैरह बैंक के डेबिट कार्ड ईस्तिअमाल करने पर मिलता है तो ये खरीदार को शोक पैदा करने और उभारने के लिए एक तरह का इनाम और बख्शिश है। ताके उन का ऑनलाइन ट्रान्जेशन ज़यादा हो, ये भी जाइज़ है।

अगर ये कैश बेक बैंक ने ही खुद खोल रखा है, जैसे के पेटीएम, इजी पैसा, एम-पैसा कंपनी देती है तो जाइज़ है, क्यूँ के बेचनेवाले को क़ीमत कम लेने का भी इख़्तियार होता है लिहाज़ा ये शकल भी जाइज़ है।

(कदूरि किताबुल बूयुअ सफा १२

मुवासतूल फिकहिययह अल कुवेतिययह से माखूज़)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२१ जुमाद अल उला १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

तसदीक़ :मुफ़्ती जुनैद पालनपुरी जोगेश्वरी मुंबई

 

पतंग कट गई और मेरे घर  टेरेस (छत) पर गिरी, अब इस का मालिक कोन ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

पतंग उड़ाना शरई एतेबार से तो ना-जाइज़ हे, लेकिन अगर कोई शख्स पतंग उडाता हे और उसकी पतंग कट जाये और दूसरे आदमी को मिले या लूट लेवे तो उस का मालिक नहीं बन जाता, बल्कि शरई एतेबार से उसके मालिक को लौटाना ज़रूरी हे,

अगर मालिक न मिले तो फाड़ देना ज़रूरी हे. क्यूंकि कट जाने से वो उसकी मलिकी से नहीं निकलेगा.

मुस्तफ़द

फतवा कास्मियाह: २४/३६४, ३६५

(मुफ़्ती) बन्दे इलाही कुरैशी गणदेवी

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०७ जुमाद अल उला १४४० हिजरी

तस्दीक

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

ब्लड कैंप में जो हज़रात ब्लड देते है या ख़िदमत करते है उन को ज़िम्मेदारों की तरफ से गिफ्ट दी जाती है, तो उस गिफ्ट का लेना किस के लिए जाइज़ और किस के लिए नाजाइज़ है ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

ब्लड को बेचना यानि उस का कोई एवज़-बदला लेना हराम है। लिहाज़ा जिन लोगों ने खून दिया है उन को गिफ्ट लेना जाइज़ नहीं।

हां, जिन हज़रात ने खून नहीं दिया है, बल्के कैंप को क़ामयाब बनाने के लिए ख़िदमत दी है, या कैंप में किसी मेहमान को बुलाया हो उन के लिए गिफ्ट लेना जाइज़ है।

(निजामुल फ़तावा जिल्द १ सफा ३५६ से माखूज़)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
०४शा’बानअलमुअज़्ज़म१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

 

वोट किस को देना चाहिए ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हज़रत मुफ़्ती महमूद हसन गंगोही रहमतुल्लाह खलीफा ए हज़रत शैख़ ज़करिया रह. के खलीफा लिखते है के:
इस जम्हूरी सेक्युलर बिन सांप्रदायिक मुल्क में वोट इस्लाम और कुफ्र की बुन्याद पर नहीं दिए जाते, बलके जिस शख्स के मुताल्लिक़ ये उम्मीद हो के वह तमामिन्नास की खिदमत करेगा पहुंचाएगा दिलवाएगा ज़ुल्म रोकेगा (हमारे इमान और शरीअत पर हमला नहीं करेगा, अगर दुनयावी तरक़्क़ी ज़यादा नहीं कराएगा) उस को वोट देना चाहिए ।

(अपक्ष और छोटी छोटी पार्टियां जो जित ही न सके उन को वोट देकर अपना वोट जाये न करे)

(मौजूदा हालात मुसलमानों को आपस मे हिम्मत अफ़ज़ाइ करने की नही है, किसी मज़बूत एक ही पार्टी को पूरा इलाका वोट दे, इस बात का खास ख्याल रखे के हमारे वोट किसी भी तरह तक़सीम ना हो जाये)

फतावा दीनिययह ३/३७५ से माखूज़.

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
१२शा’बानअलमुअज़्ज़म१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

वोट देने की शरई हैसियत क्या है??

बासलाहियात और ईमानदार उम्मीदवार ना हो तो वोट देना चाहिये या नहीं,??

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हज़रात मुफ़्ती मुहमद शफी रहमतुल्लाह अलैहि लिखते है जिस का खुलासा है कि वोट की शरई हैसियत 3 है,

1- वकालत :- जिस उम्मीदवार को हम वोट दे रहे हैं हम उसे अपना वकील नायाब बना रहे हैं ,की फलां हमारे ज़रूरत और खिदमत,
आप हमारे जानिब से अंजाम दे देना,

2- शहादत:- हम इस बात की गवाही देते हैं कि फलां शख्स फलां ओहदे और मनसब के लायक है और खिदमत की सलाहियत रखने वाला और अमानतदार है,

3- सिफारिश:- अपने बड़े हाकिम गवर्नर को ये दरखास्त करने के इस शख्श को फलां ओहदा ओर मनसब दे दिया जाये तो बेहतर होगा,,

लिहाज़ा जो उम्मीदवार दुसरे उम्मीदवारों के मुकाबले इन हैसियतों की ऐहलियात- सलाहियत रखता हो उस को वोट देना वाजिब है,

ऐसे उम्मीदवार जिसमे ओहदे की ऐहलियात और सलाहियत दूसरों के मुकाबले में न हो या कम हो उस को सिर्फ रिश्तेदारी दोस्ती, क़ौमियात की बुनियाद पर वोट देना गुनाह है

और वोट ही ना देना गवाही छुपाने के जैसा है,
और अगर ज़ालिम हाकिम मुसल्लत हो गया तो ये ना देने वाले गैर लायक़ को देने वाले भी उस के जीताने में शरीक शुमार होंगे,उसके गुनाह और ज़ुल्म का वबाल उन पर भी होगा,

लिहाज़ा हर मुसलमान मर्द और औरत को सहीह उम्मीदवार ना हो तो भी अपना नुकसान कम करने की निय्यत से भी वोट देना शरअन ज़रूरी है

जवाहिरुल फ़िक़ह से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
११शा’बानअलमुअज़्ज़म१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

 

 

शादी में खाने के बाद पैसे का कवर, नयोता, हदया, वेहवार देना कैसा है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

फकीहुल असर हज़रत मुफ्ती रशीद लुधयानी रहमतुल्लाहि अलय्हि तहरीर फ़रमाते है : ऐसे न्यौते में चंद खराबियाँ है।

१।

ये हदया (वेहवार ,चांदला) की रक़म या सामान ज़बर्दस्ती वसूल किया जाता है, इस तौर पर के न देनेवालों बुरा कहा जाता है।

(आजकल तो निकलने के रस्ते पर टेबल ही लगा दिया जाता और नाम लिखे जाते है, इसलिए आदमी शरमा शरमी में न देने का इरादा हो तो भी दे देता है, शर्म में डालकर दिली रज़ामंदी के बगैर वसूल करना भी जाइज़ नहीं)

२।

देनेवाली की निय्यत शोहरत और नाम कमाने की होती है, ऐसी निय्यत से जाइज़ काम भी ना जाइज़ हो जाते है।

३।

उस रस्म को फ़र्ज़ और वाज़िब की तरह पाबन्दी और एहतेमाम से अदा किया जाता है

(हैसिय्यत या इरादा न हो तो भी देते है)

हालां के इस क़िस्म की पाबन्दी और ज़रूरी समझने से जाइज़ और मुस्तहब  काम को भी छोड़ देना वाज़िब हो जाता है।

४।

ये रक़म और सामान बा क़ायदा लिखा जाता है, जिन का मोके पर अदा करना ज़रूरी समझा जाता है, और सख्त ज़रूरत के बगैर क़र्ज़ का लेन दैन ना जाइज़ है।

क़र्ज़ होने की सूरत में उस की आदायगी ,मौत होने की सुरत में उस में विरासत की तक़सीम उस का ईस्तिअमाल और इन्तिक़ाल के बाद आइन्दह ये क़र्ज़ा किस को अदा किया जाये इस के बहुत से पेचीदह मसाइल खड़े हो जाते है, जो मुफ़्तियाँन व उलेमा ए किराम से मालूम किये जा सकते है।

लिहाज़ा ये लैन दैन नाजाइज़ है।

(अहसनुल फ़तावा ५/१४८ से माखूज़)

و اللہ اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२९ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २५७९⭕

आज कल गाडी की ज़रुरत हो तो गाडी की कीमत से कम पैसा देने ;पर गाड़ी मिलती है,
मसलन ३०००० रुपये दो तो ;५०००० या ६०००० वाली गाडी इस्तेमाल के लिए मिलती है ,
जितने महीने इस्तेमाल करनी हो इस्तिमाल कर के वापस देना शर्त होता है .
जब वापस देने जाना हो तो अगर गाड़ी में कुछ खराबी पैदा हुई है तो उसे रिपेरिंग करवा कर उसी हालात पर गाडी वापस देना शर्त होता है.
शर्त के मुवाफ़िक़ गाडी लौटाई जाये तो गाडी वाला उस गाडी की दी हुई कीमत मसलन ३०००० पूरी देता है वरना रिपेरिंग खर्च काट लेता है तो इस तरह गाड़ी खरीदना जाइज़ है ?

अगर जाइज़ ना हो तो जाइज़ होने की सूरत बताने की गुज़ारिश, क्यों के बहोत से लोग ऐसा कर रहे है. इसे लोग रहन पर गाड़ी लेना कहते है.

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

वापस करने की शर्त के साथ गाडी खरीदना और बेचना जाइज़ नहीं.
कोई चीज़ खरीदने के बाद खरीदने वाला उसका मालिक बन जाता है, इसलिए उस पर वापसी की शर्त लगाने से मुआमला फ़ासिद – ख़राब और ना जाइज़ हो जाता है.

दुसरी खराबी इस में ये है के गाडी के पैसे (कीमत) दी है वह उधार – क़र्ज़ के हुकम में है, पैसे उधार देकर गाड़ी से नफा उठाना सूद कहलायेगा. जो बड़ा ही सख्त गुनाह है.

इस के जवाज़ की शक्ल ये है के वापस करने की शर्त गाडी देते वक़्त न लगाई जाये बल्कि जितनी कीमत देकर गाड़ी देनी हो उतनी कीमत लेकर उसे गाड़ी बेच दी जाये. शरीअत में ज़बानी बेच देना काफी है. बेचने को लिख कर देना ज़रूरी नहीं, बेचने के बाद उस से वादह लिया जाये के गाडी हम को ही वापस देना तुम्हारी पूरी कीमत हम तुम को गाड़ी असली हालात ;पर लौटाने की सूरत में वापस कर देंगे.
खरीदार का गाडी वापस करना अख़लाक़ी फ़रीज़ा कहलायेगा .

📗फतावा महमूदिया दाभेल १६ / २५५ बा हवाला
📘 रद्दुल मुहतर ५ /२७६

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर – २५८०⭕

हमारा  जूते और तोलिये का कारोबार है, जो इंडिया में बनते है। लेकिन तोलिये पर जब तक के मेड इन यू।एस।ए। और जुटे पर जब तक मेड इन इटली लिखा हुवा न हो ग्राहक नहीं ख़रीदते। अगर उन मुल्क़ों का लेबल हो तो हाथों हाथ बिक जाता है। इंडिया के जूते और तोलिये जिस पर बेरुन का लेबल लगा हुवा आता है उस की क्वालिटी भी अच्छी होती है।
अगर हम बेचते वक़्त बता दे के ये इंडियन है इस पर सिर्फ यू।एस।ए। और इटली का लेबल लगा हुवा है तो बेचना जाइज़ है या नहीं ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما
इंडिया की बनी हुई चीज़ों पर ऐसा जुम्लाह लिखना जिस से उस के अमरिका या ईटली में बनने का दावा किया गया हो सरीह-साफ गलत बयानी है। जिस की शरीअत में बिलकुल इजाज़त नहि।

हाँ किसी और ने ये जुम्लाह लिख दिया और फिर आप को बेचना पड़ा तो लिखनेवाले का गुनाह लिखने वाले के सर होगा। आप ये कहकर ज़िम्मेदारी से बरी हो सकते हैं के अगरचे इस पर लिखा हुवा कुछ और है लेकिन ये इंडिया का बना हुवा है।

रहा ये उज़्र के लोग इन चीज़ों को उस के बगैर ख़रीदते नहीं हैं तो उस की वजह से गलत बयानि जाइज़ नहीं हो सकती।

📘फतावा उस्मानी ३/१०४
थोड़ी तबदीली और इबरत की आसानी के साथ

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २५८१⭕

ज़ैद ने ख़ालिद से १०,०००(दस हज़ार) की रक़म का सामान ख़रीदा लेकिन खालिद ने किसी मस्लिहत की वजह से ज़ैद को सामान का बिल नहीं दिया, अब ज़ैद को सरकार में हिसाब पेश करने के लिए बिल की ज़रूरत पड़ी, तो ज़ैद ने बकर नामी ताजिर को जाकर कहा के मेने खालिद से माल खरीदा है मगर उस ने बिल नहीं दिया तो तुम मुझे बिल दे सकते हो ?
बकर ने कहा दुँगा मगर जितना रुपये का बिल बनावुंगा उस में १०० ₹ (एक सो) पर ५ ₹ (पाॅंच रुपये) बिल के एवज़ में देने होंगे।

सवाल ये है के
ज़ैद के लिए एवज़ देकर बिल लेना और बकर के लिए बगैर माल दिए सिर्फ बिल देने के एवज़ रक़म लेना दुरुस्त है या नहीं ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

दुरूस्त नहीं, फ़रेब और धोका है।

📘महमूदुल फ़तवा ३/३२

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नंबर २५८२⭕

दूकान के मालिक ने चीज़ों के भाव मुलाज़िम को बताये है, मुलाज़िम उस को ज़्यादा क़ीमत में बेचता है, मसलन किसी चीज़ का ६० रुपये है तो मुलाज़िम उस चीज़ को ७० रुपये में बेचकर दस रुपये अपने पास रखता है, और ६० रुपये मालिक को देता है।
तो क्या इस तरह मुलाज़िम को १० रुपये लेना जाइज़ है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

उस मुलाज़िम की हैसियत बेचने के वक़ील की है, इसलिए पूछि हुई सुरत में अगर उस ने उस चीज़ को जिस के मुताल्लिक़ मालिक ने उस ६० रुपये में बेचने को कहा था उस ने ७० में बेचा तो बेचना दुरुस्त और सहीह है, लेकिन ज़ाइद रक़म १० रुपये भी मालिक की मिल्कयत समझे जायेंगे, वह मुलाज़िम वह रक़म अपनी जैब में नहीं रख सकता, अगर ऐसा किया तो ये खयानत है।

📘महमूदुल फ़तवा ३/१६

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २५८४⭕

एडवांस पैसे देकर मसलन कपडा खरीदना है तो शरीअत में ऐसे मुआमले की किया शर्तें हैं ?

🔵आज का जवाब🔵

حامد ومصلیا و مسلما

ऐसे मुआमले को मसाइल की ज़ुबाँ में “बय ए सलम” कहते है, उसके निचे लिखे हुवे शराइत हैं।

१️⃣ कोनसी क़िस्म का कपडा कॉटन, पोलिस्टर वगैरह
कितने गेज (मोटाई) का
कितने पने (विड्थ) का ३६ का या ५४ का?

२️⃣ कितना चाहिए १० मीटर, ५० मीटर ?

३️⃣ किस वक़्त चाहिए फुलां महीना, फुलां तारीख?

४️⃣ एक मीटर कितने रुपये की क़ीमत का चाहिए ?

५️⃣ कहाँ वुसूल करोगे, आप को कहाँ पहोचाना है ?

वगैरह इन सब बातों को साफ़ साफ़ तय किया जाये तो मुआमला सहीह होगा।
वरना मुआमला दुरुस्त न होगा।

📗क़ुदूरी सफा ८४ से मुस्तफाद

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नो। २५८५⭕

मेरे चप्पल एक शख्स बिला इजाज़त पहन कर गुम कर दिए तो क्या में उस शख्स से चप्पल की क़ीमत वुसूल कर सकता हूँ?

अगर वसूल कर सकता हूँ तो कितनी क़ीमत लूँ मेरी चप्पल इस्तेमाल की हुई थी।

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

पूछि हुई सूरत में आप चप्पल की क़ीमत वसूल कर सकते हो और आप की इस्तेमाल की हुई चप्पल की जो बाज़ारी क़ीमत (वैल्यू) हो उतनी क़ीमत वसूल कर सकते हो।

📗महमूदुल फ़तवा ७/३७४
📘बा हवाला दुर्रुल हुक्काम


و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २५८६⭕

मेरी दुकान जिस बाजार में है उसमे सिर्फ ५ तरह के कारोबार चलते हैं :
(१) पतंग की डोरी,
(२) होली की पिचकारी,
(३) रक्षाबंधन की राखियां,
(४) खिलोने, जिसमे कुछ तस्वीरे और कुछ बगैर तस्वीर के होते है,
(५) आतिश बाज़ी का सामान जिसको आम तौर पर हिन्दू लोग जलाते है।

इन मज़्कूरह चीज़ों के ख़रीदार ९०% हिन्दू होते हैं।

नीज़ अगर किराये से रहने वाला शख्स मुसलमान हो तो क्या में मज़्कूरह कारोबार के लिए अपनी दूकान किसी मुसलमान को दे सकता हूँ ?
या फिर इसके अलावह कोई और शकल हो तो तहरीर फ़रमाए।

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

सवाल में मज़्कूरह कारोबार सब मकरूह है, ख़ास कर रक्षाबंधन, होली, के सामन और आतिश बाज़ी की ख़रीदो फरोख्त बिलकुल जाइज़ नहीं।

मुसलमान को ऐसा कारोबार हरगिज़ नहीं करना चाहिये।

लेकिन अगर आप दुकान किराये पर दे और कीरायेदार यह कारोबार करे, ख्वाह वह हिन्दू हो या मुसलमान, तो आपके लिए आपकी दुकान का किराया हराम न होगा, और मकरूह कारोबार का गुनाह खुद किरायेदार पर होगा।

📗 किताबन नवाज़िल १२/४९२

و الله اعلم بالصواب

 

⭕ आज का सवाल नंबर २६०३⭕

ताजिर ने ख़रीदार की तलब पर बा ज़रिये ट्रांसपोर्ट माल रवाना किया, रस्ते में माल जायेअ हो गया तो उस नुकसान को ताजिर बर्दाश्त करेगा या ख़रीदार ?

आज कल के उर्फ़ के मुताबिक़ ताजिर के ज़िम्मे नुकसान आता हो तो ख़रीदार के लिए ताजिर से उस नुकसान को वुसूल करना सहीह है या नहीं ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

जो माल डाक, रैल, ट्रांसपोर्ट वगैरह के ज़रिये से रवानाकिया जाए वह उसके क़ब्ज़े में समझा जायेगा जिसने यह हुक्म दिया हो, अगर ख़रीदार ने लिखा के फुलां माल रेल या डाक या ट्रासपोर्ट में भेज दो और जायेअ हो गया, बेचनेवाला ज़िम्मेदार नहीं, उसने गोया ख़रीदार के वकील (यानि कुरिअर, रैल, या ट्रासपोर्ट) के हवाले कर दिया।

ओर अगर उसका यह हुक्म न था बेचने वाले ने खुद अपनी मर्ज़ी से भेजा तो भेजने से बेची हुवी चीज़ का सुपुर्द करना (हवाले करना) नहीं हुआ, लिहाज़ा बेचनेवाला नुकसान का ज़िम्मेदार होगा ख़रीदार नहीं।

📗 इतरे हिदायह १०२
महमूदुल फ़तावा ३/२६ क़दीम
जदीद ७/३८१

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २६१९⭕

मे कंप्यूटर की तिजारत शुरू करने जा रहा हूं, और खुद कंप्यूटर इंजीनियर हूं, मुझे तिजारत शुरू करने से पहले दीनी ऐतिबार से क्या करना चाहिए ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

(१) इस्लाम ने ज़िन्दगी के हर शो’अबे के लिए रहनुमाई की है, इन्सान के लिए ज़रूरी है के वह जिस शो’अबे में दाखिल हो उसके बारे में अहकामे शरीअत की वाक़फ़ियत हासिल करने की कोशिश करे।

चुनांचे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इर्शाद फ़रमाया के : हर मुस्लमान पर इल्म का हासिल करना फ़र्ज़ है।

(२) इसमें वह तमाम उलूम शामिल है जिन का दीन पर अमल करने के लिए ज़रुरत पड़े या जो रोज़ी कमाने के लिए हासिल करना ज़रूरी है।

चुनांचे फ़तवा ए सिराजिया में है:
ईल्म का इतनी मिक़्दार में हासिल करना फ़र्ज़ है जिस की ज़रुरत हो।

ऐसे कामो के सिलसिले में जो उसके लिए उसके बगैर चारा न हो, जैसे वुजू, नमाज़ दुसरे शर’ई अहकाम और म’आशी उमूर- घरेलु मसाइल।

(३) कंप्यूटर की तिजारत के लिए भी बहोत से शर’ई मसाइल हो सकते है, जैसे सूदी लेन देन से बचना, महफ़ूज़ प्रोग्रामो की चोरी से परहेज़ करना, अगर कंप्यूटर के साथ साथ सीडी भी फ़राहम करते हो तो अख़लाक़ को बिगाडने वाली सीडियों की ख़रीदो फरोख्त से बचना।

पस आप सब से पहले तिजारत और बिल्खुसुस अपने शोअबे के मुतअल्लिक़ मसाइल व अहकाम की वाक़फ़ियत हासिल करने की कोशिश करे और उस बात का पुख्ता इरादा रखे के झूठ, धोखा, और बद-दयानति से अपने आप को बचाएँगे।

बल्कि फुक़हा ने लिखा है के जब तक आदमी ख़रीदो फरोख्त के अहकाम से वाक़िफ़ न हो जाए उसे तिजारत शुरू न करनी चाहिये।

(इस बारे में बड़ी कोताही है के अपने कारोबार के मसाइल सीखे बगैर ही कारोबार करते रहते है!)

📕 फतावा महमूदिया ९/३७८

و الله اعلم بالصواب