(१) मुस्लिम ख़वातीन का एहतेजाजी-मुखालिफत का जलसा (२) रैली निकालना (३) मुस्लिम ख़वातीन का इज्तिमाई ख़त्म और इज्तिमाई दुआ करना (४) सेक्युलर-बिन सांप्रादायिक मुल्क के कानून की हिफाज़त फ़रीज़ा हे (५)आयींन-सविंधान की हिफाज़त किस तरह की जाये? १९९०

मुफ़्ती साहब!
मुल्क के मौजूदा हालत में अपनी शरीयत ओर मूलक की हिफ़ाजत से मुताल्लिक चंद सवाल के शरीयत की रोशनी में जवाब मतलूब हे -उम्मीद है के आप जवाब देकर शुक्रिया का मौक़ा देंगे।

(१) मुस्लिम ख़वातीन की इहतिजाजी रेली निकलना केसा हे ?
(२) मुस्लिम ख़वातीन का इहतिजाजी जलसा करना केसा हे ?
(३) मुस्लिम ख़वातीन को शहर के मुख्तलिफ इलाकों में जमा करके आयते करीमा और सुरहे यासीन वगेरा का ज़िक्र कर के इज्तेमाई दुआ करना केसा हे?

(४)क्या सेक्युलर मुल्क के कानून की हिफ़ाजत सरई मसला है?

(५)अगर सेक्युलर बिन सांप्रदायिक मुल्क में सेकुलरिज्म और अकल्लीयतों-लघुमती ख़ुसूसन मुस्लमानो के खिलाफ हुकुमत कोई कानून बनाती हे तो क्या करना चाहिए?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

(१,२)
अल्लाह ताला क़ुरआन करीम में फरमाते हे
कुराने करीम की इस आयत ने एक अजीम उसूल बयान फ़रमाया है के:
ओरत का असल फरिजा घर और खानदान की तामीर हे। और मुसलसल ऐसी सर गर्मिया जो इस मकसद में खलल अंदाज हो उसके असल मकसदे जिन्दगी के खिलाफ हे।
अलबत्ता इसका ये मतलब भी नहीं के औरत के लिए घर से निकलना जाइज नहि, बल्कि जरूरते दिनिया व दुनिया के लिए घर से निकल सकती हे, जैसे हज, उम रा, इलाजो मुआलजा, निज क़राबतदारों से मिलने के लिए और जरुरत के वक्त सारे हुदूद-दायरे में रहते हुवे रोज़ी रोटी कमाने के लिए भी निकल सकती हे।

हिंदुस्तान में जो नया कानून लाया गया हे ओर मस्जिद लेने की कोशिश की जा रही हे वो बिलकुल सियाह क़ानून हे, जो मुसलमानो को अपने ही मुल्क में अजनबी और नंबर २ का शहरी बनाने के लिए हे, बल्कि ये कहा जाये के ये मुसलमानों को गैर मुल्की साबित करने की भरपूर कोशिश हे।

इस सियाह (काले) क़ानून को रद्द करवाने के लिए जितनी भी कोशिश हो सकती हे करनी चाहिये, जिस्मे क़ानूनी चारा जोई के साथ सबसे मुअस्सिर जो तरीका हे वो एहतिजाज हे, जिसका फायदा खुलकर नजर भी आ रहा हे, के हुकूमत इस काले कानून पर सफाई और आपना दिफ़ाअ करने पर मजबूर हो गयी हे।

नीज जम्हुरियत-लोकशाही में सर गिने जाते हे, लिहाजा जो एहतेजाज औरतो के लिए मख्सूस हॉ, जहा फ़ितने का कोई खोफ न हो तो शरई हुदूद की रिआयत करते हुए ओरतो को एहतेजाज में हिस्सा लेनेकी बिल्कुल इजाजत होगी, जैसा के जिहाद वगेरा में मुजाहिदीन की मरहम पट्टी,पानी पिलाने,खाना पकाने के लिए निकलने की इजाजत हे।
ईसी तरह रोटी रोज़ी और इलाजो मालाजा के लिए निकलने की इजाज़त हे।

बल्कि ये कहा जाये के मज़कूरा तमाम चीज़ो से ज्यादा अपना दीनी तसख्खूस -पेहचान और अपने आप को मुल्क का शहरी साबित करना ज़रूरी और अहम् हे।

(३)
गुंजाइश हे, बेह्तर हे के ख़तम वगेरा का अमल अपने अपने घरो में करे।

(४)
आयींन-बंधारण की वो दफ़ाअत-धारा जिसका फायदा किसी भी तरह अकेल्लीयतों-लघुमती को पहोचता हो, या वो दफ़ाअत-धारा-क़लम अकलियतों को नुकसान से बचाने के लिए हो, तो हत्तल मक़दूद क़ानून के दायरे में रहकर उनकी हिफाजत हमारे जिम्मे शर’अन लाजिम हे।
जीस तरह अपनी जिस्मानी हिफ़ाजत लाजिम हे इसी तरह नागरिकता के फायदों की हिफ़ाजत, निज अपने आपको नुक्सान से बचाना भी लाजिम हे।

(५)
कानूनी चारा जोई और पुर अमन एहतेजाज के ज़रिए अपनी बात ज़रूर रखनी चहिये।
و الله اعلم بالصواب

हजरत मुफ़्ती जुनेद पालनपुरी
दारुल इफ्ता वस्ल इरशाद कुलाबा बम्बई

वैलेंटाइन डे की असल हकीकत और हमारी ज़िम्मेदारी १६३९

वैलेंटाइन’स डे की हकीकत क्या है?

ईस की शुरूआत कब से हुई?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

ईस की तारिख में बयान किया जाता है के आज से डेढ़ हज़ार साल पहले संत वैलेंटाइन नामी एक ईसाई पादरी था।

उस ने बेहयाई की सारी हदें पार करते हुए ईसाई लड़की से जीना(सेक्स) किया था।

इसी बात पर इंग्लैंड की हुकूमत ने १४ फेब्रुअरी को उसे फांसी की सजा दी थी।

उस की बरसी पहले मज़हब तक़रीब हुवा करती थी, मगर बाद मे इस दिन को इंग्लैंड की नौजवान नस्ल ने उसकी याद में मनाना शुरू कर दिया, और संत वैलेंटाइन उन के आइडियल बन गए।

(सेह रोज़ा दवाई २२ फ़रवरी २००० ईस्वी)

उपर दी हुई बातों से मालूम हुवा के ये मज़हबी तेहवार है, और अफ़सोस की बात अब मुस्लमानो ने भी इस बेहया और बेशरम नसल की तरह इसको मनाना शुरू कर दिया

याद रखे

अल्लाह के रसूल ﷺ की हदीस का मफ़हूम है

जो शख्स जिस क़ौम की मुशाबहत (तरीके) इख्तयार करेंगा वो उन्ही में शुमार होगा।

यानी बरोज़े क़यामत उन्ही जैसा हशर किआ जायेगा,

लिहाज़ा अपने इमान और अपने घर के नवजवानो के इमान पाकदमनी की हिफाज़त करे, उन को समझाए, और कल की रात बाहर न जाने दे, अपनी जवान लड़की और बहनो पर खास निगरानी रखे, वह किसी गलत तअल्लुक़ और हवश का शिकार न बने।

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०८ जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)