aaj ka sawal hindi

दूसरी आसमानी किताब भी अल्लाह तआला ने ही नाज़िल की है तो उस पर अमल कर सकते है ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

कुरान नाज़िल होने के बाद अगली तमाम आस्मानी किताब मंनसूख और रद हो गई, अब वह किताबेँ असली शकल पर महफ़ूज़ नहीं, और उन पर अमल करना जाइज़ नहीं।

क़ुरान की हिफाज़त का वादा अल्लाह तआला ने किया है।  जैसा नाज़िल हुवा था आज भी वेसा ही मव्जूद है। उस में किसी क़िस्म की कमी हुई है, न इजाफ़ा, और क़यामत तक इसी तरह महफ़ूज़ रहेंगा।

(इस्लामी अक़ाइद सफा १८)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२१ जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी

(मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

आसमानी किताबेँ कोन कोन सी है ? और किस किस नबी पर नाज़िल हुई ? उस को हम पढ़ सकते है या नहीं ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

आसमानी मशहूर  किताबेँ ४ है।

तौरात हज़रत मूसा अलैहिस सलाम पर,

इंजील हज़रत इसा अलैहिस सलाम पर,

ज़बूर हज़रत दावूद अलैहिस सलाम पर और

क़यामत तक के लिए आखरी किताब क़ुरान हमारे नबी हुज़ूर सलल्लाहु अलय्हि वसल्लम पर नाज़िल हुई।

दूसरी किताबों को गुमराह और आवारा मिजाज़ लोगों ने बहुत कुछ बदल डाला है, वह किताबेँ सब हक़ और सच थी, उस असल किताब पर हमारा इमान है, उसी में अपने अपने ज़माने के नबीयों की उम्मत के लिए नजात रही, लेकिन अब असल शकल में वह किताबेँ महफ़ूज़ नहीं,

लिहाज़ा जो बातें क़ुरान और हदीस के मुवाफ़िक़ होगी उसे हम मानेँगे, और जो मुख़ालिफ़ होगी उसे नहीं मानेँगे, और जो न मुवाफ़िक़ हो न मुख़ालिफ़ उस बारे में हम खामोश है।

(इस्लामी अक़ाइद सफा १७,१८ से माखूज़)

و الله اعلم بالصواب

(इस्लामी तारीख़

२० जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी)

(मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

 

फ़रिश्ते किसे कहते है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

अल्लाह तआला ने नूर से एक मख्लूक़ पैदा की है जिन को हमारी नज़रों से छुपा दिया है,

उन को फ़रिश्ते और मलायकह कहते है,

ये न मर्द होते है न औरत।

(इस्लामी अक़ाइद सफा १५)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२३ जुमाद अल उला १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

जो उस का इंनकार करे उस का क्या हुक्म है ?

जवाब:  حامدا و مصلیا و مسلما

“फ़र्ज़ की तारीफ़“: फ़र्ज़ उस हुक्म को कहते, है जो दलीले क़त’ई और यक़ीनी से साबित हो, यानि क़ुरान की ऐसी आयत और ऐसी सहीह हदीस से साबित हो, के उस आयत और उस हदीस के मा’नि और मतलब में दूसरे मा’नि और मतलब का एहतिमाल न हो, यानि उस का मफ़हूम साफ़ और एक हो।

या सहाबा और ताबीइन के इज्मा (इत्तिफ़ाक़) एक राय होने से साबित हो।

उस का इन्कार करनेवाला क़ाफ़िर है।

और बगैर उज़्र के छोड़नेवाला फ़ासिक़ और सख्त गुनेहगार है।

जवाहिरूल फीकह १/१०५

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़: १४ सफर उल मुज़फ्फर १४४० हिजरी

“फ़र्ज़ की तारीफ़” : मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

जवाब:  حامدا و مصلیا و مسلما

“शरीअत के अहकाम की क़िस्में” ८ (आठ) है।

“शरीअत के अहकाम की क़िस्में“

१. फर्ज़

२. वाजिब

३. सुन्नते मुअक्कदह

४. मुस्तहब

५. मुबाह

६. मकरूह

७. हराम

८. हलाल

 


उम्दतुल फ़िक़ह जिल्द १,सफ़ा १०५

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़: १३ सफर उल मुज़फ्फर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

आज का सवाल नंबर २६७४

कया कुरान में चेहरे के परदे- नक़ाब का हुक्म सराहतन-साफ़ साफ़ है ?
बाज़ लोग कहते है चेहरे का पर्दा कुरान से साबित नहीं।
ये बात सहीह है ?

🔵जवाब🔵

हां, साफ हुक्म साबित है जैसे के

पहली दलील
📕क़ुरान का पाराह २२ सुरह अहज़ाब में आयत नंबर ५९ में अल्लाह तआला फ़रमाते है

یایہا النبی قل لازاجک و بناتک و نساء المومنین یدنین علیہن من جلابیبہن

अय नबी ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! आप अपनी पाक बीबियों और अपनी बेटियोँ और मूअमिन औरतों को फ़रमा दिजिये के अपने चेहरे पर अपनी चादर का कुछ हिस्सा लटकाये रखे।

उस ज़माने में नक़ाब नहीं बने थे लिहाज़ा चेहरे को छुपाने के लिए चादर का कोना लटका लिया जाता, जिस में से एक आँख भी रास्ता वगैरह देखने के लिए खुली रखी जाती थी।

दूसरी दलील
📘पाराह १८ सुरह नूर में आयात नंबर ३१ में है

و لا یبدین زینتہن

ओर अपनी ज़ीनत ज़ाहिर न करे

(ज़ीनत की चीज़ें होंठ, गाल, आंख, नाक ये सब चेहरे में ही आता है। औरत में ज़ीनत का असल मरकज़ चेहरा है, लिहाज़ा उसे तो दूसरे आज़ा के मुकाबले में खास तौर पर खुला न रखना चाहिए बल्कि ढंकना चाहिए)

तीसरी दलील
📗पाराह २२, सूरह अहज़ाब आयत ५४ में सहाबा रदी अल्लाहु अन्हुम जैसी निगाह को पाक रखने वाली जमात को हुक्म है

اِذَا سَاَلْتُمُوْہُنَّ مَتَاعًا فَسْئَلُوْہُنَّ مِنْ وَّرَآءِ حِجَابٍ ؕ ذٰلِکُمْ اَطْہَرُ لِقُلُوْبِکُمْ وَ قُلُوْبِہِنَّ ؕ

जब पैगम्बर की बीवियों (जो हमारी रूहानी माएं है) से कोई चीज़ माँगो तो परदे के पीछे से मांगो।

पाक बीबियों के बारे में बुरा वस्वसा भी नहीं आ सकता था, फिर भी परदे के पीछे से बात करने का हुक्म है, तो दूसरी आम औरतों का चेहरा देखने की और मरदों को चेहरा दिखाने की आम इजाज़त कैसे हो सकती है।

लिहाज़ा चेहरे के परदे को शरीअत का हुक्म न मानने वाले लोग गुमराह है।

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.