aaj ka sawal hindi

कौन से जानवर की कितनी उम्र क़ुरबानी के लिए जरुरी है ?
और उमर मुकम्मल होने की क्या पहचान है ?
और दांत गिर गए हो या दांत ही न आये हो उसकी क़ुरबानी दुरुस्त है ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

कुरबानी का जानवर बकरा बकरी घेटा, घेटी है तो एक साल.
गाय, भैंस, पाड़ा हो तो दो साल.
और ऊंट है तो ५ साल मुकम्मल होना ज़रूरी है।

अलबत्ता दुंबा और घेटा ६ महीने का हो १ साल के घेटों के दरमियान छोड़ दिया जाए तो देखने में उसके हाईट और मोटापे की वजह से १ साल का मालूम होता हो तो उसकी क़ुरबानी भी दुरुस्त है।

जानवर क़ुरबानी के लाईक है या नहीं उसकी पहचान दांत से होती है, अगर बकरे में ऊपर की दो दांत है एक साल का यक़ीनी है, क्यूँ के आम तो पर सवा साल में दांत आते हैं, और बड़े जानवर में निचे दरमियान के दो दांत दूसरे दांतो के मुक़ाबले में बिल्कुल नुमाया होते है, इसतौर पर के वह ऊपर से थोड़े टेढ़े या चोधे होते है, आम तौर पर सवा दो साल में आते हैं लेकिन अगर किसी जानवर के पक्के दांत न आये हो लेकिन यक़ीनी तौर पर उसकी उमर क़ुरबानी के लायक होने ईल्म हो तो उसकी क़ुरबानी भी दुरुस्त है।

फतावा रहीमियाह

आलमगीरी ५/११४

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा व सेक्रेटरी जमीयते उलमा सूरत शहर, गुजरात, इंडिया

क़ुरबानी में वलीमा या अक़ीक़ाह का हिस्सा रख सकते हैं ?
बाज़ लोग क़ुरबानी में अल्लाह का हिस्सा रखने को कहते है तो ये कैसा है ?
जवाब

حامد و مصلیا و مسلما

जी हा, वलीमा सुन्नत है, सवाब है, उस का हिस्सा रख सकते है, ईसी तरह अक़ीक़ाह का हिस्सा भी रख सकते है। (मुस्तफ़द किताबुल मसाइल २,२३३)
बाज़ लोग बड़े जानवर में अल्लाह का हिस्सा रखने के मुताल्लिक़ पूछते है तो ये बात याद रहे के तमाम हिस्से और तमाम क़ुर्बानियां अल्लाह त’आला के लिए ही होती है, उर्फ़ (बोल-चाल के रिवाज में) ‘मेंरा हिसा’ ‘फूलां के नाम का जानवर’ बोल दिया जाता है, हक़ीक़त में निय्यत ये होनी चाहिए के फुलां की तरफ से हिस्सा या क़ुरबानी अल्लाह त’आला के लिए में ज़बह करता हुं।

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

१.
हमारे यहाँ इंग्लैंड  में १० ज़िल हिज्जः यानी ईद का दिन हो, और हमेँ अपनी क़ुरबानी इंडिया में उसी दिन करनी हो, हालां के उस दिन इंडिया में ९ ज़िल्हिज्जः हो तो हमारी क़ुरबानी इंडिया में उस दिन हो सकती है या नहीं ?

२.
अगर मक्काः में १३ ज़िल हिज्जः हो यानी क़ुरबानी का वक़्त निकल गया हो, और इंडिया में १२ ज़िल हिज्जः हो यानी क़ुरबानी का वक़्त बाकी हो,
तो इस सुरत में अगर कोई हाजी अपनी क़ुरबानी इंडिया में कराये तो सहीह होगी या नहीं ?

जवाब
حامدا و مصلیا و مسلما

१.
जब तक के इंडिया मे कुरबानी के दिन शुरु’ए न हो यहाँ दूसरे मूलक वालों की क़ुरबानी सहीह नहीं है।
क्यूँ के क़ुरबानी सहीह होने के लिए मालिक और जानवर दोनों का फिल जुम्लाह ऐतिबार है, यानी मुअक्किल यानी क़ुरबानी करवाने वाले पर क़ुरबानी का वुजूब आना चाहिए और जानवर जहाँ है वहां क़ुरबानी का वक़्त होना चहिये।
पूछी हुई सुरत में इंग्लैंड वाला जो क़ुरबानी करवा रहा है उस के ज़िम्मे तो क़ुरबानी का वुजूब आ गया है, लेकिन इंडिया में जहाँ जानवर है वहां क़ुरबानी का वक़्त नहीं आया है, लिहाज़ा इंग्लैंड वाले की क़ुरबानी इंडिया में ९ जिहिज्जः को एक दिन पहले नहीं हो सकती है।
क़ुरबानी सहीह होने के लिए इंडिया में भी १० जिहिज्जः होना ज़रूरी है।

२.
मजकूरह सुरत में क़ुरबानी सहीह है।
उस की पेहली वजह मक्का में १३ ज़िल हिज्जः होने की सुरत में सबबे वुजूब यानी जिसके ज़िम्मे क़ुरबानी हो उसका क़ुरबानी के दिनों में क़ुरबानी पर क़ादिर होना यह उस हाजी के हक़ में पहले ही से पाया गया, और दूसरी शरत वुजूबे अदा यानी क़ुरबानी के वक़्त का मौजूद होना।
जानवर इंडिया में मौजुद है, यह शरत भी यहाँ पायी गयी, लिहाज़ा बिला शक़ वह हाजी अपनी क़ुरबानी का वकिल किसी को इंडिया में बना दे तो १२ ज़िल हिज्जः को भी उस की क़ुरबानी सहीह है।

दूसरी वजह अगर वह क़ुरबानी का वकिल बनाने वाला खुद १३ ज़िल्हिज्जः को मक्काः से सफर कर के इंडिया आता और यहाँ १२ ज़िल्हिज्जः को क़ुरबानी करता तो दुरुस्त था। तो वहां रहकर वकिल बनाये तो बतरीके औला होगा।

किताबं नवाज़िल १४/५५३ से ५५८ का खुलासाः

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

क्या जानवरों की क़ुरबानी करना ये उन पर ज़ुल्म है ? गैरों का कहना के इस्लाम का ये तरीका रहम के खिलाफ है ये सहीह है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

१. अल्लाह जानवरों का मालिक है, मालिक को अपनी मिल्किय्यत में तसर्रुफ़ (जो चाहे वो) करने का इख़्तेयार होता है, किसी दूसरे के फटे हुवे कपडे को फाड़ना भी ज़ुल्म है, लेकिन मालिक अपने बेहतरीन कपडे को अपने काम के लिए फाड़ दे उसे कोई ज़ुल्म नहीं कहता. मुसलमानो को जानवरों के पैदा करनेवाले और मालिक अल्लाह ने क़ुरबानी करने का हुक्म क़ुरान में सूरह कौसर में “क़ुरबानी करो” कहकर दिया है इस लिए क़ुरबानी करते है.

२. क़ुरबानी हर मज़हब में बलिदान, भोग, बली, भेट चढ़ाना वगैरह नाम से मौजूद है.

३. मुर्ग़ी, मछली, ज़िन्गे वगैरह जानदार को दूसरे मज़हब वाले भी मारते और खाते है तो फिर ऐतराज़ मुसलमानो पर ही क्यों ? माछियों से क्यों डरते हो ?

४. सब्ज़ियां, फलों फूलों में भी जान है, उनको भी हवा पानी और रौशनी की ज़रूरत है, साइंस कहता है वो भी जानदार है, जीवदया करने जाओगे तो इसे खाना भी छोड़ना पड़ेगा. छोटे जिव में बर्दाश्त की ताक़त छोटी होती है, बड़े जिव में बर्दाश्त की ताक़त बड़ी होती है, इसलिए तकलीफ पहुंचने में छोटा जिव और बड़ा जिव एक- सेम है, फ़र्क़ करना गलत है

५. इस्लाम मज़हब दुनिया के हर कोने के लिए है, जहाँ सिर्फ बर्फ ही बर्फ और रेगिस्तान ही रेगिस्तान हो, जहाँ सब्जियां नहीं होती, वहां के लोगों को जानवर ज़बह करने से मना किया जाये तो लोग क्या खाएंगे?

६. गोश्त खाना फ़ितरी-प्राकृतिक चीज़ है इस लिए अल्लाह ने इंसान को फाड़ खाने वाले जानवर की तरह उप्पर के २ नुकीले दांत और चबाने के लिए गोल दाढ़ें दी है. सब्ज़ी खानेवाले जानवर को न नुकीले दांत दिए, न गोल दाढ़ें दी, बल्कि सब दांत सीधे और चपटी दाढ़ें दी. लिहाज़ा ये नुकीले तिन्ने दांत और गोल दाढ़ें सब्ज़ी खाने नहीं दी है बल्कि गोश्त खाने दी है.

७. जानवर को ज़बह न करते तो भी वो एक न एक दिन बीमारी में मुब्तला हो कर तड़प तड़प के ज़रूर मरता, वह हमेश नहीं जीता है. ज़बह करने से उसे आसान मौत मिलती है. इसीलिए अपनी समझ में आसान मौत ही के लिए बाज़ इंसान ख़ुदकुशी-आत्महत्या करते है. ता के बीमारी की तकलीफ उठानी न पड़े.

८. जो जानवर बाँझ है, बच्चे नहीं जनते, नहीं देते, और बूढ़े-कमज़ोर हो गए है, उन को घास चारा खिलाने में घास चारा कम होता है, पैसे भी ज़ाएआ होते है. और बेहतर जानवरों के चारे का हक़ कम हो जाता है. या तो बाहर चरने के लिए छोड़ने में प्लास्टिक की थैलियां खाकर मरती है, अक़्ल ये कहती है ऐसे जानवरों को ज़बह कर देना चाहिए, ताके घास चारा अच्छे जानवरों को मिले और उस से उन जानवरों की सिहत व तंदुरस्ती में इज़ाफह हो, और दूध में बढ़ोतरी-ज़ियादती हो. ऐसा करना उन अच्छे जानवर पर रहम है.

९. ज़ुल्म के माने सिर्फ तकलीफ पहुंचना हो तो हर क़ौम को खटमल मच्छर चूहा वगैरह तकलीफ पहुंचने वाले जानवर को सिर्फ भागने की या पकड़ के कहीं छोड़ आने की दवा या मशीन इस्तिमाल करनी चाहिए, इसके बजाये जान से मार डालते है, इस की मामूली तकलीफ जिस से इंसान की जान का खतरा नहीं, अपनी राहत के लिए मार डालते है, पता ये चला इंसान सब से बेहतर मख्लूक़-जिव है, अपने फायदे के लिए अदना-मामूली मख्लूक़-जिव को मार सकता है.

१०. जानवर का दूध हर क़ौम पीती है, बावजूद इसके के वह उस जानवर के बच्चे का हक़ है, जब ये ज़ुल्म नहीं तो गोश्त खाना कैसे ज़ुल्म होगा!

११.जानवर को अपनी मेहनत की कमाई से लेकर उस की खिदमत कर के फिटरी रहम की वजह से दिल न चाहते हुवे उसे ज़बह करते है, इस में मुस्लमान अपने जज़्बात ”माल से मुहब्बत, जानवर से मुहब्बत, फिटरी रहम, ये सब रूह और आत्मा की ख़ाहिश की अल्लाह के हुक्म के सामने क़ुरबानी देता है, अंदर के जज़्बात की क़ुरबानी जानवर को ज़बह कर के ज़ाहिर करता है.

१२.जानवर को काटा न जाता तो एक दिन खुद मर के मिटटी में मिल कर बर्बाद हो जाता, हम खाकर उसे अपने जिस्म और दिल में जगा देते है, उस का हिस्सा बना लेते है, ये उन के साथ अच्छा सुलूक है.

और भी बहुत सी दलीलें है, एक दज़न पर बस करता हूँ, इस से साबित हुवा जानवर को ज़बह करना उन पर न ज़ुल्म है न रहम के खिलाफ है.

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़: ०१ज़िलहिज्जा१४४१~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

ज़ुल हिज्जा का चाँद होने के बाद बाल और नाखून काटना कैसा है ? इसकी क्या मस्लिहत व हिकमत है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

ज़िल हिज्जा का चाँद होने के बाद जिसके ज़िम्मे क़ुर्बानी हो उसे बाल और नाखून ईद की नमाज़ और उस की क़ुर्बानी होने तक न काटना मुस्तहब है. ताके क़ुर्बानी का जानवर उसके हर हर जुज़-हिस्सा का बदल और फ़िदयाह  हो जाए और अल्लाह ता’अला की रहमत से उस आदमी के जिस्म का कोई हिस्साः महरूम न रहे,

लोगों के ज़िम्मे क़ुर्बानी नहीं है वह भी क़ुर्बानी करने वालों की और हज में गए हुवे हाजियों की मुशाबेहत (कॉपी) इख्तियार करेंगे तो वह भी उन पर नाज़िल होनेवाली रहमत से इंशा अल्लाह महरूम न रहेंगे,

कोई अपने बाल और नाखून काटेगा तो न गुनेगार होगा, न क़ुर्बानी में कोई खराबी आएगी, इस पर वाजिब की तरह अमल करना और ऐसा न करने वालों को टोकना सहीह नहीं है, चीज़ जिस दर्जा में साबित हो उसको उसी दर्जा में रखना चाहिए.

नोट: जिसके ज़ेरे नाफ (दुती /नाफ के निचे) d बाल और बगल के बालों पर ४० रोज़ गुज़र गए हो तो वह शख्स इस मुस्तहब पर हरगिज़ अमल न करे, अगर वह काटने में ४० दिन से ज़ियादह ताख़ीर करेगा तो गुनेहगार होगा.

मिरकातुल मफ़ातीह ३/३०६ 
मसाइल क़ुर्बानी,
इस्लाही ख़ुत्बात से माखूज़

२६ जिल्क़दह १४४१ हिज़री
११ जुलाई २०२० शनिचर

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

वज़न पर जानवर को खरीदना

वजन करके जानवर को खरीदने कैसा है ?
इसमें धोखा नहीं होता है क्यों क्यूंकि वज़न से क़ीमत का इत्मिनान हो जाता है।

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

जानवर तोल के तोले जाने वाली चीज़ों में दाखिल नहीं है, इस लिए हिदायह और फत्हुल क़दीर आलमगीरी वगैरह में इस मुआमले को नाजायज लिखा है।

नाजायज होने की वजह यह है कि मामले से पहले ना जानवर का वज़न मालूम होता है, ना उसकी कीमत मालूम होती है, तो यह मुआमला मजहूल- नामालूम हो गया, लेकिन जब जानवर को तोल लिया जाए उस वक़्त उसका वज़न और और कीमत मालूम होकर जहालत ख़त्म हो जाती है।

रही बात वज़न से जानवर का मुकम्मल गोश्त मालूम नहीं होता है, जानवर सुकड़कर कर या साँस फुला कर घटा बढ़ा देता है तो यह थोड़ी सी जहालत माफ़ है, उर्फ़ यानी बाजार का ऐसा रिवाज जिस में खरीदार और और बेचने वाला दोनों राज़ी है लिहाजा यह मामला आख़िरकार सहीह हो जायेगा।

दारुल दारुल उलूम देओबंद के जैसे नाजायज होने का फतवा है वैसे ही ऊपर दी गई तफ़सील के साथ जवाज़ का भी फ़तवा मौजुद है, उस पर भी अमल की गुंजाईश है, लेकिन क़ुरबानी एक इबादत है, जिस को सहीह तरीक़े से अदा करना ही तक़वा है, जो उस का मक़सूद है, लिहाज़ा जब तक हो सके इस इख़्तिलाफ़ी तरीके से बचना चाहिए और एहतियात का पहलु इख़्तियार करना चाहिए।

जाइज़ के कहनेवाले
१। अहसनुल फ़तवा
२। किताबुंन नवाज़िल
३। देवबन्द के दूसरा फ़तवा

नाजाइज़ कहनेवाले
१। फतावा रहीमियह १०/४८
२। देवबन्द का पहला फ़तवा
३। हिदयाह फत्हुल क़दीर

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा व सेक्रेटरी जमीयते उलमा सूरत शहर, गुजरात, इंडिया

क़ुरबानी करने की क्या फ़ज़ीलत है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हज़रत आइशा رضی اللہ عنھا से रिवायत हे के हुज़ूर ﷺ ने इरशाद फ़रमाया के ज़िल हिज्ज की १० तारीख यानी ईदुल अज़हा के दिन इंसान का कोई अमल अल्लाह ताला को क़ुरबानी से ज़ियादह महबूब नहीं है, और क़ुरबानी का जानवर क़ियामत के दिन अपने सींगो और बालो और खुरो के साथ ज़िंदा होकर आएगा, और क़ुरबानी का खून ज़मीं पर गिरने से पहले अल्लाह ताला की रजा और मक़बूलियत के मक़ाम पर पहोंच जाता है , पस ऐ खुदा के बन्दों दिल की पूरी ख़ुशी से क़ुर्बानियां किया करो.

दूसरी रिवायत में है के क़ुरबानी के जानवर के हर बाल के बदले में एक नेकी मिलेगी, सहाबा रदि अल्लाहु अन्हुम ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह ﷺ उन् की भी यही फ़ज़ीलत है. (उन् बारीक़ होने की वजह से बहुत होता है) हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया हाँ हर उन् के बाल के बदले में भी एक नेकी है.

(मफ़हूमे हदीस)
जानवर के बदन पर हज़ारों और लाखों बाल होते हैं. दीनदारी की बात यह है के इतने बड़े सवाब की लालच में जिस पर क़ुरबानी वाजिब नहीं है उस को भी कर देनी चाहिए, यह दिन चले जायेंगे तो इतना बड़ा सवाब कैसे हासिल होगा ?

तिर्मिज़ी शरीफ व इब्ने माजाह

बाहवाला मसाइले क़ुरबानी ३२ बिफरकि यसीर

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

खस्सी जानवर की क़ुरबानी जाइज़ है ?
गाभन (हमल वाले) जानवर की क़ुरबानी जाइज़ है ?
जवाब
खस्सी जानवर की क़ुरबानी जाइज़, बल्के अफ़ज़ल आवर मस्नून है, क्यूँ के उस का गोष्ट ज़ियादा अच्छा होता है।
अगर विलादत का वक़्त क़रीब है तो मकरूह हे, वरना मकरूह नहीं।

(किताबुल मसाइल २/२३९)

و الله اعلم بالصواب

मौलाना इब्राहीम अलयानी
तस्दीक़ मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

🔴सवाल नंबर २५४०🔴

१⃣
अगर वक़्त पर क़ुरबानी न कर सका तो अब क्या हुक्म हे??

२⃣
क़ुरबानी वक़्त पर न कर सका तो बाद में बड़े जानवर में हिस्सा लेकर क़ुरबानी कर सकता हे ??

🔵जवाब🔵

१⃣
अगर वक़्त पर क़ुरबानी न की जा सकी और जानवर पहले से मौजूद हे तो उसी जानवर को ज़िंदा सदक़ा करना ज़रूरी हे, अगर जानवर मौजूद न हो तो पुरे बड़े या छोटे जानवर की क़ीमत का सदक़ा लाज़िम हे.

२⃣
अगर क़ुरबानी वाजिब थी और क़ुरबानी के दिनों में नहीं किया तो अब दरम्यानी किस्म के १ बकरे की क़ीमत गरीबो पर सदक़ा करना ज़रूरी हे..यानि अब बड़े जानवर में हिस्सा नहीं ले सकता बल्कि पुरे जानवर की क़ीमत देनी ज़रूरी होगी..

📗मुस्तफ़ाद अज़ किताबुल मसाइल २/२२९)
📗 हिंदिया ५/२१४

लेकिन बंदे के पीरो मुर्शिद हज़रत मुफ़्ती अहमद खानपुरी साहब दा.ब. ने किफ़ायतुल मुफ़्ती और फ़तावा महमूदिया के हवाले से लिखा है के :
बड़े जानवर के सातवें हिस्से की क़ीमत भी अदा कर सकता है।

📘महमूदुल फतावा ७/४७६

लिहाज़ा जिस के पास वुस’अत और फ़रावानी हो वह एहतियात वाले पहले क़ौल पर अमल करे और जिस के पास अब तंगी हो वह दूसरे गुंजाईश वाले क़ौल पर अमल कर सकते हे।

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २५४१⭕

एक आलिम से सुना के कलेजी खाने से मुंह में बदबू पैदा होती है इसलिये अगरचे उस का खाना जाइज़ है लेकिन हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से उस का खाना साबित नहीं क्या ये बात सहीह है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

हज़रत बुरैदह रदिअल्लाहू अन्हु से रिवायत है के हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब ईदुल फ़ित्र की नमाज़ के लिए जाते तो कुछ (मीठी चीज़) खाये बगैर न जाते,

और ईदुल अजहा (क़ुरबानी की ईद) होती तो कुछ भी न खाते जब तक के लोटकर वापस न आते, जब लोटकर आते तो अपनी क़ुरबानी में से सब से पहले उस की कलेजी खाते।

📘अस सुननुल कुबरा लील बैहक़ी ३ /४०१

ओर जब बिलाल रदिअल्लाहू अन्हु ने उन ऊँटों में से जिस को लुटेरोँ से छुड़ाये एक ऊंट ज़बह किया और उस की कलेजी और कोहान-पीठ के गोश्त को भूना (फ्राई) किया।

📗सहीह मुस्लिम किताबुल जिहाद हदीस नंबर १८०७

इस के अलावह भी कई रिवायत है जिस से हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कलेजी खाना साबित है, अगरचे हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बदबूदार चीज़ से परहेज़ करते थे लेकिन सहीह और साफ़ रिवायत में सुबूत होने के बावजूद सिर्फ क़यास – लॉजिक की बुन्याद पर ऐसा कह देना उन आलिम साहब का सहीह नहीं।

📑हज़रतुल उस्ताज़ शैख़ तल्हा बिलाल मनियार साहब दाब. के पी.डी.ऍफ़. के मज़मून से माखूज़।

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नंबर २५४२⭕

१।
अकीके के गोश्त के बारे में बाज़ इलाक़े में मश्हूर है के उस का गोश्त माबाप नहीं खा सकते क्या यह बात सहीह है?

२।
बाज़ लोग अक़ीक़े के जानवर की हड्डियों को तोडने से मना करते हैं क्या यह सहीह है?

३।
अकीके का हिस्सा बड़े जानवर में क़ुरबानी के दिनों के अलावह भी राख सकते हैं?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما
१।
यह बात गलत है शरीअत में इस की कोई असल नहिं। अक़ीक़े का गोश्त बच्चे के माँ-बाप, दादा-दादि, नाना-नानी सब लोग खा सकते हैं।

२।
इस मुमानिअत का भी कोई सुबूत नहिं।

📙मसाइल ए ईदैन व क़ुरबानी सफा २३१
📕बा हवाला किफ़ायतुल मुफ़्ती ८/२४३

३।
कुरबानी के दिनों के अलावह कई बच्चे के अक़ीक़े एक जानवर में रखने के बारे में इखतीलाफ है, लेकिन राजिह-सहीह क़ौल यही है के जिस तरह क़ुरबानी के दिनों में हिस्सा रख सकते हैं उसी तरह क़ुरबानी के दिनों के अलावह भी रख सकते हैं। (बशर्ते के किसी की भी निय्यत सिर्फ गोश्त खाने या गोश्त बेचने की न हो)

📗किताबुल मसाइल २/३४० बा हवाले
📘किफ़ायतुल मुफ़्ती वगैरह

و الله اعلم بالصواب