aaj ka sawal hindi

कया मरहूम की रूह घर पर आ सकती है ?
इस बारे हज़रत अली रदि अल्लाहू अन्हु की रिवायात है तो उस का क्या जवाब है ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

मुरदे की रूह अगर नेक है तो वह बदबुदार दुन्या में नहीं आएगी, यहाँ के अहवाल दूसरे नेक मुर्दों के ज़रिये उन को मालूम हो जाते है।

ओर रूह बद (बुरी) है तो अज़ाब के फ़रिश्ते उन को छोड़ते नहीं है।

मरने के बाद क्या होगा

लिहाज़ा रूह आने के बारे में जितनी भी रिवायात है सब मव्जूआ मनघडत और बनावटी है।

ये बात हज़रत मुल्ला अली करि रह.ने जिन्हे बरेलवी हज़रात भी मानते है अपनी किताब “तबक़ातुल हनफिययह” में कही है।

फ़तवा महमूदियाः १/६०९

ओर ये रिवायात अक़्ल के भी खिलाफ है के जब उन की पुकार चीख चीख कर केहने के बा वजूद कोई सुनता नहीं है, मायूस हो जाती है तो हर हफते क्यूँ आती है, इसाले सवाब की ऐसी मुहताज हर रूह नहीं होती है, उस रिवायात में सब को मुहताज बना दिया है।

हिजरी तारीख़ : १४/ रबीउल आखर ~ १४४१ हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा व सेक्रेटरी जमीयते उलमा सूरत शहर, गुजरात, इंडिया

 

हुज़ूर सल्लाहु अलयही वसल्लम के बाद भी किसी को नबी मानना, मसलन मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादयानी या शकील बिन हनीफ को नबी मानने वाले का क्या हुक्म है ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

हज़ूर सलल्लाहु अलयही वसल्लम क़यामत तक के लिए आखरी नबी है।

आप के बाद भी कोई किसी और को किसी भी तरह का नबी माने वह तमाम अहले सुन्नत वल जमाअत जे नज़दीक ईस्लाम के दायरे से खारिज और क़ाफ़िर है।

फतावा महमूदियह

फतावा रहीमियह से माखूज

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१३ जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी

(मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

 

अल्लाह त’आआ ने उम्मत की हिदायत के लिए कुल कितने नबी भेजे हैं ?

कया १ लाख २४ हज़ार भेजे थे ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

नबियों (अलैहिस्सलाम) की सहीह ता’दाद अल्लाह त’आला के अलावा कोई नहीं जानता।

१ लाख २४ हज़ार केहना भी सहीह नहीं,

कयूं के इस से कम होंगे तो गैर नबी को नबी मानना लाज़िम आएगा (समझा जायेगा) और इस से ज़्यादा होगे तो बा’ज नबीयों पर ईमान लाना छुत जाएगा,

तमाम नबी पर ईमान लाना ज़रूरी है।

इस लिए कमो बेस-अंदाज़न १ लाख २४ हज़ार नबी भेजे है, अगर ऐसा कहा जाये तो सहीह होगा।

(बहिश्ती ज़ेवर और इस्लामी अक़ाइद से मुस्तफ़द)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

११ जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

एक्सीडेंट या किसी के क़त्ल करने की वजह से मरने वाला अपने वक़्त से पहले मर गया ऐसा केह सकते है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

एक्सीडेंट या क़त्ल होने वाला भी अपनी ही लिखी हुवी मौत से अपने वक़्त पर ही मरता है। वक़्त से पहले कोई मर नहीं सकता।

(मुईनुल अक़ाइद सफा ६)

و الله اعلم بالصواب

ईस्लामी तारीख़

२१ जुमाद अल उला १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

क्रिश्मस डे क़रीब आता है तो स्कूल में फंक्शन होता है, उस में हमारे बाज़ मुस्लिम बच्चों को सांताक्लॉस का रूप बनाने को कहा जाता है, और बहोत सो को उस की टोपी पहनाई जाती है, तो क्या बचचे ये लिबास इस्लामी ऐतिबार से पहन सकते है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

इस्लामी शरीयत में गैर क़ौम से मुशाबेहत इख़्तियार करने की मुमानिअत-मना होना आया है, हदीस शरीफ में है जिस ने जिस क़ौम की मुशाबेहत-कॉपी इख़्तियार की उस का हश्र क़यामत में ज़िंदा किया जाना उसी के साथ होगा.

क्रिश्मस डे- (नाताल) नसारा का तेहवार है, उस में सांताक्लॉस का लिबास इख़्तियार करना उन की मज़हबी रस्म है,

लिहाज़ा सांताक्लॉस का रूप इख़्तियार करने की या उस की टोपी पहनने की बच्चों को भी इजाज़त न होगी, इस से उन के मज़हब का रंग उन पर चढ़ता है, और उन की गलत तरबियत होती है,

जिस का गुनाह तवज्जुह न देने की वजह से माँ बाप को होता है, लिहाज़ा उस से अपनी अवलाद को बचाना ज़रूरी है.

माखूज़ अज मजमउज़जवाएद ५/१६९

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१७ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

११/गियारहवी की नियाज़ खाने की हक़ीक़त क्या है ?

क्या मालदार आदमी गियारहवी का खाना खा सकता है ?

और गरीबो का उस दावत में शिरकत का क्या हुक्म है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

किसी भी इस्लामी महीने की गियारहवी (११) तारीख को महबूबे सुब्हानी पीराने पीर हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रह. की निय्यत से जो खाना पकाया जाता है उसे गियारहवी कहते हैं.

इख्तिलाफ ए उम्मत और सिरते मुस्तक़ीम

हज़रत मुफ़्ती युसूफ लुधयानी शहीद रह. की किताब

गर वह खाना हज़रत शैख़ रह. के नाम की मन्नत का हो तो वह हराम है, और उनके नाम की मन्नत मानना शिर्क है, मन्नत सिर्फ अल्लाह के नाम की ही मानना जाइज़ है.

किसी ऊँचे से ऊँचे बुलंद रुतबा मख्लूक़ के नाम की मन्नत मानना हराम और शिर्क है, और ऐसी हराम मन्नत का खाना खाना मालदार और गरीब किसी के लिए भी जाइज़ नहीं.

(शामी: २/१२८ २/२९८)

अगर हज़रत शैख़ जीलानी रह. के इसाले सवाब की गरज़ से अल्लाह ता’अला के नाम की मन्नत मानी हो, या मन्नत माने बगैर हज़रत शैख़ के इसाले सवाब के खातिर पका कर खिलाये तो ऐसा खाना गरीब लोग खा सकते हैं, मालदार नहीं खा सकता, क्यों के मन्नत का खाना मालदार के लिए जाइज़ नहीं, और गरीबों को खिला कर सदक़ह का इसाले सवाब कर सकते हैं, इसाले सवाब के खाने के लिए कोई तारीख और दिन ज़रूरी समझना यह बिदअत और नाजाइज़ है.

(शामी: १ फतावा महमूदियाः: १० /९८)

(जुब्दतुल फतावा गुजराती: १/२०६)

(फतावा सेक्शन)

मुफ़्ती सिराज चिखली नवसारी गुजरात

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१५ रबी उल आखर १४४० हिजरी

तस्दीक़

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

वो कोनसे आ’माल है जो आशूरह के दिन याने १० मुहर्रम को सुन्नत से साबित नहीं है ?

जवाब   حامدا و مصلیا و مسلما

१) ग़ुस्ल करना यानि खास आशूरह के दिन की निय्यत से.

२) कपडे बदलना.

३) खुशबू लगाना.

४) सुरमा लगाना.

५) मख़सूस नमाज़ अदा करना.

६) मरसिया ख्वानी करना.

७) मस्जिद में जमा हो कर नवाफिल पढ़ना.

८) मातम करना.

९) क़ब्रो पर मिटटी डालना.

१०) ता’जिया बनाना.

११) नंगे सर रहना.

१२) नंगे पैर रहना.

१३) काला कपडा पहनना.

१४) सर पर खाक डालना.

१५) सर को पीटना.

१६) बच्चों को क़ैदी फ़क़ीर बनाना.

१७) शरबत बनाना.

१८) शरबत पिलाना.

१९) मख़सूस क़िस्म का खाना बनाना.

२०) सिर्फ मुहर्रम ही में सबील लगाना.

फतावा महमूदियह ३/२७४ और उसके आस पास

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २५६०⭕

काला लिबास पहनना कैसा है ?
ख़ुसूसन मुहर्रम में बाज़ लोग इस को एहतेमाम से पहेनते हैं।
इस का क्या हुक्म है ?

🔵जवाब🔵

حامد و مصلیا و مسلما

काला लिबास पहनना हुज़ूर صل اللہ علیہ وسلم से और सहाबा رضی اللہ عنہم से साबित है।
इसलिए सियाह लिबास पहेनना बाज़ फुक़्हा ने मुस्तहब क़रार दिया है।

📕फतावा हिन्दीययह ५/३३०

लेकिन ख़ास तौर से इस ज़माने में शियों का शिआर (ख़ास मज़हबी निशानी) होने की वजह से मुहर्रम के महीने में और जहां शियों का गलबह और ज़ोर हो वहाँ उस से हमेशा बचना ज़रूरी है।

📕किताबुल फ़तावा ६/९२
📗अहसनुल फ़तावा ८/६३ से माखूज
و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २५८९⭕

सफर का महीना शुरू हो चूका है. आप सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम का इरशाद है के सफर के महीने में सारी आफ़ते और मुसीबते ज़मीन पर उतरती है इस लिए इन सब से हिफाज़त के लिए हर नमाज़ के बाद ११ मर्तबा या बासितु या हाफिज़ू का विरद करे.
क्या ये बात सहीह है ?
क्या सफर महीना मनहूस है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

इस्लाम में कोई महीना दिन कोई घडी मनहूस और भारी नहीं।

नहूसत अल्लाह की लानत, फिटकार, और गजब नमाज़ छोड़ने से, सुदी लेनदेन, ज़ीना, नाच गाना, बेपर्दगी और बेहयाई वगेरह गुनाह जो घर घर में आम है, उससे आती है, लिहाजा इससे बचने के एहतमाम करना चहिए।

और किसी आफत का नाज़िल होना किसी महीने के साथ खास नहीं, ऐसा अक़ीदह इस्लामी अक़ीदह नहीं. ऐसा अपशुगुन और बद फाली जाहिल लोग क़ौम लेती है, इस्लाम में इस की इजाज़त नहीं।

ऊपर जो हदीस पेश की गई है वह मव्जूआ-मनघडत है।

लिहाज़ा गलत अक़ीदह के साथ किसी खास विरद का एहतमाम भी दुरुस्त नहीं।

📗अगलातुल अवाम सफा ३७ से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नंबर २६०२⭕

कीसी का इन्तिक़ाल हो जाये तो घरवालों को कितने दिन सोग मनाना जाइज़ है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

मरहूम की बेवा के अलावा दूसरे घरवालों और रिशतेदारों को ३ दिन से ज़यादा सोग मनाना जाइज़ नहीं।

(लिहाज़ा आजकल जो लोग ३ दिन बाद भी तय शुदा निकाह नहीं करते या निकाह, ईद वगैरह ख़ुशी के जाइज़ मोके पर नहीं जाते ये सहीह नहीं।)

📗जदीद मुआमलात के शरई अहकाम ३/२५३

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नं. २६०५⭕

जनाज़ह को कांध देते वक़्त क्या पढ़ना चाहिये

🔵आज का जवाब🔵

जनाज़ाह के साथ ज़हरन कलिमा तैयब पढ़ना बिदअत है.

अहसनुल फतवा १ / ३३८

फतावा महमूदियाह २ / ४०१

आलमगीरी १ / १०४

जनाज़ाह के साथ आहिस्ता ज़िक्र की इजाज़त है , ज़ोर से पढ़ने की इजाज़त नहीं, मकरूह है , इस में रियाकारी का भी अंदेशा है.
जनाज़ाह के साथ दिल दिल मे अल्लाह का ज़िक्र किया जाये जहरण – ज़ोर से { लॉउडली } ज़िक्र करना मकरूह है , चलते चलते तनहा तनहा ज़िक्र करने में हर्ज नहीं .

फतावा राहीमीया ६ / १९४

शामी १ / ८३८ ,

बाहररूरीक २ / १९२

जनाज़ाह को ख़ामोशी के साथ ले जाने का हुक्म है, हदीस में है के जनाज़ा ले जाते वक़्त ख़ामोशी इख्तियार करना अल्लाह को पसंदीदह है .

फतावा राहीमीया ८ / १८५

जनाज़ाह के साथ चलने वालो को खामोश रहना लाज़िम है , और बुलंद आवाज़ से ज़िक्र करना या क़ुरआन की तिलावत करना मकरूह है और अगर कोई शख्स ज़िक्र करना चाहे तो दिल मे ज़िक्र करे .

शरहे तहावी १ / १६२

फुक़हा ने जनाज़ाह के साथ ज़ोर से ज़िक्र करने को मकरूह तहरीमी क़रार दिया है

अल बहरूररेक मे है के जनाज़ाह के साथ चलने वालो के लिए मुनासिब है तावील ख़ामोशी इख्तियार करे, ज़िक्र , किराते क़ुरआन वग़ैरह करते हुवे आवाज़ बुलंद करना मकरूह है और मकरूह से मुराद मकरूहे तहरीमी है

किताबुल फतावा ३ / १८८

देखा देखि कालिमा ए शहादत ला इलाह इल्लल्लाह ज़ोर से कहना बांध करना चाहिये .

मौलाना अमीन पाटन

तस्दीक़
मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन सूरत गुजरात इंडिया

आज का सवाल नंबर २६८८

हुज़ूर सल्लल्लाहू अलयही वसल्लम के बाद भी किसी को नबी मानना, मसलन मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादयानी या शकील बिन हनीफ को नबी मानने वाले का क्या हुक्म है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

हज़ूर मुहम्मद सल्लल्लाहू अलयही वसल्लम क़यामत तक के लिए आखरी नबी है।

आप के बाद भी कोई किसी और को किसी भी तरह का नबी माने वह तमाम अहले सुन्नत वल जमाअत जे नज़दीक ईस्लाम के दायरे से खारिज और क़ाफ़िर है।

वोह मुसलमान है ही नहीं, अगर चे वोह कलमा और क़ुरान पढ़ता हो।

📗फतावा महमूदियह
📚फतावा रहीमियह से माखूज

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.