रूहों का आना १९४१

कया मरहूम की रूह घर पर आ सकती है ?
इस बारे हज़रत अली रदि अल्लाहू अन्हु की रिवायात है तो उस का क्या जवाब है ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

मुरदे की रूह अगर नेक है तो वह बदबुदार दुन्या में नहीं आएगी, यहाँ के अहवाल दूसरे नेक मुर्दों के ज़रिये उन को मालूम हो जाते है।

ओर रूह बद (बुरी) है तो अज़ाब के फ़रिश्ते उन को छोड़ते नहीं है।

मरने के बाद क्या होगा

लिहाज़ा रूह आने के बारे में जितनी भी रिवायात है सब मव्जूआ मनघडत और बनावटी है।

ये बात हज़रत मुल्ला अली करि रह.ने जिन्हे बरेलवी हज़रात भी मानते है अपनी किताब “तबक़ातुल हनफिययह” में कही है।

फ़तवा महमूदियाः १/६०९

ओर ये रिवायात अक़्ल के भी खिलाफ है के जब उन की पुकार चीख चीख कर केहने के बा वजूद कोई सुनता नहीं है, मायूस हो जाती है तो हर हफते क्यूँ आती है, इसाले सवाब की ऐसी मुहताज हर रूह नहीं होती है, उस रिवायात में सब को मुहताज बना दिया है।

हिजरी तारीख़ : १४/ रबीउल आखर ~ १४४१ हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा व सेक्रेटरी जमीयते उलमा सूरत शहर, गुजरात, इंडिया

अभी भी किसी को नबी मानने वाले का हुक्म १६४४

हुज़ूर सल्लाहु अलयही वसल्लम के बाद भी किसी को नबी मानना, मसलन मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादयानी या शकील बिन हनीफ को नबी मानने वाले का क्या हुक्म है ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

हज़ूर सलल्लाहु अलयही वसल्लम क़यामत तक के लिए आखरी नबी है।

आप के बाद भी कोई किसी और को किसी भी तरह का नबी माने वह तमाम अहले सुन्नत वल जमाअत जे नज़दीक ईस्लाम के दायरे से खारिज और क़ाफ़िर है।

फतावा महमूदियह

फतावा रहीमियह से माखूज

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१३ जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी

(मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

 

नबियों अलैहिस्सलाम की ता’दाद के बारे में गलत फ़हमी १६४२

अल्लाह त’आआ ने उम्मत की हिदायत के लिए कुल कितने नबी भेजे हैं ?

कया १ लाख २४ हज़ार भेजे थे ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

नबियों (अलैहिस्सलाम) की सहीह ता’दाद अल्लाह त’आला के अलावा कोई नहीं जानता।

१ लाख २४ हज़ार केहना भी सहीह नहीं,

कयूं के इस से कम होंगे तो गैर नबी को नबी मानना लाज़िम आएगा (समझा जायेगा) और इस से ज़्यादा होगे तो बा’ज नबीयों पर ईमान लाना छुत जाएगा,

तमाम नबी पर ईमान लाना ज़रूरी है।

इस लिए कमो बेस-अंदाज़न १ लाख २४ हज़ार नबी भेजे है, अगर ऐसा कहा जाये तो सहीह होगा।

(बहिश्ती ज़ेवर और इस्लामी अक़ाइद से मुस्तफ़द)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

११ जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

 

एक्सीडेंट में मरने वाले की मौत १६२२

एक्सीडेंट या किसी के क़त्ल करने की वजह से मरने वाला अपने वक़्त से पहले मर गया ऐसा केह सकते है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

एक्सीडेंट या क़त्ल होने वाला भी अपनी ही लिखी हुवी मौत से अपने वक़्त पर ही मरता है। वक़्त से पहले कोई मर नहीं सकता।

(मुईनुल अक़ाइद सफा ६)

و الله اعلم بالصواب

ईस्लामी तारीख़

२१ जुमाद अल उला १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

क्रिसमस डे में सांता क्लॉस बनाना १५८७

क्रिश्मस डे क़रीब आता है तो स्कूल में फंक्शन होता है, उस में हमारे बाज़ मुस्लिम बच्चों को सांताक्लॉस का रूप बनाने को कहा जाता है, और बहोत सो को उस की टोपी पहनाई जाती है, तो क्या बचचे ये लिबास इस्लामी ऐतिबार से पहन सकते है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

इस्लामी शरीयत में गैर क़ौम से मुशाबेहत इख़्तियार करने की मुमानिअत-मना होना आया है, हदीस शरीफ में है जिस ने जिस क़ौम की मुशाबेहत-कॉपी इख़्तियार की उस का हश्र क़यामत में ज़िंदा किया जाना उसी के साथ होगा.

क्रिश्मस डे- (नाताल) नसारा का तेहवार है, उस में सांताक्लॉस का लिबास इख़्तियार करना उन की मज़हबी रस्म है,

लिहाज़ा सांताक्लॉस का रूप इख़्तियार करने की या उस की टोपी पहनने की बच्चों को भी इजाज़त न होगी, इस से उन के मज़हब का रंग उन पर चढ़ता है, और उन की गलत तरबियत होती है,

जिस का गुनाह तवज्जुह न देने की वजह से माँ बाप को होता है, लिहाज़ा उस से अपनी अवलाद को बचाना ज़रूरी है.

माखूज़ अज मजमउज़जवाएद ५/१६९

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१७ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

११ ग्यारहवी की नियाज़ १५८६

११/गियारहवी की नियाज़ खाने की हक़ीक़त क्या है ?

क्या मालदार आदमी गियारहवी का खाना खा सकता है ?

और गरीबो का उस दावत में शिरकत का क्या हुक्म है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

किसी भी इस्लामी महीने की गियारहवी (११) तारीख को महबूबे सुब्हानी पीराने पीर हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रह. की निय्यत से जो खाना पकाया जाता है उसे गियारहवी कहते हैं.

इख्तिलाफ ए उम्मत और सिरते मुस्तक़ीम

हज़रत मुफ़्ती युसूफ लुधयानी शहीद रह. की किताब

गर वह खाना हज़रत शैख़ रह. के नाम की मन्नत का हो तो वह हराम है, और उनके नाम की मन्नत मानना शिर्क है, मन्नत सिर्फ अल्लाह के नाम की ही मानना जाइज़ है.

किसी ऊँचे से ऊँचे बुलंद रुतबा मख्लूक़ के नाम की मन्नत मानना हराम और शिर्क है, और ऐसी हराम मन्नत का खाना खाना मालदार और गरीब किसी के लिए भी जाइज़ नहीं.

(शामी: २/१२८ २/२९८)

अगर हज़रत शैख़ जीलानी रह. के इसाले सवाब की गरज़ से अल्लाह ता’अला के नाम की मन्नत मानी हो, या मन्नत माने बगैर हज़रत शैख़ के इसाले सवाब के खातिर पका कर खिलाये तो ऐसा खाना गरीब लोग खा सकते हैं, मालदार नहीं खा सकता, क्यों के मन्नत का खाना मालदार के लिए जाइज़ नहीं, और गरीबों को खिला कर सदक़ह का इसाले सवाब कर सकते हैं, इसाले सवाब के खाने के लिए कोई तारीख और दिन ज़रूरी समझना यह बिदअत और नाजाइज़ है.

(शामी: १ फतावा महमूदियाः: १० /९८)

(जुब्दतुल फतावा गुजराती: १/२०६)

(फतावा सेक्शन)

मुफ़्ती सिराज चिखली नवसारी गुजरात

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१५ रबी उल आखर १४४० हिजरी

तस्दीक़

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

१० मुहर्रम में वो बातें जो गलत है | १४८५

वो कोनसे आ’माल है जो आशूरह के दिन याने १० मुहर्रम को सुन्नत से साबित नहीं है ?

 

जवाब   حامدا و مصلیا و مسلما

१) ग़ुस्ल करना यानि खास आशूरह के दिन की निय्यत से.

२) कपडे बदलना.

३) खुशबू लगाना.

४) सुरमा लगाना.

५) मख़सूस नमाज़ अदा करना.

६) मरसिया ख्वानी करना.

७) मस्जिद में जमा हो कर नवाफिल पढ़ना.

८) मातम करना.

९) क़ब्रो पर मिटटी डालना.

१०) ता’जिया बनाना.

११) नंगे सर रहना.

१२) नंगे पैर रहना.

१३) काला कपडा पहनना.

१४) सर पर खाक डालना.

१५) सर को पीटना.

१६) बच्चों को क़ैदी फ़क़ीर बनाना.

१७) शरबत बनाना.

१८) शरबत पिलाना.

१९) मख़सूस क़िस्म का खाना बनाना.

२०) सिर्फ मुहर्रम ही में सबील लगाना.

 

फतावा महमूदियह ३/२७४ और उसके आस पास

و الله اعلم بالصواب

 

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.