ज़कात के लिए साल गुजरने की शर्त १६९७

कया ज़कात वाजिब होने के लिए हर माल पर साल गुज़रना ज़रूरी है ? दरमियान में माल ज़कात के निसाब से घट गया और दरमियान में नया माल भी आता जाता रहा सब पर ज़कात है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

ज़कात के निसाब पर साल गुज़रना काफी है, हर हर माल पर साल गुज़रना ज़रूरी नहीं, साल पूरा होते ही मवजूदह सब माल मिलकियत की ज़कात दे, चाहे बाज़ माल १ महीना या हफ्ते पहले ही आया हो, तो उस की भी ज़कात दे.

साल के शुरू में और साल के आखिर में ज़कात का निसाब यानी साढ़े बावन टोला चांदी की क़ीमत का मालिक होना काफी है,

दरमियान में माल की मिक़्दार से कम रहा तब भी पुरे निसाब की ज़कात वाजिब होगी।

किताबुल मसाइल जिल्द २ सफा १३३ से माखूज़
बहवला मारकियूल फलाह ३८९
आलमगीरी १/१७५

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
०९~शा’बान~अल~मुअज़्ज़म~१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

बीमे (इन्शुरन्स) की रक़म पर ज़कात १६९६

दुकान और जीवन बिमा- लाइफ ईनसूरन्स क़ानूनी मजबूरी में लिया हो तो उस की जमा की हुयी रक़म की ज़कात निकलना ज़रूरी है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

दुकान, कारोबार और कार बिमा की रक़म वापस मिलना यक़ीनी और ज़रूरी नहीं, इसलिए उसपर ज़कात वाजिब नहीं।

अल्बत्ताह जीवन बिमा में हर हाल में रक़म सूद के साथ वापस मिलती है, इसलिए भरी हुयी असल पूरी रक़म मिलने के बाद गुज़रे हुवे तमाम सालों की ज़कात वाजिब होगी (हर साल उस की ज़कात पेशगी-एडवांस निकाल सकते है, ता के एक साथ निकालने का बोज न आये) और जो रक़म जियादह मिलेगी वह हराम और सूद है इसलिए उस पर ज़कात वाजिब नहीं।

(किताबुल मसाइल २/२१७)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
०८~शा’बान~अल~मुअज़्ज़म~१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

किराये पर दिए हुवे मकान पर ज़कात १६९५

एक शख्स के पास अपने रहने के अलावा बहुत से मकान है और उन मकानों को किराये पैर देने के लिए ख़रीदा है ताकि उसका रुपया भी महफूज़ रहे ऐसे मकानात पर ज़कात फ़र्ज़ है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

पूछी हुई सूरत में ज़कात फ़र्ज़ न होगी।

किराये के वह मकानात चाहे कितनी ही क़ीमत के हो उस को किराये पर देने की निय्यत से खरीदा है, अल्बत्ता उनके किराये से हासिल शुदा रक़म निसाब के बा-क़द्र या उससे ज़्यादा जमा हो, और साल भी गुज़र जाये, या दूसरे माल का साल पूरा हो रहा हो तो इन रक़म का भी उस के साथ हिसाब किया जाये, तो इस तरह उसकी ज़कात देना साल पूरा होने से पहले भी ज़कात निकलना ज़रूरी हो जायेगा।

(आप के मसाइल और उनका हल जिल्द -६/१०९)

(फ़िक़हुल इबादात २८१)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
०६~शा’बान~अल~मुअज़्ज़म~१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

प्रोविडेंट फंड पर ज़कात (पार्ट १) १६९१

 

प्रोविडेंट फंड में जो रक़म मुलाज़िम की तनख्वाह से काटी जाती हे और उस पर माहाना या सालाना इज़ाफ़ा किया जाता हे इस पर ज़कात का क्या हुक्म है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

ये सब मुलाज़िम की खिदमत का वो मुआवज़ा हे जो अभी उसके क़ब्ज़े में नहीं आया लिहाज़ा वो महकमे-कंपनी के ज़िम्मे मुलाज़िम का क़र्ज़ हे।

ज़कात के मामले में फुक़्हा ए कीराम रह. ने क़र्ज़ की ३ क़िस्मे बयान फ़रमाई हे जिनमे से बाज़ पर ज़कात वाजिब होती हे और बाज़ पर नहीं होती,

वसूल होने के बाद जाब्ते-काइदह के मुताबिक़ ज़कात वाजिब होगी जिसकी तफ्सील ये हे,

मुलाज़िम अगर पहले से साहिबे निसाब नहीं था मगर उस रक़म के मिलने से साहिबे निसाब हो गया तो वसूल होने के वक़्त से एक क़मरी-इस्लामी साल पूरा होने पर ज़कात वाजिब होगी, बा-शर्ते उस वक़्त तक ये शख्स साहिबे निसाब रहे,

अगर साल पूरा होने से पहले माल खर्च होकर इतना कम रह गया क साहिबे निसाब नहीं रहा तो ज़कात वाजिब नहीं होगी।

अगर खर्च या ज़ाया होने के बावजूद साल के आखिर तक माल बा-क़द्रे निसाब बचा रहा तो जितना बाक़ी बच गया सिर्फ उसकी ज़कात वाजिब होगी, जो खर्च हो गया उसकी नहीं होगी।

و الله اعلم بالصواب

(बाक़ी कल इंशा अल्लाह)

(फ़िक़हुल इबादात २७७)

हक़्क़ का दाई अंसार अहमद

तस्दीक़
मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

इस्लामी तारीख़
०३~शाबान~अल~मुअज़्ज़म~१४४०~हिज़री

प्रोविडेंट फंड की ज़कात, पार्ट २. क़र्ज़ा १६९४

 

साहिबे निसाब शख्स को प्रोविडेंट फंड की ज़कात कितने रुपये आये तो निकालनी है ? और कब से निकालनी है ? ये पैसे क़ब्ज़े में आएंगे उस वक़्त से ही उस का शुमार कर सकते है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

अगर ये मुलाज़िम पहले से साहिबे निसाब था तो फंड की रक़म चाहे मिक़्दारे निसाब से कम मिले या ज़्यादा उसका साल अलग से शुमार नहीं होगा, जो माल पहले से उसके पास था जब उसका साल पूरा होगा यानि पहले से मौजूदा निसाब की ज़कात निकालने की तारिख आएगी तो फंड की वसूल शुदा रक़म की ज़कात भी उसी वक़्त वाजिब हो जाएगी, चाहे उस नयी रक़म पर एक दिन ही गुज़रा हो,

ज़कात की ये तफ्सील इमाम ए आज़म अबू हनीफा रह. के कॉल पर हे और फतवा इसी पर है।

साहिबैन रह. के कॉल के मुताबिक़ क़र्ज़ की हर क़िस्म पर ज़कात फ़र्ज़ हे, अगर कोई अहतयात और तक़वे पर अमल करते हुए गुज़िश्ता तमाम सालो की ज़कात अदा करे तो बेहतर हे, उसका बेहतर तरीक़ा ये हे के जबसे ये मुलाज़िम साहिबे निसाब हो उस वक़्त से हर साल के ख़त्म पर हिसाब कर लिया जाये के अब उसके फंड में कितनी रक़म जमा हे, जितनी रक़म जमा हे उसकी ज़कात अदा कर दे, इसी तरह हर साल करता रहे.

फ़िक्हुल इबादात २७७
महमूदुल फतावा २/८२

و الله اعلم بالصواب

हक़्क़ का दाई अंसार अहमद

तस्दीक़ मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

इस्लामी तारीख़
०५~शा’बान~अल~मुअज़्ज़म~१४४०~हिज़री