aaj ka sawal hindi

नापाक बिस्तर पर सो गया था, पसीने की वजह से वह नापाक बिस्तर भीग गया।
तो क्या मेरा बदन नापाक हो गया?

जवाब:

حامدا و مصلیا و مسلما
अगर नापाकी का असर (रंग, बदबू) जिस्म में नहीं आया है तो जिस्म पाक है वरना नापाक है,
यानी अगर जिस्म में उस नापाकी का रंग या बदबू मह्सूस हो रही है तो जिस्म नापाक हो गया।

“नापाक बिस्तर पर सोना”

नुरुल ईज़ह बाबुल अन्जास
و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़: २७ मुहर्रमुल हराम १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

मेने वुज़ू किया, कुत्ता मस्जिद में दाखील हो रहा था उसे भगाने के लिए उसी भीगे हुवे क़दम से मस्जिद से बाहर उस जगह निकल गया, जहां लोग बैतुल खला के चप्पल उतारते हैं।

तो क्या मेरे पैर नापाक हैं?

जवाब:   حامدا و مصلیا و مسلما

‘वुज़ू के बाद नापाक ज़मीन पर’ चलना:

अगर आप के पैर पर उस नापाक जगह के असरात (पेशाब पाखाने की बदबू या नापाक ज़मींन की मिट्टी) लग गयी हो, तो पैर नापाक हैं, वरना पाक है।

नुरुल ईज़ह सफा १२८ दाभेल बाबुल अनजस
و الله اعلم بالصواب

“वुज़ू के बाद नापाक ज़मीन पर” चलना

इस्लामी तारिख: २० मुहर्रमुल हराम१४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

ऐरोप्लेन, ट्रैन, बस में नमाज़ का वक़्त ख़त्म होने के क़रीब हो, और भीड़ की वजह से वुज़ू पर क़ुदरत न हो, तो तयम्मुम करना चहिये, ऐसा पढ़ा था।
बाज़ मर्तबा तयम्मुम जिस पर करना जाइज़ है ऐसी कोई चीज़ पर भी क़ुदरत नहीं होती।
तो क्या करना चाहिए ?
नमाज़ क़ज़ा होने दे ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

पूछी हुई सूरत में भी नमाज़ क़ज़ा नहीं करना चाहिये, बगैर वुज़ू और तयम्मुम के नमाज़ पढेगा, बाद में क़ुदरत होने पर उस नमाज़ को लौटाए।

किताबुल मसाइल १/१८९
बा हवाला शामी ज़करिया १/१८५

हिजरी तारीख़ : १५ / रबीउल आखर ~ १४४१ हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा व सेक्रेटरी जमीयते उलमा सूरत शहर, गुजरात, इंडिया

 

चमड़े के मोज़े पर पैर धोये बगैर मसह कब तक कर सकते है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

मोज़े पहनने के बाद जब पेहली मर्तबा वुज़ू टूटे तब से लेकर मुक़ीम के लिए २४ घन्टे और शरई मुसाफिर के लीये ७२ घन्टे तक मोज़े पर मसह कर सकते है ।

(उम्दतुल फीकह से माखूज़)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१३ जुमाद अल उला १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया)

चमड़े के मोज़े पर मसह का क्या तरीक़ा है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

मोज़े के ऊपर से उंगली के सिरे से ऊपर की तरफ पिण्डली तक भिगी हुवी ३ उंगली से मसह करना फ़र्ज़ है,

५ उंगली से मसह करना मुस्तहब है,

दोनो पंजे के ऊपर की तरफ मसह एक साथ करे।

(उमद्तुल फ़िक़ह)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१२ जुमाद अल उला १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

कीसी शख्स ने पहले ऊनी या सूती मोजे पहन लिया, इस के ऊपर खूफफैन पेहन लिया, अब खफन पर मसह करता है, तो इस का मसह करना जाइज़ है या नहीं?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

सूती या ऊनी मोजे पहन कर इस पर खूफफैन पहन लिए जाएँ और उन पर मसह किया जाये तो इस तरह मसह करना जाइज़ है।

(मुस्तफीद अहसनुल फ़तवा ज़करिया २/४५)

(इम्दादुल फ़तवा ज़करिया १/८०)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

११ जुमाद अल उला १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

आज कल भारत और उसके अतराफ़ के मुल्कों में सर्दी पर रही है और पेर पर ठंडी का एहसास ज़ियादह होता है, मेने बा’ज उलमा को देखा के वह वुज़ू में मोज़ा नहीं उतारते और उसी पर मसह कर लेते हैं, तो शरीअत की रौशनी में बताये के मसह करने के लिए मोज़ा कैसा होना चाहिए ? नायलॉन के मोज़े पर मसह कर सकते हैं ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

तीन तरह के मोज़ों पर मसह जाइज़ है.

१. चमड़े के मोज़े जिस में पांव टखनों तक छुप जाये.

२. ऐसे ऊनि या सूती मोज़े जिस का टाला-शॉल चमड़े का हो.

३. ऐसे ऊनि या सूती मोज़े जो इतने मोटे और गाढ़े हो के सिर्फ मोज़े पहन कर तीन चार मील का रास्ता चलने से मोज़े न फ़टे.

नोट : १ मील = १.६ किलोमीटर्स

(ता’लिमुल इस्लाम २/२५)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१० जुमाद अल उला १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

सूबह में जनाबत (गुसल वाज़िब हो गया) पेश आ गई, फज्र की नमाज़ का वक़्त ख़तम होने के क़रीब है, सर्दी सख्त है, पानी गरम करने का वक़्त नहीं बचा,

तो तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़ सकते है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

सखत सर्दी में  पानी गरम करने का अगरचे वक़्त नहीं, नमाज़ क़ज़ा होने का खतरा बल्के यक़ीन हो तो भी ठंडे पानी से जब तक जान की हलाकत या आाज़ा की शाल-सुन होने का खतरा न हो पानी से वुज़ू ज़रूरी है, चाहे गरम कर के हो, गरम पानी पर क़ुदरत होते हुवे तयम्मुम की इजाज़त नहीं।

(कीताबुल मसाइल १/१८५  से माखूज)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०७ जुमाद अल उला १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

सर्दी के मौसम में जिस्म के अअज़ा पर वेसिलीन लगता है, वुज़ू में पानी से धोने के बाद चिकना पन बाक़ी रह जाता है, चिकनाहट को साबुन से न धोया जाये तो वुज़ू होगा या नहीं ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

पूछी हुयी सूरत में वेसिलीन की तेल (आयल) जैसी चिकनाहट का साबुन से निकालना ज़रूरी नहीं है,

चिकनापन बाक़ी रहने के बावजूद वुज़ू सहीह है.

(आलमगीरी जिल्द १/सफा ५ से माखूज़)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०६ जुमाद अल उला १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

मेने छोटा और बड़ा इस्तिंजा किया उसके बाद देखा के बैतुल खला में पानी नहीं था और कोई इंतिज़ाम न हो सका तो में वहाँ से उठ गया.

अब में ऐसी हालत में मस्जिद में आ सकता हु ? और नमाज़ पढ़ सकता हु ?

जवाब: حامدا و مصلیا و مسلما

अगर पेशाब और पखाना निकलने की जगह से आजु बाजु फैला नहीं है नपाकि सिर्फ नकलने की जगह पर ही लगी है तो इस्तिंजा करना सुन्नत है।

अगर नपाकि निकलने की जगह से आगे बढ़ गयी है और वह निकलने की जगह को छोड़ कर अंदाज़ा किया जाए तो पतली नजासत दिरहम याने हथेली की गहरायी से ज़ियादह न फैली हो तो भी उसका धोना सुन्नत है, और हथेली की गहरायी से ज़ियादह फैली हो तो उसका धोना वाजिब है.

और गढ़ी (जाड़ी, थिक) नजासत हो तो उसका फैलाव नहीं देखेंगे बल्के उसका वज़न देखेंगे, उसका वज़न एक दिरहैम याने ४ ग्राम ३७४ मिली ग्राम से ज़ियादह हो तो उसका धोना वाजिब है, ऐसी नजासत के साथ न मस्जिद में आना जाइज़, न उसकी नमाज़ होगी|

हां! दिरहम से कम होगी उसका धोना सुन्नत है तो उस हालत में मस्जिद में आ सकते है, नमाज़ भी हो जाएगी लेकिन उस कम नजासत को भी धो लेना बेहतर है, पूरा गुसल करने की ज़रूरत नहीं।

उम्दतुल फीकह १/३२५

मसाइलूल मीज़ान सफा ३८

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़: १९ सफर उल मुज़फ्फर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २६०९⭕

आज कल बारिश का मौसम है, तो उस्मे कभी चालु बारिश में हमारे कपडो पर छींटे उड़ते है,ओर कभी बारिश का पानी रोड वग़ैरह पर जमा हो जाता है और उसके छींटे उडते है।
तो क्या उसकी वजह से कपडा या बदन ना-पाक होगा या नहीं?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

बारिश में सडको पर बहने वाला पानी, अगर उस्मे ना-पाकी (गोबर,पेशाब
वगैरह) का असर (बदबु और रंग) वगैरह ज़ाहिर हो, जैसा के उमूमन शहरो वग़ैरह में जब पेहली बारिश होती है तब पेशाब, गोबर वगैरह का असर देखा जाता है तो ये पानी ना-पाक है,
अगर ये पानी कपडो या बदन पर लगता है तो कपडे ना-पाक हो जायेगे, उन कपडो को पाक करना ज़रूरी है, उसी के साथ नमाज़ सही नहीं होगी।

लेकिन अगर बारिश होती रही और गन्दगी बेह कर चली गयी,ओर अब पानी साफ़ सुथरा नज़र आने लगा, या सड़क पहले ही से साफ़ सुथरी थी और उस पर पानी बहा, या दिहात के कच्चे रास्तों पे पानी मिटटी के साथ घुल मिल गया और उस्मे भी कोई ना-पाकी का असर नहीं दीख रहा तो वो पानी ना-पाक नहीं होगा।
लिहाज़ा वो पानी कपडे या बदन पर लगे तो कपडा या बदन ना-पाक नहीं होगा।

बारिश के ज़माने में कीचड़ के छिंटे कपडो पर लग जाते है उसके बारे में तफ़सील ये है,
अगर कोई ऐसा शखस के जिसको बार बार कीचड़ वाले रास्ते से गुज़ारना पडता है और उसके लिए हर बार कपडे का धोना दुस्वार हो तो ऐसे शखस के हक़ में ज़रूरत की वजह से रास्ते के छींटे मुआफ है, अगर चे ज़्यादह मिक़्दार में ही क्यूँ न हो,और उसी छींटे वाले कपडो के साथ ही उसकी नमाज़ दुरुस्त हो जायेगी।

लेकिन ऐसा शखस जिस को बार बार रास्तो से गुजरने की ज़रूरत नहीं है और वो इन छींटों से बच भी सकता हो तो उसके लिए थोड़े छींटे तो मुआफ है,
लेकिन अगर ऐसे शखस के कपडे या बदन पर ज़्यादह मिक़्दार में छींटे लग जाये तो उसके लिए मुआफ नहीं है, उसके लिए उसे धोकर ही नमाज़ पढ़ना दुरुस्त होगा।

📗किताबुल मसाइल १/१०१

و الله اعلم بالصواب