aaj ka sawal hindi

अरबी मदारिस और मकातिब के असातीजाः (उस्ताद) को तब्लीगी जमा’त में जाने के लिए माहना (मंथली) तीन दिन या सालाना (इयरली) एक चिल्लाह या ज़िन्दगी के चार महीने या एक साल की छुट्टी तनखाह के साथ दी जा सकती है या नहीं?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

अगर ज़रूरत हो तो दी जा सकती है. ता’अलीम का मक़सूद दीन की इशाअत है, आखिर मद्रसह वाले मद्रसह के पैसे से रिसालाह भी निकालते हैं, मद्रसह के पैसे से वाअज़ (बयान) के लिए भी भेजते हैं, जलसों में शिरकत के लिए भी भेजते हैं, यह सब के सब ता’अलीम के मक़ासिद हैं, अगर वहाँ के लोग इस सफर को मुनासिब समझते हैं और उसकी ज़रूरत भी है तो वहाँ (जमा’त, तरबियती कैम्प में तन्खा के साथ छुट्टी) कर सकते हैं.

(हक़ीक़त-ए-तब्लीग सफा ११०)

हज़रत सैय्यद मुफ़्ती अब्दुर रहीम लाजपुरी रहमतुल्लाह अलैहि लिखते हैं के ; मदारिस वाले मुदर्रिस (उस्ताज़) बढ़ाये. मद्रसह की ईमारत में काफी से ज़ाइद पैसे खर्च कर देते हैं. हाला के मद्रसह की ईमारत मक़सूद बिज़ ज़ात नहीं,  मक़सूद ए असली ता’अलीम है, फिर असातिज़ा के इज़ाफ़े और उनकी तनख्वाहों (सैलरी) के इज़ाफ़े में कोताही क्यों की जाए ?

खुलासा : यह है के ता’अलीमी काम के साथ तब्लीग में मशगुली भी होनी चाहिए, दीनी अंजुम (कमीटी) तब्लीगी काम की ज़िम्मेदारी से सुबुक दोष (बरी) नहीं हो सकते, लिहाज़ा ता’अलीम के साथ तब्लीग में भी दिलचस्पी लें और मुदर्रिसीन को जारी वज़ीफ़े (तनख्वाह) के साथ तब्लीगी काम के लिए इजाज़त दें.

शैखुल इस्लाम हज़रत मदनी रहमतुल्लाह अलैहि का मलफ़ूज़ इसी क़िस्म के एक सवाल के जवाब में तहरीर फरमाते हैं के ; मुझ को यह मालूम हुवा है के ब’आज मिम्बराने शूरा को उन मुदर्रिसीन की तनख्वाहों के जारी (चालू) रखने के मुताल्लिक़ ऐतराज और शुबहात हैं. मुसलमानो के इदारे ता’लीमिययह सिर्फ ता’अलीमी खिदमत अंजाम देने के लिए नहीं बनाये गए, बल्कि मुसलमानो की मज़हबी और दीनी और दूसरी ज़रूरी खिदमत भी उनके फ़राइज़ में से हैं. यही वजह है के जंग ए रूम और रूस के ज़माने में हज़रत नानौतवी रहमतुल्लाह अलैहि ने दौरे किये और एक अज़ीमुषशान मिक़्दार चंदे की जमा करके तूर्की को भेजी, उस ज़माने में दारुल उलूम देवबंद में छुट्टी रही. (ता’अलीम बंध रही) और तनख्वाहें दी गई.

शुद्धि और संगठन वगैरह की नहूसत के ज़माने में मालिकाना राजपूतों वगैरह इलाक़े में मुदर्रिसीन और उलमा के वुफूद (जमा’तें) भेजी गयी और उनकी तनख्वाहें जारी रखी गयी.

(फतावा रहीमियह जदीद जिल्द ४ सफा १४५ किताबुल इल्म व उलमा)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२७ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

आज का सवाल नो.२६७६

औरतों का अपने महरम के साथ तब्लीगी जमात में जाना कैसा है?
ज़ैद अपनी बीवी को लेकर बम्बई से लंदन इतनी दूर तब्लीगी जमात में जानेवाले है, उस के छोटे बच्चे हैं, जिस को उस की नानी सँभालने तैयार है तो इन हालत में मस्तुरात का जमात की शकल में दूर दराज़ का सफर बगरज़े तब्लीग करना जाइज़ है या नहीं?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

तब्लीगी जमात का मक़सद दीन सीखना उस को पुख़्ता करना और दूसरों को दीन सिखने और पुख़्ता करने के लिए आमद-तैयार करना है, और इस जज़्बे को आम करने के लिए लम्बे लम्बे सफर इख़्तितार किये जाते हैं, जिस तरह मर्द दीन को समझने और पुख्ता करने के मुहताज हैं औरतें भी मुहताज हैं, और घरोंमे आम तोर पर इस का इंतेज़ाम नहीं है, इसलिए अगर लंदन या किसी भी दूर दराज़ मक़ाम पर महरम के साथ शरीअत की हदूद पाबन्दी का लिहाज़ रखते हुवे जाएँ और किसी के हुक़ूक़ जाये न हो तो शरअन उस की इजाज़त है. बल्कि दीनी ऐतिबार से मुफीद और अहम् है, अगर बच्चे इतने छोटे नहीं हैं के बगैर वालिद के तड़पेंगे और उनकी परवरिस नहीं हो सकेगी और बच्चों की नानी उन की देख भल इत्मीनन बख्श तरीके पर कर लेंगी तो फिर इज़ाजत है, खुदा पाक इस सफर में बरकत दे नुसरत फरमाए और कामयाब वापस लाये बच्चों को आफ़ियत से रखे.

📗फतवा महमूदिया ४/२६५

📝 मस्तूरात के साथ जमात में जाने के जाइज़ होने का फतवा देनेवाले मुफ्तियाने किराम के अस्मा ऎ गिरमी

👇दारुल उलूम देवबंद से👇

१ हजऱत.मुफ़्ती महमूद हसन गंगोही साहब रह

२ हजऱत मुफ़्ती निजामुद्दीन साहब रह

३ हजऱत.मुफ़्ती हबीबुर रहमान खैराबादी दामत ब रकातुहुम
मज़ाहिर उल उलूम सहारनपुर से

४ हजऱत मुफ़्ती मुज़फ्फर हुसैन साहब रह

५ हजऱत मुफ़्ती सईद मज़हिरी साहब रह
शाही मुरादाबाद से

६ हजऱत मुफ़्ती सलमान मंसूरपुरी साहब दामत बरकातुहुम
लखनव से

७ हजऱत मुफ़्ती मुहम्मद ज़हूर नदवी साहब

८ हजऱत मवळना युसूफ साहब बिन्नोरी

९ हजऱत मुफ़्ती तकि उस्मानी साहब दामत बरकातुहुम

१० हजऱत मुफ़्ती युसूफ साहब लुध्यानवी रह.

जमा ता’लमुद्दीन दाभेल से
११ हजऱत मुफ़्ती अहमद खानपुरी साहब दामत बरकातुहुम

हुसैनियाह रांदेर सूरत से
१२ हजऱत मुफ़्ती इस्माइल वाड़ीवाला साहब रह.

और इस के अलावा बर्र रे सगीर के अक्सरो बेश्तर मुफ़्तियाँ ने किराम ने शराइत और उसूल की पाबन्दी के साथ मस्तूरात के साथ जमात में निकलने की इजाज़त दी हे.

📔 मुफ़्ती महमूद हसन साहब और मुफ़्ती निजामुद्दीन साहब का फतवा देखे
फ़तवा महमूदियाः ४/२६५

📔 मुफ़्ती तकि उस्मानी साहब का फतवा देखे
फतवा उस्मानी ज १.सफा २४२

📔 मुफ़्ती अहमद खानपुरी साहब का फतवा देखे
महमूद उल फतवा ज 5/69

📔 मवलाना युसूफ साहब लुध्यानवी का फतवा देखे

📔 आप के मसाइल और उन का हल ज, 8/185

मुफ़्ती इस्माइल वाड़ीवाला साहब का फतवा
📔 रवज़त उल फतवा जिल्द 1/235

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २६९४⭕

एक साहब तब्लीग़ी जमात में जाने को फर्ज़े एन फ़रमाते हैं और हज़रत थानवी रहमतुल्लाही अलय्हि मन्बूब (मुस्तहब) फ़रमाते है।

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

असल यह है के दीन सीखना फर्ज़े ऐन है।

उसकी एक सुरत मदारिस में पढना है, और एक सुरत तब्लीग में जाना है।
और भी सूरतें हैं (किसी अल्लाह वाले से बे’अत मुरीद होने)

मेवात के लोगों को बताया गया था के दीन सीखना फ़र्ज़ है।

इसलिए या मदारिस क़ाइम करो या दूसरी सूरतें इख़्तियार करो।

अगर तुम कोई दूसरी सुरत इख़्तियार न कर सको तो मुतय्यन तौर पर तब्लीग ही में निकलो, इसलिये वहाँ लोग यही कह कर निकालते हैं के दीन सिखने के लिए चलो, इतनी बात में किसी को इख्तिलाफ नहीं।

हज़रत थानवी रहमतुल्लाह अलय्हि जिस चीज़ को मुस्तहब फ़रमाया है उस तब्लीग के यह माने नहीं, बल्कि वहाँ तब्लीग से मुराद दूसरों को दीन सिखने के लिए निकलना है।

ज़ाहिर है के काम अवाम का नहीं है, बल्कि ख़वास अहले इल्म का काम है, फिर उस को फर्ज़े एन कैसे कहा जा सकता है!

लिहाज़ा दोनों का महमल (मतलब, मुराद) अलग अलग है और दोनों सहीह है।

📘हक़ीक़ते तब्लीग सफा ४६

✒ इफ़ादात हज़रत दायी ए कबीर फकीहुल उम्मत मुफ़्ती महमूद हसन गंगोही रहमतुल्लाह अलैहि।

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.