aaj ka sawal hindi

अकाबीरीन की तरफ से हिदायत आयी है के क़ुनूते नाज़िलाह इंनफिरादी तौर पर वित्र में भी पढे।
तो इसे कब पढनी है ? दुआ ए क़ुनूत की जगा पर ?
और रुकूअ से पहले या रुकूअ के बाद ?

जवाब
حامدا و مصلیا مسلما

वित्र में रुकूअ से पेहले पढे, और अफ़्ज़ल ये है दुआए क़ुनूत के बाद क़ुनूते नाज़िलाह पढ़े, और सिर्फ क़ुनूते नाज़िलाह पढनी हो तो वह भी पढ़ सकते है ये दुआ भी साबित है।

(उम्दतुल फ़िक़ह २/२९२)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
२७~ज़िल हिज्जह~१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

वफात के बाद हुजूर सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम, अम्बिया, सीद्दीकीन, शुहदा और वलियों का वसीला उलमाए देवबंद के नजदीक ज़ायज़ है या नाजायज..?

ज़वाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हमारे नजदिक और हमारे मशाइख के नजदीक दुआओं में इन तमाम का वसीला ज़ायज़ है, उनकी हयाती में हो या वफात के बाद इस तौर पर कहे के या अल्लाह मैं फुलां बुजुर्ग के वसीले से तुझसे दुआ की कुबुलीयत और हाजत बरारी मांगता हूँ. या इस जैसे और कोई कलीमात कहे.

(अल मुहन्नद यानी अकाईदे उलमाऐ देवबन्द, सफ़ा १०)

و الله اعلم بالصواب

(इस्लामी तारीख़

१९ जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी)

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

⭕आज का सवाल नंबर २५४५⭕

अगर जनाज़े की नमाज़ की दुआ याद न हो तो क्या करना चाहिए? नमाज़ पढनी चाहिए?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

अगर नमाज़े जनाज़ह दुआ याद न हो तो ये दुआ पढ़ लेनी चाहिये।

رَبَّنَا اغْفِرْ لِیْ و له’ وَ لِوَالِدَیَّ وَ لِلْمُؤْمِنِیْنَ

रब्बनग्फिर ली व लहू व लिवालिदय्य व लिल मुअमिनीन

ओर ये भी याद न हो सके तो भी चार तक्बीर केहने से नमाज़ हो जाती है, लिहाज़ा बिला उज़्र नमाज़ न छोडनी चाहिये।

📘किताबुल मसाइल २/८२
बा हवाला
📗शामी ज़करिया ३/११०

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २५५७⭕

अभी इस्लामी नया साल १४४३ आने वाला है नए साल की ख़ुशी में हमें क्या करना चाहिए?
कया एक दूसरे को मुबारकबादी और दुआ दे सकते है?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

इस्लाम एक सादगी वाला दीन है, उस में ग़ैर क़ौम की नक़्क़ाली हो ऐसी बातों से एहतियात करने की तालीम है। और दिन मानाने की रस्म न होना ये उस का मिज़ाज है।
इसीलिये हिज़री तारीख की शुरूआत हज़रत उमर रदियल्लाहु अन्हु के दौर से शुरू होने के बावजूद हज़रत उस्मान, हज़रत अली वग़ैरह सहाबा रदियल्लाहु अन्हुम से इस बारे में कोई खास अमल साबित नहीं।
अल्बत्ताह एक दुआ पढ़ना साबित है,
उस दिन दुआ पढ़ लेना चाहिए। वह दुआ ये है

الھم ادخلہ علینا بالامن والایمان و السلامت و الاسلام و رضوان من الرحمان و جوار من الشیطان

अल्लाहुम्मा अद्खिलहु अलैना बिल अमनी वल ईमान वस् सलामति वल इस्लाम व रिज़वानीम मीनररहमान व जिवारिम मिनाशशैतान।

📗अल मुअजमाऊल अवसात)

और एक दूसरे को दुआ देना और नयी चीज़ की मुबारकबादी देने में भी कोई हरज नहीं, जाइज़ है, मुबारकबादी देना भी बरक़त की दुआ ही है, लेकिन सुन्नत से साबित नहि।
उस के लिए कोई खास अलफ़ाज़ भी साबित नहीं।
लिहाज़ा ग़ैरों की मुशाबेहत न हो इसलिए न इस में ख़ुशी मनाई जाए, न पार्टी दी जाए, ना रौशनी की जाये।
ईसी तरह अलफ़ाज़ को खास किये बगैर मुबारकबादी भी दे सकते है, और दुआ माँगना और देना हर अचछे मोके पर ये इस्लाम में पसन्दीदाह है।

📗 अल मुवासतुल फिकहिययह १४/१००,

📄ऑनलाइन फ़तवा दारुल उलूम देवबन्द से माखूज़ इज़ाफ़ों के साथ

✅ तस्दीक़
१। मुफ़्ती जुनैद इमामो ख़तीब मस्जिदे नूर कोलाबा मुम्बई
२। मुफ़्ती फ़रीद कावी जम्बुसर
३। मौलाना सालीम मेमन गोरगांव

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल ⭕

कया ये बात सहीह है के जो शख्स पेहली मुहर्रम को ११३ बार पूरी बिस्मिल्लाहिररहमानिररहीम लिख कर अपने पास रखेगा वह पूरा साल आफत बला और मुसीबत से महफ़ूज़ रहेगा ?

🔵जवाब🔵
حامدا و مصلیا مسلما

हां, मुफ़्ती ए आज़म हज़रत मुफ्ती मुहम्मद शफ़ीअ साहब रहमतुल्लाही अलय्हि ने जवाहिरूल फ़िक़ह जिल्द २, सफा १८७ पर ये बात लिखी है, ऐसी चीज़ें बुज़रोगों के तजुर्बात में से होती है, इस को सुन्नत और ज़रूरी समझे बगैर करना चाहो तो कर सकते है, मना नहीं।

🖥ओन लाइन फ़तावा दारुल उलूम देवबन्द नंबर १४४००१२०००२१
و الله اعلم بالصواب