१८३६ क़ुनूते नाज़िलाह वित्र में कब पढ़े ? १८३६

अकाबीरीन की तरफ से हिदायत आयी है के क़ुनूते नाज़िलाह इंनफिरादी तौर पर वित्र में भी पढे।
तो इसे कब पढनी है ? दुआ ए क़ुनूत की जगा पर ?
और रुकूअ से पहले या रुकूअ के बाद ?

जवाब
حامدا و مصلیا مسلما

वित्र में रुकूअ से पेहले पढे, और अफ़्ज़ल ये है दुआए क़ुनूत के बाद क़ुनूते नाज़िलाह पढ़े, और सिर्फ क़ुनूते नाज़िलाह पढनी हो तो वह भी पढ़ सकते है ये दुआ भी साबित है।

(उम्दतुल फ़िक़ह २/२९२)

 

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
२७~ज़िल हिज्जह~१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

वसीला लेना १६५०

वफात के बाद हुजूर सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम, अम्बिया, सीद्दीकीन, शुहदा और वलियों का वसीला उलमाए देवबंद के नजदीक ज़ायज़ है या नाजायज..?

ज़वाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हमारे नजदिक और हमारे मशाइख के नजदीक दुआओं में इन तमाम का वसीला ज़ायज़ है, उनकी हयाती में हो या वफात के बाद इस तौर पर कहे के या अल्लाह मैं फुलां बुजुर्ग के वसीले से तुझसे दुआ की कुबुलीयत और हाजत बरारी मांगता हूँ. या इस जैसे और कोई कलीमात कहे.

(अल मुहन्नद यानी अकाईदे उलमाऐ देवबन्द, सफ़ा १०)

و الله اعلم بالصواب

(इस्लामी तारीख़

१९ जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी)

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)