aaj ka sawal hindi

हमारी सुरत की मुसाफिर जमात को बिहार एक शहर में ४० दिन का रुख दिया गया है।

कभी इमाम साहब नहीं होते तो मुझे वहां की मस्जिदवाले नमाज़ पढ़ाने की दरख़ास्त करते है।

तो हमारे अमीर साहब मुझे ज़ोहर, असर, ईशा की नमाज़ जिस में कसर होती है मना करते है, के हम मुसाफिर है।

मेने मुक़ीम की निय्यत नहीं की है।

तो क्या हम अमीर की निय्यत के ताबे हो कर मुसाफिर समझे जायेंगे ?

सफर में किस की निय्यत का ऐतिबार

जवाब:  حامدا و مصلیا و مسلما

सफर में किस की निय्यत का ऐतिबार‘:

मजकूरह सुरत में आप की जमात मुक़ीम हो गई।

आप जमाअत के उस अमीर की निय्यत के ताबे नहीं होंगे बल्के आप की पुरी जमाअत बिहार के उस शहर के अमीर, या मशवरा के फेसल के ताबे होगी।

आप के अमीर साहब ने मुसाफिर की निय्यत की है उसका ऐतिबार न होगा।

किताबुल मसाइल १/५५८

आलमगीरी १/१३९ से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

हमारे अपार्टमेंट में एक फ्लैट में पूरे कुरान की तरावीह होने वाली है, हमारा फ्लैट उस के ऊपर है, और भाई का फ्लैट उस फ्लैट के निचे है।
तो बिच वाले फ्लैट की इक़्तिदा उस के ऊपर निचे के फ्लैट से सहीह है या नहीं ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

पूछी हुई सुरत में बेहतर ये है के अपनी अपनी अलग अलग जमात बनाए, और अलम तरा से तरावीह पढ़ ले।
फ़िर भी अगर दूसरे फ्लेट में कोई हाफ़िज़ ना हो और पूरा कुरआन सुनने का शौक और जज़्बा हो तो मौजूदा क़ानून के दायरे में रह कर भीड़ ना जमा करते हुवे बीच वाले फ्लेट की इकतेदा उसके उपर और नीचे के फ्लेट से भी सहीह है,
बीच वाले फ्लैट की इक़्तिदा उस के ऊपर और निचे के फ्लैट से भी सहीह है।
बाशर्तें के इमाम की तमाम हालत का पता माइक के ज़रिये अच्छी तरह चलता रहे।
जहां बिजली जाती हो वहां इन्वेटर लगाने का भी एहितेमाम किया जाए।

नोट :

बेहतर ये है के इमाम बीच के फ्लेट के बजाए नीचे के फ्लेट में खड़े रहे, ताके तरतीब सही हो, और ये बात ज़रूरी है के दूसरे फ्लेट में भी इमाम के आगे कोई खड़ा न हो, वरना उसकी नमाज़ सही नहीं होगी।

तहतावी अलल मराकिल फ़लाह सफा १६० से माखूज)

ذکرہ شمس الائمة فیمن صلی علی سطح بیتہ المتصل بالمسجد او فی منزلہ بجنب المسجد وبینہ وبین المسجد حائط مقتدیا بامام فی المسجد وہو یسمع التکبیر من الامام او من المکبر تجوز صلاتہ کذا فی التجنیس والمزید ویصح اقتداء الواقف علی السطح بمن ہو فی البیت ولایخفی علیہ حالہ،،۔
(حاشیة الطحطاوی علی مراقی الفلاح:ص : ۱٦۰ مطبع خالد بن ولید دمشق)

फतावा महमुदिया दाभेल ६/५२८

१।तस्दीक़: हज़रत मुफ्ती अब्बास साहब बिस्मिल्लाह, दा। ब। शयखुल हदीस व सदर मुफ्ती डाभेल

२।तस्दीक़: हज़रत मुफ्ती अब्दुल कय्यूम राजकोटी साहब दा। ब। मुइन मुफ्ती दारुल इफ्ता डाभे

३।तस्दीक़: हज़रत मुफ्ती ताहिर साहब बाकसवाला दा। ब।उस्ताज़े हदीस व इफ्ता मद्रसह सूफी बाग सूरत

४।तस्दीक़ हज़रत मुफ्ती उबेद मनियार द।ब। दारुल इफ्ता वल इर्शाद लुहारपुर सूरत

हिजरी तारीख़ : २८ शाबानउलमुअज़्ज़म १४४१ हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा व सेक्रेटरी जमीयते उलमा सूरत शहर, गुजरात, इंडिया

अकाबीरीन की तरफ से हिदायत आयी है के क़ुनूते नाज़िलाह इंनफिरादी तौर पर वित्र में भी पढे।
तो इसे कब पढनी है ? दुआ ए क़ुनूत की जगा पर ?
और रुकूअ से पहले या रुकूअ के बाद ?

जवाब
حامدا و مصلیا مسلما

वित्र में रुकूअ से पेहले पढे, और अफ़्ज़ल ये है दुआए क़ुनूत के बाद क़ुनूते नाज़िलाह पढ़े, और सिर्फ क़ुनूते नाज़िलाह पढनी हो तो वह भी पढ़ सकते है ये दुआ भी साबित है।

(उम्दतुल फ़िक़ह २/२९२)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
२७~ज़िल हिज्जह~१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

कभी फज्र की नमाज़ छुत जाती है तो फज्र की फर्ज नमाज़ के साथ सुन्नत की भी क़ज़ा करनी है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

सुन्नत की क़ज़ा नहीं, अल्बत्ताह जिस दिन फज्र की नमाज़ छुत जाये उसी दिन की फज्र के साथ सुन्नत की क़ज़ा भी ज़वाल तक पढ़ सकते है।

(दरसी बहिश्ती ज़ेवर नमाज़ की क़ज़ा के बाब से माखूज)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

११ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

‘अज़ान से पहले नमाज़ का हुक्म’ कया हैं ? अज़ान से पहले नमाज़ पढ़ सकते हैं?

जवाब: حامدا و مصلیا و مسلما

अज़ान से पहले नमाज़ का हुक्म“: अगर नमाज़ का वक़्त दाखील हो (शुरू हो गया हो) गया हो, तो अज़ान से पहले नमाज़ पढ़ सकते हैं, अज़ान होने के बाद पढ़ना ज़रूरी नहीं।

शामी बाबुल अज़ान से माखूज़
و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़: ०६ सफर उल मुज़फ्फर १४४० हिजरी

अज़ान से पहले नमाज़ का हुक्म: मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

अज़ान और इक़ामत का हुक्म‘ क्या हुक्म है? कीन नमाज़ों में केहनी चाहिए?

जवाब:  حامدا و مصلیا و مسلما

अज़ान और इक़ामत का हुक्म” फ़र्ज़ नमाज़ के लिए सुन्नते मुअककददाह है, चाहे नमाज़ अदा पढ़ रहा हो या क़ज़ा, अकेला पढ़ रहा हो या जमात से.

अल्बत्ताह जमात से क़ज़ा नमाज़ मस्जिद में पढ़ रहा हो तो अज़ान और इक़ामत न कहे, इस में अपने नमाज़ छोड़ने के गुनाह का इज़हार है.

हाँ अकेला क़ज़ा पढ़े तो इतनी आहिस्ता आवाज़ से कहे के सिर्फ खुद सुन ले।

मराकियूल फ़लाह बाबुल अज़ान

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़: २ सफर १४४० हिजरी

अज़ान और इक़ामत का हुक्म

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २५४६⭕

१। जुमआ के दिन सुरह ए कहफ़ कब से कब तक पढ़ सकते हैं?

२। जुमआ कोनसे मौसम में जल्दी और कोनसे मौसम में देर से पढना अफ़्ज़ल है?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

१। सूरह ए कहफ़ जुमेरात की मग़रिब बाद जो चाँद के ऐतिबार से जुमआ की रात होती है उस वक़्त से जुमआ के दिन सूरज ग़ुरूब होने तक पढ़ सकते हैं।

📕सुनने दारमि हदीस नंबर ३४०७ से माखूज़

२। जुमआ की नमाज़ ज़वाल के बाद फ़ौरन हर मोसम में पढना हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम की हंमेश की सुन्नत है।

बाज़ हनफ़ी लोग एक, डेढ घन्टे बाद पढ़ते हैं यह गलत तरीका है, ये हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम की दाइमी (हंमेश) की सुन्नत के खिलाफ है इस को बदलना ज़रूरी है।

अल्लाह इस्लाह की तौफ़ीक़ अता फरमाये।

(रही बात बयान,तो वोह ज़वाल से पहले या ज़वाल के बाद आधे घन्टे तक ही करवाना चहिये।)

📗तुहफ़तुल अल म’ई शरहे तिर्मिज़ी २/३७१ बा हवाले
📘उम्दतुल कारी
📙 बहिश्ती ज़ेवर जेवर मर्दों के लिए ९४
و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २५४३⭕

अगर फ़ज्र की नमाज़ के लिए तमाम इंतिज़ाम के बावजूद आँख न खुली और नमाज़ क़ज़ा होने के बाद आँख खुली या नमाज़ का टाइम मशग़ूलि की वजह से ग़फ़लत में निकल गया तो क्या हुक्म है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

पूछी हुई सुरत में क़ज़ा हो जाने का कुछ गुनाह नहीं, लेकिन जैसे ही आँख खुली फ़ौरन नमाज़ पढना ज़रूरी है।

अगर मकरूह वक़्त हो तो इन्तिज़ार करे, वापस सो न जाये।

यही हुक्म भूलने का है, जैसे ही याद आ जाये तो फ़ौरन वुज़ू कर के नमाज़ पढना फ़र्ज़ है, अब क़ज़ा हुवी ही है यूँ समझकर सोते रेहना या अपने काम में मशग़ूल रेहना ये नमाज़ में सुस्ती करना है, ये बहुत बड़ा गुनाह और इस का अज़ाब भी बड़ा सख्त है, लिहाज़ा ऐसा करने से बचना ज़रूरी है।

📚बहिश्ती ज़ेवर मरदों के लिए सफा ९० से माखूज
तफसीरे मारीफुल क़ुरान सूरह ए ताहा आयत १४ से माखूज़।

و الله اعلم بالصواب