aaj ka sawal hindi

हमारी सुरत की मुसाफिर जमात को बिहार एक शहर में ४० दिन का रुख दिया गया है।

कभी इमाम साहब नहीं होते तो मुझे वहां की मस्जिदवाले नमाज़ पढ़ाने की दरख़ास्त करते है।

तो हमारे अमीर साहब मुझे ज़ोहर, असर, ईशा की नमाज़ जिस में कसर होती है मना करते है, के हम मुसाफिर है।

मेने मुक़ीम की निय्यत नहीं की है।

तो क्या हम अमीर की निय्यत के ताबे हो कर मुसाफिर समझे जायेंगे ?

सफर में किस की निय्यत का ऐतिबार

जवाब:  حامدا و مصلیا و مسلما

सफर में किस की निय्यत का ऐतिबार‘:

मजकूरह सुरत में आप की जमात मुक़ीम हो गई।

आप जमाअत के उस अमीर की निय्यत के ताबे नहीं होंगे बल्के आप की पुरी जमाअत बिहार के उस शहर के अमीर, या मशवरा के फेसल के ताबे होगी।

आप के अमीर साहब ने मुसाफिर की निय्यत की है उसका ऐतिबार न होगा।

किताबुल मसाइल १/५५८

आलमगीरी १/१३९ से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

हमारे अपार्टमेंट में एक फ्लैट में पूरे कुरान की तरावीह होने वाली है, हमारा फ्लैट उस के ऊपर है, और भाई का फ्लैट उस फ्लैट के निचे है।
तो बिच वाले फ्लैट की इक़्तिदा उस के ऊपर निचे के फ्लैट से सहीह है या नहीं ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

पूछी हुई सुरत में बेहतर ये है के अपनी अपनी अलग अलग जमात बनाए, और अलम तरा से तरावीह पढ़ ले।
फ़िर भी अगर दूसरे फ्लेट में कोई हाफ़िज़ ना हो और पूरा कुरआन सुनने का शौक और जज़्बा हो तो मौजूदा क़ानून के दायरे में रह कर भीड़ ना जमा करते हुवे बीच वाले फ्लेट की इकतेदा उसके उपर और नीचे के फ्लेट से भी सहीह है,
बीच वाले फ्लैट की इक़्तिदा उस के ऊपर और निचे के फ्लैट से भी सहीह है।
बाशर्तें के इमाम की तमाम हालत का पता माइक के ज़रिये अच्छी तरह चलता रहे।
जहां बिजली जाती हो वहां इन्वेटर लगाने का भी एहितेमाम किया जाए।

नोट :

बेहतर ये है के इमाम बीच के फ्लेट के बजाए नीचे के फ्लेट में खड़े रहे, ताके तरतीब सही हो, और ये बात ज़रूरी है के दूसरे फ्लेट में भी इमाम के आगे कोई खड़ा न हो, वरना उसकी नमाज़ सही नहीं होगी।

तहतावी अलल मराकिल फ़लाह सफा १६० से माखूज)

ذکرہ شمس الائمة فیمن صلی علی سطح بیتہ المتصل بالمسجد او فی منزلہ بجنب المسجد وبینہ وبین المسجد حائط مقتدیا بامام فی المسجد وہو یسمع التکبیر من الامام او من المکبر تجوز صلاتہ کذا فی التجنیس والمزید ویصح اقتداء الواقف علی السطح بمن ہو فی البیت ولایخفی علیہ حالہ،،۔
(حاشیة الطحطاوی علی مراقی الفلاح:ص : ۱٦۰ مطبع خالد بن ولید دمشق)

फतावा महमुदिया दाभेल ६/५२८

१।तस्दीक़: हज़रत मुफ्ती अब्बास साहब बिस्मिल्लाह, दा। ब। शयखुल हदीस व सदर मुफ्ती डाभेल

२।तस्दीक़: हज़रत मुफ्ती अब्दुल कय्यूम राजकोटी साहब दा। ब। मुइन मुफ्ती दारुल इफ्ता डाभे

३।तस्दीक़: हज़रत मुफ्ती ताहिर साहब बाकसवाला दा। ब।उस्ताज़े हदीस व इफ्ता मद्रसह सूफी बाग सूरत

४।तस्दीक़ हज़रत मुफ्ती उबेद मनियार द।ब। दारुल इफ्ता वल इर्शाद लुहारपुर सूरत

हिजरी तारीख़ : २८ शाबानउलमुअज़्ज़म १४४१ हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा व सेक्रेटरी जमीयते उलमा सूरत शहर, गुजरात, इंडिया

अकाबीरीन की तरफ से हिदायत आयी है के क़ुनूते नाज़िलाह इंनफिरादी तौर पर वित्र में भी पढे।
तो इसे कब पढनी है ? दुआ ए क़ुनूत की जगा पर ?
और रुकूअ से पहले या रुकूअ के बाद ?

जवाब
حامدا و مصلیا مسلما

वित्र में रुकूअ से पेहले पढे, और अफ़्ज़ल ये है दुआए क़ुनूत के बाद क़ुनूते नाज़िलाह पढ़े, और सिर्फ क़ुनूते नाज़िलाह पढनी हो तो वह भी पढ़ सकते है ये दुआ भी साबित है।

(उम्दतुल फ़िक़ह २/२९२)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
२७~ज़िल हिज्जह~१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

कभी फज्र की नमाज़ छुत जाती है तो फज्र की फर्ज नमाज़ के साथ सुन्नत की भी क़ज़ा करनी है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

सुन्नत की क़ज़ा नहीं, अल्बत्ताह जिस दिन फज्र की नमाज़ छुत जाये उसी दिन की फज्र के साथ सुन्नत की क़ज़ा भी ज़वाल तक पढ़ सकते है।

(दरसी बहिश्ती ज़ेवर नमाज़ की क़ज़ा के बाब से माखूज)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

११ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

‘अज़ान से पहले नमाज़ का हुक्म’ कया हैं ? अज़ान से पहले नमाज़ पढ़ सकते हैं?

जवाब: حامدا و مصلیا و مسلما

अज़ान से पहले नमाज़ का हुक्म“: अगर नमाज़ का वक़्त दाखील हो (शुरू हो गया हो) गया हो, तो अज़ान से पहले नमाज़ पढ़ सकते हैं, अज़ान होने के बाद पढ़ना ज़रूरी नहीं।

शामी बाबुल अज़ान से माखूज़
و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़: ०६ सफर उल मुज़फ्फर १४४० हिजरी

अज़ान से पहले नमाज़ का हुक्म: मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

अज़ान और इक़ामत का हुक्म‘ क्या हुक्म है? कीन नमाज़ों में केहनी चाहिए?

जवाब:  حامدا و مصلیا و مسلما

अज़ान और इक़ामत का हुक्म” फ़र्ज़ नमाज़ के लिए सुन्नते मुअककददाह है, चाहे नमाज़ अदा पढ़ रहा हो या क़ज़ा, अकेला पढ़ रहा हो या जमात से.

अल्बत्ताह जमात से क़ज़ा नमाज़ मस्जिद में पढ़ रहा हो तो अज़ान और इक़ामत न कहे, इस में अपने नमाज़ छोड़ने के गुनाह का इज़हार है.

हाँ अकेला क़ज़ा पढ़े तो इतनी आहिस्ता आवाज़ से कहे के सिर्फ खुद सुन ले।

मराकियूल फ़लाह बाबुल अज़ान

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़: २ सफर १४४० हिजरी

अज़ान और इक़ामत का हुक्म

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २५४६⭕

१। जुमआ के दिन सुरह ए कहफ़ कब से कब तक पढ़ सकते हैं?

२। जुमआ कोनसे मौसम में जल्दी और कोनसे मौसम में देर से पढना अफ़्ज़ल है?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

१। सूरह ए कहफ़ जुमेरात की मग़रिब बाद जो चाँद के ऐतिबार से जुमआ की रात होती है उस वक़्त से जुमआ के दिन सूरज ग़ुरूब होने तक पढ़ सकते हैं।

📕सुनने दारमि हदीस नंबर ३४०७ से माखूज़

२। जुमआ की नमाज़ ज़वाल के बाद फ़ौरन हर मोसम में पढना हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम की हंमेश की सुन्नत है।

बाज़ हनफ़ी लोग एक, डेढ घन्टे बाद पढ़ते हैं यह गलत तरीका है, ये हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम की दाइमी (हंमेश) की सुन्नत के खिलाफ है इस को बदलना ज़रूरी है।

अल्लाह इस्लाह की तौफ़ीक़ अता फरमाये।

(रही बात बयान,तो वोह ज़वाल से पहले या ज़वाल के बाद आधे घन्टे तक ही करवाना चहिये।)

📗तुहफ़तुल अल म’ई शरहे तिर्मिज़ी २/३७१ बा हवाले
📘उम्दतुल कारी
📙 बहिश्ती ज़ेवर जेवर मर्दों के लिए ९४
و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २५४३⭕

अगर फ़ज्र की नमाज़ के लिए तमाम इंतिज़ाम के बावजूद आँख न खुली और नमाज़ क़ज़ा होने के बाद आँख खुली या नमाज़ का टाइम मशग़ूलि की वजह से ग़फ़लत में निकल गया तो क्या हुक्म है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

पूछी हुई सुरत में क़ज़ा हो जाने का कुछ गुनाह नहीं, लेकिन जैसे ही आँख खुली फ़ौरन नमाज़ पढना ज़रूरी है।

अगर मकरूह वक़्त हो तो इन्तिज़ार करे, वापस सो न जाये।

यही हुक्म भूलने का है, जैसे ही याद आ जाये तो फ़ौरन वुज़ू कर के नमाज़ पढना फ़र्ज़ है, अब क़ज़ा हुवी ही है यूँ समझकर सोते रेहना या अपने काम में मशग़ूल रेहना ये नमाज़ में सुस्ती करना है, ये बहुत बड़ा गुनाह और इस का अज़ाब भी बड़ा सख्त है, लिहाज़ा ऐसा करने से बचना ज़रूरी है।

📚बहिश्ती ज़ेवर मरदों के लिए सफा ९० से माखूज
तफसीरे मारीफुल क़ुरान सूरह ए ताहा आयत १४ से माखूज़।

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २६१२⭕

कच्ची प्याज़, लहसुन, बीड़ी, सिगरेट पीने के बाद, बगल या मुंह में बद्बू पैदा होने की बीमारी हो, बदबूदार पसीने वाले कपडे मसलन गोश्त, मछली बेचने वाले के कपडे पहन कर मस्जिद में जाना कैसा है ?

🔵जवाब🔵

حامد ومصلیا و مسلما

कीसी भी बदबूदार चीज़ को खा कर या पी कर बदबूदार कपडे पहन कर मस्जिद में जाना जाइज़ नहीं, जब तक के उन चीज़ों की बदबू को ख़त्म न किया जाए (मिस्वाक करके, खुश्बु दार चीज़ खा कर या ईत्र लगा कर)

कयूं के जिन चीज़ों से इन्सान को तकलीफ होती है उन चीज़ों से फ़रिश्तों को भी तकलीफ होती है।

आज कल इस बारे में बड़ी ग़फ़लत बरती जा रही है, ऐसे हज़रात को इसका हमेशा ख्याल रखना चाहिये, अगर बदबू दूर न होती है तो ऐसे लोगों को तनहा नमाज़ पढनी चाहिये।

📗 आदाबुल मसाजिद हज़ मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी रह. की सफा २२,२३
फ़िक़्ही ज़वाबित

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नंबर २६३५⭕

वूज़ू में तिन मर्तबा से ज़ियादा आ’अज़ा धोना कैसा है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

वूज़ू में आ’अज़ा को तिन मर्तबा से ज़ियादा धोने की चंद सूरतें है।

१⃣।
अगर तिन से ज़ियादा इस एतेकाद से धो रहा है के यह सवाब या सुन्नत है, तो मकरूहे तहरीमी (हराम के क़रीब) है।

२⃣।
अगर यह एतेकाद नहीं मगर बिला वजह कर रहा हे तो बेकार होने की वजह से मकरूहे तंज़ीही है।

३⃣।
अगर कभी शक को दूर करने और दिल के इत्मिनान के खातिर तिन से ज़ियादा बार धो लिया तो कोई कराहत नहीं।

४⃣।
अलबत्ता मस्जिद और मदरसे के वक़फ पानी से तिन बार से ज़ियादा धोना हराम (गुनाहे कबीरह) है।

(आजकल मस्जिद के पानी से ख़ुसूसन पेर को तीन मर्तबा से ज़ियादा धोया जाता है, कोई शुमार ही नहीं, बस पानी डालते ही जाते है। लिहाज़ा इससे बचने का एहतिमाम करे, क्यूँ के हज़रत मुफ़्ती महमूद हसन गंगोही رحمت اللہ علیہ फ़रमाते थे के वुज़ू में पानी फ़ुज़ूल खर्च करने से नमाज़ का खुशु’अ (ध्यान ख़त्म हो जाता है)

📗 अहसनुल फतावा- २/१५, इबारत की असानी के साथ

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नंबर २६४९⭕

नमाज़ में मकरूहे तहरीमी काम हो जाये तो क्या हुक्म है ?
नमाज़ में मकरूहे तहरीमी क्या क्या है ?
🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

मकरूहे तहरीमी से नमाज़ का सवाब इस के दरजात के ऐतिबार से कम हो जाता है
बाज़ मुहतात मुफ्तियाने इकराम ऐसी नमाज़ को जल्द से जल्द वक़्त के अंदर और वक़्त निकलने बाद भी लौटाना वाजिब कहते है.
और बाज़ मुफ्तियाने इकराम ये कहते है के ऐसी चीज़ो में नमाज़ कराहट के साथ पूरी हो जायेगी दोहराना वाजिब नहीं.
एहतियात यही समझ में आती है के नमाज़ दोहरा ले.
नमाज़ के ऐसे मकरूहे तहरीमी हस्बे ज़ैल है.👇

🔴(१) सदल यानि कपड़ों को लटकाना जैसे चादर साल सर पर डाल कर उस के दोनों किनारे लटका देना या कफनी या कोट या शेरवानी बिगड़ उसकी आस्तीनों में हाथ डाले जाए कंधो पर दाल लेना.
टखनों के निचे पेन्ट लटकने को भी अल्लम्ह इब्ने शामी ने सदल में शुमार कर के मकरूहे तहरीमी कहा है.

🔴(2) कपड़ों को मिटटी से या अस्तरी ख़राब होने से बचाने के लिए हाथ से रोकना या समेटना.

🔴(3) अपने कपड़ों या बदन से खेलना जैसे नाख़ून छीलना नाक को ऊँगली से कुरेदना.

🔴(४) पाखाना या पेशाब की हाजत होने की हालत में नमाज़ पढ़ना.

🔴(५) मर्दो को अपने बालो को सर पर जमा करके छोटा बांधना. औरतो को ऐसा कर के नमाज़ पढ़ना बेहतर हे.

🔴(6) कंकरियों को बार बार हटाना लेकिन अगर सजदह करना मुश्किल हो तो एक बार हटाने में हरज नहीं.

🔴(७) उंगलियां चटखाना या एक हाथ की उँगलियाँ दूसरे हाथ की उँगलियों में डालना.

🔴(8) कमर या कोख या कूल्हे पर हाथ रखना.

🔴 (९) क़िब्ले की तरफ से मुंह फेर कर देखना मकरूहे तहरीमी और सिर्फ निगाह कनखनियों-दीदे से इधर-उधर देखना मकरूहे तंज़ीही है

🔴(१०) कुत्ते की तरह बैठना यानि राने खरी करके बैठना और रानो को पेट से और घुटनो को सीने से मिला लेना और हाथो को ज़मीन पर रख लेना. सिर्फ पंजे पर बैठना मकरूहे तंज़ीही है

🔴(11) सजदों में दोनों कलाइयों को ज़मीन पर बिछा लेना मर्द के लिए मकरूह हे.

🔴(१२) किसी ऐसे आदमी की तरफ नमाज़ पढ़ना जो नमाज़ी की तरफ मुंह किये बैठा हो.

🔴(१३) ऐसी सफ के पीछे अकेले खड़ा होना जिस में जगह खाली हो.

🔴(१४) चादर या कोइ और कपडा इस तरह लपेट कर नमाज़ पढ़ना की जल्दी से हाथ न निकल सके.

🔴 (१५) कुहनियों तक आस्तीन चढ़ा कर नमाज़ पढ़ना.
अगर जल्दी में न उतरी हो तो नमाज़ के दौरान ही एक हाथ से वक़्फ़े वक़्फ़े से -ठहर ठहर के उतार ले एक रुक्न -तीन बार सुब’हान रबिय्यल अज़ीम कहा जाये इतनी देर तक लगातार न उतारे.

📚किताबुल मसाइल १/३६६ हवाला शामी २/५२२ ज़करिया
📗एहसनुल फतावा ३/४०४ से ४४६
📘फतावा कास्मियाह ७/३९७

و الله اعلم بالصواب

✏मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २६५०⭕

नमाज़ में मकरूह ए तंज़ीही काम हो जाये तो क्या हुक्म है ?
नमाज़ में मकरूह ए तंज़ीही क्या क्या है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

मकरूह वह चीज़ है जिससे नमाज़ तो नहीं टूटी लेकिन सवाब कम हो जाता है और गुनाह होता है, मकरूह ए तंज़ीही वह न मुनासिब काम है जिस से बचना बेहतर है, उस नमाज़ को वक़्त के अंदर और वक़्त के बाद लौटाना मुस्तहब है. नमाज़ के मकरूह ए तंज़ीही हस्बे ज़ैल है.👇

(१) मामूली कपड़ो में जिन्हे पहन कर मजमा में जाना पसंद नहीं किया जाता नमाज़ पढ़ना.

(२) मुंह में रुपयाः या पैसा या और कोई चीज़ रख कर नमाज़ पढ़ना. जिस की वजह से किरात करने से मजबूर न रहे और अगर किरात से मज़बूरी हो जाए तो बिलकुल नमाज़ न होगी.

(३) सुस्ती और बे परवाहि की वजह से नंगे सर नमाज़ पढ़ना.

(४) हाथ या सर के इशारे से सलाम का जवाब देना.

(५) बिना मज़बूरी चार जानू या अल्टी पलटी (पलटी) मार कर बैठना.

(६)इरादा कर के जमाई (बगासह) लेना या रोक सकने की हालत में न रोकना.

(७) आँखों को बंध करना लेकिन अगर नमाज़ में दिल लगने के लिए बंध करे तो मकरूह नहीं.

(८) इमाम का मेहराब के अंदर खड़ा होना, लेकिन अगर क़दम मेहराब से बाहर हो तो मकरूह नहीं, अकेले इमाम का एक हाथ ऊँची जगह पर खड़ा होना और अगर उसके साथ कुछ मुक़्तदी भी हो तो मकरूह नहीं.

(९) आयते या सुरते या तस्बीह उंगलियों पर गिनना.

(१०) नमाज़ में अंगराई लेना यानी सुस्ती उतारना.

(११) अमामह के पेच-नोक पर सजदह करना.

(१२) जिस जगह यह डर हो के कोई नमाज़ में हंसा देगा, ख़याल हट जाएगा तो नमाज़ में भूल चूक हो जाएगी ऐसी जगह नमाज़ पढ़ना.

(१३) जब बहुत भूक लगी हो और खाना तैयार हो तो पहले खा ले तब नमाज़ पढ़े. बगैर खाना खाए नमाज़ पढ़ना मकरूह है. हाँ! अगर वक़्त तंग होने लगे तो पहले नमाज़ पढ़ ले.

(१४) सुन्नत के खिलाफ नमाज़ में कोइ काम करना.

(१५) दूसरी रकत को पहली रकत से ज़ियादह लम्बी करना.

(१६) किसी नमाज़ में कोइ सूरत मुक़र्रर कर लेना के हमेशाह वह पढ़ा करे कोइ और सूरत कभी न पढ़े.

(१७) खुले सर नमाज़ पढ़ना अगर सुस्ती की वजह से है तो मकरूह ए तंज़ीही है. अगर तकब्बुर या फैशन की वजह से है जैसे के आजकल नवजवानो की आफत है के टोपी होते हुवे भी जेब (पॉकेट) में रख लेते है ये तरीकाः क़ाबिले मज़म्मत है हुज़ूर सलल्लाहु अलैहे वसल्लम ने आम हालत में अक्सर सर ढँक कर ही नमाज़ पढ़ी है.

📘तालीमुल .इस्लाम-४/४७ से ४९
बहिश्ती ज़ेवर-२/९९ से १०२
और किताबुल मसाइल १/३६६ से ३७५ से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

आज का सवाल नंबर २६७०

एक आदमी के मुँह में चने की मिक़्दार कोई चीज़ रह गयी,
नमाज़ के बाद उसको मालुम हुवा तो नमाज़ सहीह हुई या नहीं ?

🔵जवाब🔵
    
حامدا و مصلیا مسلما

चने की मिक़्दार कोई चीज़ मुँह में रह जाने से नमाज़ फ़ासिद नहीं होगी, अलबत्ता नमाज़ मकरूह होगी।

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

आज का सवाल न. २६७२

नमाज़ का फ़ासिद होने का क्या मतलब?
किन चीज़ों से फ़ासिद हो जाती है (तुट) जाती है?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

नमाज़ के मुफ़सिदात उन चीज़ो को कहते हैं जिनसे नमाज़ फ़ासिद हो जाती है यानी तुट जाती है और उसे लौटाना (दोहराना फिर से पढ़ना) ज़रूरी है, जान बुझ कर हो या भूल कर, हर हाल में नमाज़ टूट जाती है.
नमाज़ के मुफ़सिदात हसबे ज़ैल है

(१) नमाज़ में कलाम (बात) करना जान बुझ कर हो या भूल कर थोड़ा हो या बहोत हर सूरत में नमाज़ तूट जाती है.

(२) बे ज़रूरत खंखार ने और गला साफ़ करने से जिस से एक आध हर्फ़ (लफ्ज़) भी पैदा हो जाए तो नमाज़ तूट जाती है
हाँ मज़बूरी के वक़्त खंखारना दुरुस्त है और नमाज़ नहीं टूटती.

(३) किसी खत या किसी किताब पर नज़र पड़ी और उस को अपनी ज़बान से नहीं लेकिन दिल ही दिल में मतलब समझ गया तो नमाज़ नहीं तूटी , अगर ज़बान से पढ़ ले तो नमाज़ जाती रहेगी.

(४) सलाम करना यानी किसी आदमी को सलाम करने के इरादा से सलाम या अल्लाह हाफिज या अस्सलामु अलैकुम या इसी जैसा कोई लफ्ज़ कह देना.

(५) सलाम का जवाब देना या छींक ने वाले को यरहमुकल्लाह या नमाज़ से बाहर वाले किसी आदमी की दुआ पर आमीन कहना.

(६) किसी बुरी खबर पर ‘इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन’ पढ़ना या किसी अच्छी खबर पर ‘सुबहान अल्लाह’ कहना.

(७) दर्द या रंज की वजह से आह..या ओह… या उफ़… करना.

(८) अपने इमाम के सिवा किसी दूसरे को लुक़मह देना यानी किरात (गलती) बताना.

(९) कुरान शरीफ देख कर पढ़ना.

(१०) कुरान मजीद पढ़ने में कोई बड़ी गलती करना.

(११) अमले कसीर करना यानि कोई ऐसा काम करना जिन से देख ने वाले यह समझे की यह आदमी नमाज़ नहीं पढ़ रहा है. मसलन दो हाथ से टोपी दुरुस्त करना या दोनों हाथ छोड़ कर आस्तीन उतारना.

(१२) खाना-पीना इरादे से हो या भूल से. पहले ही से मुंह में कोई चीज़ हो तो चने के बराबर हो तो फ़ासिद और मुंह के बहार से खाये तो टिल के बराबर हो तो भी फ़ासिद होगी.

(१३) दो सफो की मिक़्दार के बराबर चलना.

(१४) क़िब्ले की तरफ से बिना मज़बूरी सिना फेर लेना.

(१५) नापाक जगह पर सजदह करना.

(१६) सतर खुल जाने की हालत में एक रुक्न यानी तीन बार सुबहान रब्बियल आ’अला कहने की मिक़्दार ठहरना.

(१७) दुआ में ऐसी चीज़ माँगना जो आदमियों से मांगी जाती हो जैसे या अल्लाह मुझे आज सो (१००) रुपये दे दे.

(१८) दर्द या मुसीबत की वजह से इस तरह रोना की आवाज़ में हुरूफ़ ज़ाहिर हो जाए. अल्लाह और जहन्नम के खौफ से ऐसा रोये तो फ़ासिद न होगी.

(१९) बालिग़ आदमी का नमाज़ में क़हक़हा मार कर (पूरा मुह खोल कर) आवाज़ से हंसना.

(२०) इमाम खड़े रहने की जगह से आगे बढ़ जाना वगैरह…

📗तालीमुल इस्लाम
📘मसाइल नमाज़

و الله اعلم بالصواب

✏मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

आज का सवाल नंबर २६८४ 

किसी की पीठ के पीछे नमाज़ पढना कैसा है ?

🔵 जवाब 🔵

حامدا و مصلیا مسلما

अगर कोई आगे बेठा बाते कर रहा हो या किसी और काम में लगा हो तो उसके पीछे उसकी पीठ की तरफ मूँह करके नमाज़ पढना मकरूह नहीं हे,

लेकिन अगर बेठने वाले को इस से तकलीफ न हो और वो उस की नमाज़ से आगे न गुजरना पड़े उस के लिए रुक जाने से घभराये तो ऐसी हालत में किसीके पीछे नमाज़ न पढ़ेइस तौर पर के उस का रास्ता बांध हो जाए।

و الله اعلم بالصواب

📘दरसी बहिश्ती ज़ेवर सफा ३९७

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर – २६९२⭕

मुझे सूरत से वलसाड में एक जगह जाना है घर से सफर के क़ी।मी। की गिनती करता हूँ तो मुसाफिर बन जाता हूँ तो ये गिनती मेरी सहीह है?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما
मसाफ़त की इब्तेदा घर से न होगी,बल्कि आबादी से बहार निकलने पर होगी और इन्तहा-ख़त्म भी जहाँ जाना हे वहां की आबादी शुरू’अ होने पर होगी आगे ठहरने की जगह तक न होगी। पस सवाल में पूछि हुई मसाफ़त के शुमार में इसका ख्याल रखना चाहिए के आबादी से निकलने पर मंज़िल मकसूद की आबादी शुरू’अ होने तक ४८ मिल होते हो तो सफर शरई हे वर्ना नहि ।
क्यूंकि सफर ए शरई की शुरुआत आबादी से निकलने पर होती है यही वजह है के इस से पहले कसर की इजाज़त नहीं और वापसी में ख़त्म आबादी शुरू’अ होने पर होता हे इसके बाद कसर जाइज़ नहि, अलबत्ता अगर ख़त्म होने की जानिब में यानि मंज़िल ए मक़सूद में इक़ामत की निय्यत नहि है नीज़ वो इसका वतने अस्ली भी नहीं तो फिर जहाँ तक जाना है वहां आबादी के अंदर भी आखिर तक की मशाफत शुमार होगी।

و الله اعلم بالصواب

📗फ़िक़्ही ज़वाबित १/२२३

📕बा हवाला फ़तवा आलमगीरी १/१३९

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल २६९३⭕

सफरे शरई में क़सर कर रहा था तो वापसी में अपने मक़ाम से कितने किलोमीटर दूर तक क़सर कर सकते है ?
७७.२५ सवा सत्तर किलोमीटर के अंदर आ जाये तो फिर पूरी पढनी है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

वापसी में जब तक अपने शहर की सरहद (बॉर्डर) में दाखील न हो जाये तब तक क़सर करते रहे।

अगरचे ७७.२५ सवा सत्तर किलोमीटर के अंदर कितना ही आ जाये फिर भी क़सर ही पढनी है।

📘नूरुल इज़ाह से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २७०९⭕

बाज़ लोग जब मस्जिद में आकर इमाम को रुकू’अ में पाते हे तो जल्दी के ख्याल से आते ही झुक जाते हे और इसी हालत में तक्बीरे तहरीमा कहते हे।
उन की नमाज़ का क्या हुक्म है?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

पूछी हुई सुरत में उनकी नमाज़ नहीं होती।

तक्बीर ए तहरीमा नमाज़ की सिह्हत की शर्त हे, और पूछी हुवी सुरत में कम अज़ कम इतना क़याम फ़र्ज़ है जिसमे तक्बीर ए तहरीमा कह ले।

जब इतना क़ियाम भी न किया तक्बीरे तहरीमा शहीह न हुई,
और जब तक्बीरे तहरीमा सहीह न हुई तो नमाज़ कैसे सहीह हो सकती हे।!

📗बहिश्ती ज़ेवर मरदों के लिये
सफा १५३

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २७१३⭕

मे असल बिहार का रेहनेवाला हूँ, वहीँ पैदा हुवा, अब बीवी बच्चों के साथ यहीं सुरत में रहता हूँ, और यहीं कारोबार है, लेकिन वहां बिहार में वालिद साहब रहते है, साल दो साल में वहां जाना होता है।
तो वहां नमाज़ पूरी पढ़ूं या कसर ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

वतने अस्ली में नमाज़ पूरी पढ़े, वतने अस्ली उस जगह को कहा जाता है जहा इंसान की पैदाइश हुई हो, या उसने उसी जगह को मुस्तक़िल रिहाइश की जगह बना लिया हो, और पूरी-ज़िन्दगी वही रहने का अज़्म-पक्का ईरादह हो।

अगर कोई शख्स अपने आबाई वतन में सुकूनत नहीं रखता; बल्कि कभी साल दो-साल में एक दो रोज़ के लिए वह आ जाता है, फिर भी वह वतन अस्ली के दर्जे में होगा, क्यूँ के वतन अस्ली दो भी हो सकते है।

लिहाज़ा पूछी हुई सुरत में बिहार में भी पूरी नमाज़ पढ़े।

📗फ़िक़्ही ज़वाबित

📕किताबुल मसाइल

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज़ का सवाल नंबर २७१५⭕

सफर में हो और क़िब्ला मालुमना हो तो किस तरफ नमाज पढ़े ?
उसकी आसान निशानी क्या है ?
क़िब्ला हर नमाज़ में जरूरी है ?
और कहां मुआफ़ है ?

🔵जवाब🔵

नमाज़ मे क़िब्ले की तरफ अपना मुंह करने का ऐहतेमाम ज़रूरी है।

बर्रे सगीर यानी  इन्डिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश्, बरमा, नॅपाल  का क़िब्ला मगरिब-जिस सिम्त की तरफ सूरज डूबता है वहां है।

ट्रेन में, प्लेन में, नमाज़ पढ़े तो फ़र्ज़ नमाज़ में क़िब्ले का  एहतेमाम ज़रूरी है, अगर कार में नमाज़ पढ़े तो फ़र्ज़ नमाज़ निचे उतर कर पढ़ना ज़रूरी है,

अल्बत्ताह नफल नमाज़ में जिस तरफ कार, बस का रुख हो नफल नमाज उस तरफ पढ़ सकते है, नफल नमाज में क़िब्ला ऐसी सवारी में जिसमे रुख क़िब्ला की तरफ़ नहीं हो सकता क़िब्ला k अहतेमाम ज़रूरी नहीं।

📗 किताबुल मसाइल
📗 फिकही ज़वाबित

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २७२२⭕

ओरत का मयका (उस के वालिदैन का घर) उस के ससुराल से ७७.२५ किलोमीटर या उस से ज़्यादा दूर है, तो वहां जाये तो कसर करे या पूरी नमाज़ पढ़े?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

वहां जाये तो कसर करे।

क्यूँ के अब इस का वतन अस्ली मयका नहीं बल्कि सुसराल बन गया है।

📕किताबुल मसाइल १/५५६

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर- २७२४⭕

सफरे शरई में जाते हुवे अपने मक़ाम से कितने किलोमीटर दूर जाने के बाद कसर कर सकते है ?
७७.२५ सवा सत्तर किलोमीटर दूर जाने के बाद कसर पढ़ना शुरू करे ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما
    
अपने शहर या गाँव की सरहद- बॉर्डर से ७७.२५ किलोमीटर या उस से ज़यादा दूर जाने की निय्यत से अपने शहर या गाँव की बॉर्डर पार करते ही की कसर नमाज़ पढ़ना वाज़िब हो जाता है, चाहे १ किलोमीटर भी शहर या गाँव की बॉर्डर से दूर न हुवा हो, सवा सतत्तर किलोमीटर दूर जाने का इन्तिज़ार गलत है।

अगर गांव हो तो गांव की आखरी हद यानी कब्रस्तान या खेल का मैदान वग़ैरा, ओर अगर शहेर वाला हो तो जिस रास्ते से जा रहा हो उस से शहेर की आखरी हद मसलन रोड से जा रहा हो तो चेक पोस्ट और ट्रैन हो तो शहेर का आखरी स्टेशन। मसलन मुंबई वाला सुरत के लिए निकले तो मीरारोड स्टेशन से गुज़र जाए।
सूरतवाला  अहमदाबाद के लिए बाय रोड कामरेज से, मुंबई के लिए सचीन से और  बाय ट्रेन  अहमदाबाद के लिए  उत्राण से , मुंबई के लिए मरोली स्टेशन से गुज़र जाना काफी है ।

📘नूरुल इज़ाह से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया।

⭕आज का सवाल नंबर – २७२५⭕

सफर की नमाज़ क़ज़ा हो जाये तो हाज़र-(अपने मक़ाम) में और हाज़र की क़ज़ा सफर में क़सर पढनी है या पुरी?

🔵जवाब 🔵

حامدا و مصلیا مسلما

सफर की नमाज़ क़सर होती है लिहाज़ा उस की नमाज़ हाज़र में भी क़सर ही पढेंगे।
ओर हाज़र की नमाज़ पूरी होती है लिहाज़ा उस की क़ज़ा सफर में भी पूरी पढेंगे। जेसी छुटी है वेसी पढेंगे।

📗नुरुल इज़ाह

و الله اعلم بالصواب


✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २७२६⭕

तीन (३) रका’त या चार (४) रका’त वाली नमाज़ में बीच मे बेठना भूल गया और दो (२) रका’त पढकर तीसरी (३) रका’त के लिए खड़ा हो गया तो क्या करे ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

पूछी हुई सुरत में अगर निचे का आधा धड़ अभी सीधा न हुआ हो (रुकूअ जैसी हालात न हुई हो) तो बेठ जाये और अत्तहिय्यात पढ़ ले तब खड़ा हो और ऐसी हालत में सज्दा ए सहव करना वाजिब नहीं।

और अगर निचे का आधा धड़-कम्मर सिधि हो गयी हो तो न बैठे, बल्कि खड़ा होकर चारो रका’त पढ़ ले, फकत आखीर में बैठे, और इस सुरत में सज्दा ए सहव वाज़िब है।

अगर सीधा खड़ा हो जाने के बाद फिर लौट आया और बैठकर अत्तहिय्यात पढ़ी तो गुनेहगार होगा और सज्दा ए सहव करना अब भी वाजिब होगा (क्यूँ के अत्तहिय्यात पढने में ताख़ीर हुई)

📕बहिश्ती ज़ेवर मरदों के लिए सफा १९१

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.