aaj ka sawal hindi

शरीअत में मंगनी किसे कहते हैं? मंगनी कैसी होनी चाहिए? अब हमारे इलाक़े में मगनियाँ भी शादी की तरह होने लगी हैं बड़ी बड़ी दावतें होती है मर्दों और औरतों की हाज़री होती है इसका क्या हुक्म है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

शरीअत में एक फ़रीक़ की जानिब से दूसरे फ़रीक़ (पार्टी) के सामने निकाह की तजवीज़ (पुख्तः इरादा) रखे जाने को मगनी कहा जाता है, जब फ़रीक़े सानी (दूसरी पार्टी) उस तजवीज़ को मंज़ूर कर लेता है तो मगनी का अमल मुकम्मल हो जाता है, शरीअत की निगाह में इसकी हैसियत एक वादे की है किसी उज्रे शरई के बगैर तोडना गुनाह है,

हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु फरमाते है के हज़रात फ़ातिमाः रदियल्लाहु अन्हा के लिए पैगामे निकाह लेकर में हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर हुवा जब आप के सामने बैठा तो खामोश हो गया, खुदा की क़सम में रोअब और जलाल की वजह से कुछ बोल न सका. खुद आप  ने दरयाफ़त किया के कैसे आये हो? क्या कोई काम है! में खामोश रहा तब आप  ने फ़रमाया शायद फ़ातिमाः की मगनी के लिए आये हो? मेने अर्ज़ किया जी हाँ.

(अल बिदायह वन निहाया ३/३४६)

जिसे  अल्लाह की इजाज़त से क़बूल फरमा लिया गया बस ज़ुबानी तौर पर सब कुछ तय हो गया, न लोग इकठ्ठा हुवे और न कोई ऐहतमाम हुवा.

मुआशरती. मसाइल सफा ७५

लिहाज़ा मंगनी के किये सबको जमा करना बड़ी ता’अदद में मर्दों औरतों की हाज़री उनकी दावत वगैरह शर’न ज़रूरी और पसन्दीदाह नहीं, बल्कि ख़वातीन (औरतों) की मावजूदगी जिन खराबियों को पैदा करती है वह लोग जानते ही हैं इस से बचना ज़रूरी है.

मंगनी शादी के मुताल्लिक़ पेश आनेवाले मसाइल का हल सफा १३

अज क़लम पिरो मुर्शिद हज़रत अक़दस मुफ़्ती अहमद खानपुरी साहब दा ब

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१० रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

दुल्हे का हार, सेहरा पहेनना और हाथ में कलगी (फ़ूलों का गुलदस्ता) रखना कैसा है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हार, सेहरा, और हाथ में कलगी रखना ये असल में  हिन्दुस्तान के गैर मुस्लिमों की रस्म है, जो नव मुस्लिम और इल्म से नावाक़िफ़ मुस्लमानो में बाकी रह गई है, और उन की सुहबत से दूसरे इस क़िस्म के गैर पाबन्द और एहतियात न करनेवाले मुस्लमानो में दाखील हो गई है।

इस्लिये इस छोड़ना वाज़िब है।

हिन्दुस्तान के उलेमा ने इसे मुशाबेहत की वजह से मना फ़रमाया है। 

हज़रत मुफ्ती किफ़ायतुल्लाह साहब, हज़रत मुफ्ती अज़ीज़ुर रहमान साहब, हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब वगैरह के फ़तवा में इस को मना लिखा है। और उन सब के उस्ताज़ुल असतीजा हज़रत मौलाना शाह इशाक दहेलवी रहमतुल्लाही अलय्हि (जिन को बरेलवी भी अपना बड़ा मानते है) उनके फ़तवा में भी मना किया गया है।

फ़तावा महमूदियाः १०/३१८

शादी में पेश आनेवाले मसाइल सफा ४९

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०९ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

दुलहन को लेने लोग बारात क्यूँ ले जाते है ?  इस में बहुत परेशानी होती है और खर्च ज़यादा होता है,

उम्मत के सामने इस के नुक़सानात को वाज़िह फरमाइये ताके इसका रिवाज ख़त्म हो।

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

पहले ज़माने में आमतौर पर एक दो सवार होते थे तो डाकू लूट लेते थे,

इसलिए दुलहन, उस के ज़ेवर और सामान की हिफाज़त के लिए कई आदमी उसे लेने के लीये जाते थे,  इस तरह बरात का रिवाज पड़ा होगा,

अब अक्सर रस्ते मॉमून हो गए है, लूटफाट आम तौर पर नहीं होती, इसलिए सब इस की ज़रूरत नहीं रही।

इस में चंद खराबियां है।

१।

बहुत सी जगह कुछ रिश्तेदार नाराज़ होते है के हमें बारत की दावत क्यूँ नहीं दी, दूल्हे के घरवालों को एक कशमकश रेहती है के किसी ले जाये और किसे छोडे, बाज़ मर्तबा नाराज़गी में रिश्ते भी टूट जाते है।

२।

नमाज़े क़ज़ा होती है।

३।

आमतौर पर बरात रवाना होने में सब के इन्तिज़ार में ताख़ीर और परेशानी होती है, निकाह के लिए वक़्त पर पहोंचने की जल्दी में बेधडक तेज़ रफ़्तार गाड़ी चलाई जाती है के जिस में कभी ऐक्सिडन्ट भी होते है।

४।

अक्सर बारातों में जित्ने को दावत दी गई हो उस से ज़यादा जाते है, बगैर दावत के जाने वाले को हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया है के चोर बनकर दाखील हुवा और लुटेरा बनकर निकला या उसे चोरी और लूट जैसा गुनाह होता है।

५।

ज़ियादा आदमी के पहोंच जाने की सुरत में मेज़बान की बड़ी बे इज़्ज़ती होती और इंतिज़ाम में बड़ी तकलीफ पहुंचती है, ऐसा करना हराम है।

६।

दुल्हेवाले बे हया बनकर सामने से लड़की वाले को कहते है हम १०० या २०० आदमी लाएंगे और लड़कीवाले शर्मा शर्मी में हाँ केह देते है, लेकिन ऐसा करने में उन को उनके इस्तिक़बाल और क़ियामो तआम के इंतिज़ाम में बड़ी परेशानी होती है, बाज़ों को सूदी क़र्ज़ा लेने तक की नौबत आ जाती है।

७।

बारात ले जाने में खर्च बहुत ज़यादा होता है इसलिए लड़के दूर जगहों में अच्छी लड़कियां मव्जूद होने के बावजूद निकाह के वास्ते क़रीब की लड़की ढूँढ़ने में निकाह में ताख़ीर होती है, बाज़ मर्तबा निकाह की ताख़ीर की वजह से लड़का ज़िना में मुब्तला हो जाता है,

८।

दुल्हन वालों का बारातियों के लिए ठहरने और खाना खिलाने का अलग से इंतेज़ाम करना पड़ता है, जिसमे कमी कोताही रह जाये तो रिश्ते में दरार पड़ती है या फिर निकाह के बाद लड़के के रिश्तेदार लड़की और उसके घर वालों को बुरा भला सुनाते है, ये भी खराबी बहोत जगह पाई जाती है।

और भी बहुत सी खराबी है जो गौर करने से मालूम होती है, एक गुनाह का भी इर्तिक़ाब होता हो तो उस के नाजाइज़ होने के लिए काफी है।

इस्लाहुर रसूम और इस्लामी शादी से माखूज़

बहिश्ती ज़ेवर से माखूज

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारिख :  ७ रबीउल आखर  १४४० हिजरी

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

अ. जहेज़ (दहेज) का लैन दैन करना कैसा है?
ब.  बाज़ कमीटी भी जहेज़ का इंतेज़ाम करती है वह कैसा है?

जवाब:  حامدا و مصلیا و مسلما

अ.

जहेज़ (दहेज) का लैन दैन की २ सुरत है।

१. मुतालबा कर के याने माँगकर लेना ये रिश्वत के हुक्म में है, रिश्वत का लेना हराम है, और सख्त ज़रूरत के बगैर देना भी हराम है।

२. अगर बगैर माँगे रस्मो रिवाज की वजह से लड़कीवाले दे रहे है तो क़ायदा है के जो चीज़ मशहूर होती है वह शरत के दर्जे में होती है, लिहाज़ा बगैर मांगे ख़ामोशी से लेना भी जाइज़ नही।

हां लडकेवाले इन्कार कर दे के हम रस्मो रिवाज को नहीं मानते, हमें तो सिर्फ लड़की दे दो, फिर भी दे तो अगर अपनी हैसियत के मुताबिक, किसी भी क़िस्म का क़र्ज़ लिए बगैर और नुमाईश और दीखलावा किये बगैर दे तो लेने की गुंजाईश है.

तो भी आला दर्जा बेहतर ये है के लेने से सख्त इंकार कर दिया जाये, क्यूँ के आमतौर पर जहेज़ की रस्म की पाबन्दी करना ही मक़सूद होती है.

क्यूँ के अगर बेटी या दामाद को देना हो तो निकाह की तक़रीब में ही सब कुछ देने का इतना एहतेमाम क्यूँ किया जाता है !?

अपनी अवलाद को रिश्तेदार को बगैर दिखलावा किये हमेशा थोड़ा थोड़ा इंसान देता रहता है, उस के लिए शादी ही के दिन के इंतिख़ाब की ज़रूरत न थी। लिहाज़ा जहेज़ की हिम्मत अफजाई न हो इसलिए न लेना ही बेहतर है।

किताबुल फ़तावा ४/४२५

आप के मसाइल ५/१३७ से माखुज़

ब. खिदमत की बाज़ कमिटी गरीबो के लिये, जल्द शादी करवा कर गुनाहों से बचने के लिए रस्मो रिवाज से बचकर सुन्नत के मुताबिक़ दीनी मज्लिस में निकाह और घरेलू ज़रूरी सामान का इंतिज़ाम करते है वह बहुत मुनासीब है।

फतावा महमूदियाः ११/२५७ से माखुज़

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०१ रबीउल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

‘बीवी के ज़िम्मे शोहर के’ हुक़ूक़ व आदाब क्या क्या है?

जवाब:

حامدا و مصلیا و مسلما
“बीवी के ज़िम्मे शोहर के” हुक़ूक़ वा आदाब जो हैं वह हसबे ज़ैल है।

  • १. बीवी का अपने शोहर के हुक्म को मानना।
  • २. शोहर की ख़िदमत करना।
  • ३. शोहर के घर में शोहर की इजाज़त के बगैर किसी को दाखील न करना।
  • ४. शोहर के माल को उस की इजाज़त के बगैर कहीं भी ईस्तिअमाल न करना ईसी तरह इसराफ़ न करना।
  • ५. शोहर की इजाज़त के बगैर उस की मवजूदगी में नफली रोज़ा न रखना।
  • ६. मिया बीवी का एक दूसरे की कोतही व कमी से चश्मपोशी-लेटगो करना।
  • ७. एक दूसरे के बुरे सुलूक़ पर सब्र करना।
  • ८. क़नाअत इख़्तियार करना (जो कुछ मिल जाये उस पर सांतोस-बस करना)
  • ९. शोहर की नाशुक्री ना करना।
  • १०. शोहर की गुफ़्तगू-बात के वक़्त खामोश रहना।
  • ११. शोहर के घरवालों का इकराम करना।
  • १२. अपने पड़ोसियों से कम से कम बातचीत करना।
  • १३. अपने शोहर के दोस्तों के सामने अपनी पेहचान न करवाना, बल्के जो पेहचानता हो उस के सामने भी अजनबीयत इख़्तियार करना।
  • १४. पुरी तवज्जुह अपनी इसलाह, घर के इंतिज़ाम और नमाज़ रोज़े की पाबन्दी की तरफ करना।
  • १५. शोहर के सामने जेबो ज़ीनत के साथ बन सँवर कर रेहना।
  • १६. उस को देखते वक़्त ख़ुशी का इज़हार करना।
  • १७. उस से क़रीब होने के मोके पर मुहब्बत का इज़हार करना।
  • १८. (अगर उज़्र न हो तो) औरत का सोहबत से इंकार न करना।
  • १९. मियाँ बीवी की मिलन की बातों को दुसरों के सामने बयान न करना।
  • २०. शोहर के निकलते वक़्त दरवाज़े तक साथ जाना।
  • २१. औरत का किसी बड़ी वजह के बगैर तलाक का मुतालेबा न करना।

सुननोआदाब सफा २६८
و الله اعلم بالصواب

नॉट: ये मेसेज ( “बीवी के ज़िम्मे शोहर के” हुक़ूक़ वा आदाब ) अपनी तमाम मेहरम औरतों को ज़रूर सुनाये

इस्लामी तारीख़: २६ मुहर्रमुल हराम १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

‘शोहर के ज़िम्मे’ बीवी के क्या हुक़ूक़ और आदाब है?
उस बारे में बड़ी कोताही हो रही है।

जवाब:   حامدا و مصلیا و مسلما

कुरान व हदीस की रौशनी में “शोहर के ज़िम्मे” जो बीवी के हुक़ूक़ है वह हसबे ज़ैल है।

  • १. शोहर का बीवी के सामने अच्छी हालत में रेहना। (साफ सुथरा खुश्बूदार रहना)
  • २. शोहर का अपनी बीवी को वोही चीज़ खिलाना जो खुद खा रहा हो।
  • ३. औरत को उसी में`यार-केटेगिरी के कपड़े पहनाना जिस में`यार के खुद पहन रहा हो।
  • ४. नरमी से बात करना ।
  • ५. बीवी से हुस्ने सुलूक़ करना और उस से पहुंचनेवाली तकलीफ को बर्दाश्त करना।
  • ६. घर के कामकाज में बीवी का हाथ बताना।
  • ७. जाइज़ वादों को पूरा करना।
  • ८. एक से ज़यादा बीवीयों में बराबरी करना।
  • ९. ना मुनासिब कामों पर पहले नसीहत करना।
  • १०. नसीहत से फायदा न हो तो सोने की जगा को अलग करना।
  • ११. अगर ये तरीक़ा भी मुफ़ीद साबित न हो तो हुदूदे शरीअत में रह कर कुछ हलकी सी पिटाई करना।
  • १२. औरतों को उनके मुँह पर न मरना।
  • १३. बीवी की सहेलीयों और रिश्तेदारों का इकराम करना।

सुनने आदाब सफा २७२
و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़२५ मुहर्रमुल हराम १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

महर कम से कम कितना देना ज़रूरी है और ज़ियादह से ज़ियादह कितना और बेहतर महर कितना है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

महर की कम से कम मिक़्दार ३१ ग्राम चांदी की निकाह के दिन की क़ीमत है और ज़ियादा महर देने की कोई हद मुताईयान नहीं है, बहोत ज़ियादह महर देना अच्छा नहीं है, और बेहतर महर महरे फातिमी १ किलो ५३१ ग्राम चांदी की निकाह के दिन की क़ीमत है.

(हमारे गुजरात में शादी में जहां शरीअत ने नहीं बताया वहाँ खूब खर्च किया जाता है लेकिन शरीअत ने बेहतर महर महरे फातिमी बताया वह अक्सर लोग देने तैयार नहीं)

दरसी बहिश्ती ज़ेवर साफा ३५५ से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

शरीअत में हर चीज़ के आदाब और रहनुमाई है, तो निकाह के क्या आदाब और इस्लामी रहनुमाई है ?

जवाब
حامدا و مصلیا مسلما

निकाह के आदाब और रहनुमाई नीचे लिखे जाते है।

१। अच्छी निय्यत (निगाह और शर्मगाह की हिफ़ाज़त और नेक अवलाद पैदा होने की निय्यत) से निकाह करना।

२। शादी करने में जल्दी करना।

३। नैनो नफ़्क़ाह (बीवी का रोटी, कपड़ा, मकान के इंतिज़ाम) की ताक़त हो तो ही निकाह करना।

४। औरत को अपने वाली-क़रीबी रिश्तेदार के ज़रिये पैगाम भिजवाना ।

५। दूसरे के पैगामे निकाह पर अपना पैग़ाम न भेजना।

६। औरत का अपनी शौतन की तलाक़ का मुतालबा न करना।

७। शादी से पहले जिस से निकाह का ईरादह हो उस को एक नज़र देख लेना।

८। शादी से पहले औरत की राय मालूम करना।

९। मर्द और औरत का दिल एक दुसरे की तरफ माइल हो (और कोई शरई रुकावट न हो) तो उन का आपस में निकाह करा देना।

१०। दीनदार और अचछे अख़लाक़ वाली शरीके हयात को पसंद करना।

११। कुफु (यानि नसब, दीन, माल, धंधे में बराबरी) का ख्याल रखना (ताके मिजाज़, तोरो तरीक़ मिले तो ज़गड़े पैदा न हो)

१२। ज़यादा बच्चे जनने वाली औरत को तलाश करना।

बाकी कल इन शा अल्लाह त’आला

सुननो आदाब सफा ३३७

हिजरी तारीख़ :
२१ / रबीउल अव्वल ~ १४४१ हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

निकाह के बाद निस्बती भाई (साले) अपने बहनोई (भाईजान) के जुटे-चप्पल छुपा देता है, और उस के एवज़ में पैसे मागता है, इसी तरह बिरादर निस्बती अपने बहनोई को कोल्ड ड्रिंक या मिठाई खिलाता है, और उस के बदले में भी पैसे मांगता है,
ऐसे पैसे लेने देने का क्या हुक्म है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

ये दोनों काम सिर्फ रस्म है, जिस से बचना चाहिए,
देनेवाले की नाराज़गी के बावजूद उस से पैसे निकलवाना शरअन जाइज़ नहीं।

नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम का इरशाद है , “किसी मुस्लमान का माल उस की दिली रज़ामंदी के बगैर हलाल नहीं”

मिश्कात
मंगनी शादि के मसाइल का हल सफा ४५
و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
२० रबीउल अव्वल १४४१ हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

अगर माँ-बाप ने रिश्ता किया है और लड़का या लड़की रिश्ते से मुत्तफ़िक़ नहीं है तो क्या करना चाहिए ?

जवाब
حامدا و مصلیا مسلما

वालिदैन से ज़ियादा महरबान और ख़ैरख़्वाह कोई हो नहीं सकता।

इसलिए बेहतर यही है के इस बारे में माँ-बाप की बात मान ली जाए।

इसी में आफ़ियत (दुन्या आख़िरत की भलाई) है।

दरसी सवाल जवाब सफा २४६

हिजरी तारीख़ :
०९ / रबीउल अव्वल ~ १४४१ हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

जीना से गरीबी आती है, ऐडस वगैरह बीमारी आती है, इमान दिल से उस वक़्त निकल जाता है, वगैरह नुक़सान है।

मेरा दिल ज़िना-बदकारी करने को चाहता है तो इस से बचने का तरीक़ा क्या है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

१.

हज़ूर ﷺ  ने इस की तदबीर-आईडिया बताया है,

एक शख्स ने नबी ﷺ से ज़िना की इजाज़त मागी,

हुज़ूर ﷺ ने उस से सवाल किया के क्या तुम चाहते हो के कोई तुम्हारी बहन, बेटी, बीवी, माँ से ज़िना करे ?

तो उस ने अर्ज़ किया के हरगिज़ नहीं।

तो आप ने फ़रमाया तुम जिस से ज़िना करोगे वह भी किसी की बेटी बहन बीवी या माँ होगी तो दूसरे भी ये नहीं चाहते तो ये सुन कर उसे ज़िना से नफरत हो गयी।

२.

हज़रात इमाम शफ़ी रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते है के :

ज़िना एक क़र्ज़ है, जो जिनाकार के घरवालों से ज़रूर वुसूल किया जाएगा।

यानि हमारे घर की कोई भी औरत ज़रूर इस में मुब्तला होगी।

३.

अपने घर ही में रहे, जिस के साथ ज़िना में फँसने का खतरा हो उस के सामने न जाये, उस से बात भी न करे।

४.

बचने की ताक़त हासिल हो जाये उस के लिए किसी अल्लाह वाले बुजरुग से बैत हो जाये-उन से इस्लाही तअल्लुक़ क़ाइम करे, और मवका बा मवका उन की सोहबत-मुलाक़ात इख़्तियार करे।

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०९ जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

निकाह में लड़की वालों से मुतय्यन (फिक्स) कर के रूपया लेना जाइज़ है या नहीं ?

अगर किसी ने लिया हो तो उस के वलीमा में शिरकत करना कैसा है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

जाइज़ नहीं.

(महमूदुल फतावा ५/६९४)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

३० रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

 

शादी में खाने के बाद पैसे का कवर, नयोता, हदया, वेहवार देना कैसा है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

फकीहुल असर हज़रत मुफ्ती रशीद लुधयानी रहमतुल्लाहि अलय्हि तहरीर फ़रमाते है : ऐसे न्यौते में चंद खराबियाँ है।

१।

ये हदया (वेहवार ,चांदला) की रक़म या सामान ज़बर्दस्ती वसूल किया जाता है, इस तौर पर के न देनेवालों बुरा कहा जाता है।

(आजकल तो निकलने के रस्ते पर टेबल ही लगा दिया जाता और नाम लिखे जाते है, इसलिए आदमी शरमा शरमी में न देने का इरादा हो तो भी दे देता है, शर्म में डालकर दिली रज़ामंदी के बगैर वसूल करना भी जाइज़ नहीं)

२।

देनेवाली की निय्यत शोहरत और नाम कमाने की होती है, ऐसी निय्यत से जाइज़ काम भी ना जाइज़ हो जाते है।

३।

उस रस्म को फ़र्ज़ और वाज़िब की तरह पाबन्दी और एहतेमाम से अदा किया जाता है

(हैसिय्यत या इरादा न हो तो भी देते है)

हालां के इस क़िस्म की पाबन्दी और ज़रूरी समझने से जाइज़ और मुस्तहब  काम को भी छोड़ देना वाज़िब हो जाता है।

४।

ये रक़म और सामान बा क़ायदा लिखा जाता है, जिन का मोके पर अदा करना ज़रूरी समझा जाता है, और सख्त ज़रूरत के बगैर क़र्ज़ का लेन दैन ना जाइज़ है।

क़र्ज़ होने की सूरत में उस की आदायगी ,मौत होने की सुरत में उस में विरासत की तक़सीम उस का ईस्तिअमाल और इन्तिक़ाल के बाद आइन्दह ये क़र्ज़ा किस को अदा किया जाये इस के बहुत से पेचीदह मसाइल खड़े हो जाते है, जो मुफ़्तियाँन व उलेमा ए किराम से मालूम किये जा सकते है।

लिहाज़ा ये लैन दैन नाजाइज़ है।

(अहसनुल फ़तावा ५/१४८ से माखूज़)

و اللہ اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२९ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

निकाह के बारे में इस्लाम भी खानदान का ऐतिबार करता है ?

फुलां खानदान या फुलां बिरादरी ही में हम तो निकाह करेंगे ये सोच सहीह है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हर खानदान के रहन सहन खाने पीने की चीज़ें और उस के तरीके और अवक़ात, खानदान के रस्मो रिवाज, ज़बान, वगेरह चीजें अलग अलग होती है,

रिश्ता बाकी रहे और आपस में किसी क़िस्म का झगड़ा न हो इस लिए इन चीज़ों को आपस में मिलना ज़रूरी और बेहतर है,

और ऊँचे खानदान वाले नीचे खानदान वाले लड़के से निकाह करे तो इंसानी मिज़ाज उसे ऐब और शर्म समझता है, हालां के ये चीज़ें ऐब और शर्म की नहीं है, और हर चीज़ में असल  तरीका तो शरीअत ही का होना चाहिए, और असल इज़्ज़त की चीज़ तक़वा और परेज़गारी है,

लेकिन शरीअत ने निकाह के नाज़ुक रिश्ते को निभाने के लिए कुफु (निकाह में बराबरी) की रिआयत को ज़रूरी क़रार दिया, साथ साथ में निकाह के वाली (निकाह करने का इख़्तियार रखने वाले रिश्तेदार) की इजाज़त से गैर बराबरी में निकाह करने का इख़्तियार देकर असल शरई क़ानून को भी मलहूज़ रखा।

(दरसे तिर्मिज़ी ४/३४९ से माखूज)

و الله اعلم بالصواب

ईस्लामी तारीख़

१५ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

लड़की वाले को वलीमा करना कैसा है?

सुना है के हराम है, उन की दावत नहीं खानी चाहिए ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

लड़की वालों की तरफ से लड़के वालों के मुकाबले में वलीमा करना साबित नहीं।

हां अगर लडके वाले लड़की को लेने या शादी में शिरकत करने बतौरे मेहमान आये हो, और उन को बुलाया भी गया हो, फिर वह खाना खाएंगे,

मेहमान का इकराम करना तो शरीअत का हुक्म है, हुज़ूर ﷺ अपनी बेटी के यहाँ जाते थे तो बेटी आप ﷺ की खातिर तवाज़ोअ करती थी।

लिहाज़ा उन मेहमानो के खिलाने का इंतिज़ाम कर सकते है।

(फतावा महमूदिया १२/१४२)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१३ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

हालाते हैज़ में या वेसे ही बीवी से आगे के बजाये पीछे के रास्ते से सुहबत की,

तो कया इस से निकाह टूट जाता है?

अगर ऐसा कर लिया तो इस की तलाफ़ी की क्या सुरत है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

इस गैर इंसानी हरकत से निकाह नहीं टूटेगा, अगरचे ये इन्तिहाई बुरा और सख्त तरीन कबीरा गुनाह है इस से सचचे दिल से तौबा और इस्तिगफार करना ज़रूरी है, और तौबा की निय्यत से कुछ सदक़ह भी कर दे।

किताबुननवाज़िल ८/५५५

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१४ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

हाथ पर महेंदी लगाने का औरतों, मरदों और बच्चों का क्या हुक्म है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

ओरतों को हाथ और पैर पर महेंदी लगाना सुन्नत है, लेकिन तस्वीर न बनाये।

मरदों को बतौरे ज़ीनत मेहंदी लगाना ना-जाइज़ और मकरूह है।

ना-बालिग बच्चों को भी मेहंदी लगाना जाइज़ नहीं, हाँ, बतौरे इलाज दवाई के तौर पर लगाना जाइज़ है।

(बालों और नाखूनो के मसाइल सफा ४३)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१२ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

बारात का शरअन क्या हुक्म है ?

कितने आदमी को ले जाना चाहिए?

बारात किस तरह ले जाये के सुन्नत के मुताबिक़ निकाह हो ???

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

बारात कोई शरई चीज़ नहीं,

नामो नमूद-दिख्लावे और इसराफ़ से बचते हुवे चंद लोग लड़के के साथ चले जाये और निकाह में शरीक हो जाए।

कीताबुंनवाज़िल ८\४५६

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०६ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

आज का सवाल नंबर १५७५

होने वाली मंगेतर को शादी बियाह के मौक़े पर बार बार देखना, उसे बात-चीत या मेसेज करना, अगर उस की इस्लाह की निय्यत से हो तो जाइज़ है या नहीं ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

निस्बत और मंगनी हो चुकने के बाद भी जब तक निकाह नहीं हुवा हो वह लड़की अपने मंगेतर लड़के के हक़ में अजनबिय्यह है,

और अजनबी औरत का जो हुकम है वोही उस मँगेतर लड़की पर जारी होगा, खत-ओ-किताबत.

(मेसेज, चैटिंग) चाहे इस्लाह व नसीहत पर मुश्तमिल हो फितना और ईस्तल्ज़ाज़ (लज़्ज़त हासिल करना) से खाली नहीं है,

और फुक़हा ने मर्द के हक़ में औरत (अजनबिय्यह) के झुटे (बचे हुवे) और औरत के हक़ में मर्द के झुटे को मकरूह लिखा है।

दुर्रे मुख्तार

मंगेतर और मखतूबा को पेहली बार देखने की शरीअत ने जो इजाज़त दी है, वह भी ज़रूरत की वजह से ख़िलाफ़े क़ियास है,

जो अपनी हद तक महदूद है, इसिलिये अगर एक मर्तबा देख चूका है तो दूसरी मर्तबा हराम है।

अगर तअल्लुक़ न रखने से किसी क़िस्म का अन्देशा हो तब भी मना, ना-जाइज़ काम का करना जाइज़ क़रार नहीं दिया जा सकता,

उसका आसान इलाज यह है के अक़्दे निकाह कर लिया जाए, चाहे रुखसती न हो, इस सुरत में इख़्तियार भी लड़के के हाथ में रहेगा,

और खत-ओ-किताबत, मेसेज, चेट्टिंग, कालिंग वगेरा भी जाइज़, बल्के मुस्तहसन (बहुत अच्छा) हो जाएगा।

महमूदुल फ़तवा: ४ /७५४, ७५५)

मुफ़्ती सिराज सीदात साहब दा ब्

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०५ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

कया ज़वाल के वक़्त निकाह करना मकरूह है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

ज़वाल या किसी भी मकरूह वक़्त में निकाह जाइज़ है,

मकरूह नहीं है।

आलमगीरी शरीयते निकाह से माखूज

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०४ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

हज़ूर सलल्लाहु अलैहि वसल्लम  का इत्तिबा का हम को हुक्म है, और आप का तरीक़ा हमारे लिए नमूना है, तो मुझे ये जानना है हुज़ूर ﷺ  ने किस के वलीमे में क्या खिलाया ?

जवाब: حامدا و مصلیا و مسلما

बहुत अच्छा सवाल है,

लोगों ने वलीमा करने की सुन्नत के नाम पर शानदार वलीमा करने और ज़यादा लोगों को खिलाने के चक्कर में निकाह में तखीर, सूदी क़र्ज़, खाने का बिगाद, वलीमे में फ़ख्र और  मुक़ाबला, देखा देखी शुरू कर दी है۔

लेकिन वलीमे में प्यारे नबी ﷺ   जिन की इत्तिबा का हम को हुक्म दिया है उन की सादगी और वलीमे में मुख़्तसर कम खर्च कर के निकाह को बा बरक़त बानाना भूल गए हैं, लिहाज़ा जिन अज़्वाजे मुतह्हरात (हुजूर ﷺ की पाक बीवियां) के वलीमा की सराहत किताबों में मिली उसे पेश किया जाता है।

हज़ूर ﷺ   ने हज़रत ज़ैनब रदियल्लाहु अन्हा का वलीमा (एक)  बकरी के गोष्ट से किया।
हज़रत उम्मे सलमा रदियल्लाहु अन्हा का वलीमा जव की रोटी से किया।
हज़रत सफिया रदियल्लाहु अन्हा का वलीमा खजूर, रोटी और घी से किया।
हज़रत आइशा रदियल्लाहु अन्हा का वलीमा एक प्याला दूध से किया।

हज़ूर ﷺ से मुहब्बत के दावे करने वाले इस सुन्नत पर या ऐसा सादा और मुख़्तसर वलीमा कर के दिखाए।

बहिश्ती जहेज़ सफा १४६ बा इज़ाफ़ा माखूज़

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०३ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

कया हुज़ूर ﷺ ने अपनी बेटी फातिमा रदियल्लाहु अन्हा को जहेज़ दिया था ?

और हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु ने लिया था ?

उस की क्या हकीकत है ?

इस से तो जहेज़ का सुबूत मिल रहा है !!

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु के वालिद अबू तालिब निहायत गरीब थे, उन से हुज़ूर ﷺ ने हज़रत अली को परवरीश के लिए मांग लिया था, उन के पास शादी के बाद बीवी के साथ अलग रहने के लिए घर की बुनयादी ज़रूरत का घरेलु सामन भी न था, इसलिए हुज़ूर ﷺ ने खुद इन्तिज़ाम किया, वह भी सिर्फ अपनी बेटी फ़ातिमा को ही जहेज़ दिया, इस के अलावह किसी भी बेटी को जहेज़ नहीं दिया।

आजकल भी कोई ऐसा दूल्हा हो जिस के पास बीवी के साथ अलग रहने के लिए ज़रूरी सामान का इंतिज़ाम न हो तो वह भी जहेज़ ले सकता है, लेकिन माँगने का हक़ नहीं।

घरेलु सामान घर का इंतिज़ाम ये दूल्हे या उस के घरवालों ज़िम्मेदारी है, बीवी के घरवालों की ज़िम्मेदारी नहीँ।

बहिश्ती जहेज़ सफा १२२ से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०२ रबीउल उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

निकाह का आसान तरीक़ा क्या  है  जिस  में  कौन  सी  चीज़  फ़र्ज़  वाजिब  है  और  कौन सी  नहीं ?

  जवाब: حامدا و مصلیا و مسلما

निकाह  नाम  है  दो  आक़िल,  बालिग  कोई भी मर्द  या  एक  मर्द, दो कोई  भी  औरत, इन   गवाहों  की  मवजूदगी  में  मर्द  औरत  के  इज़ाब व  क़ुबूल  करने  का.

(याने औरत या उसका वकील भेजे हुवे से कहे के मैंने निकाह किया, या निकाह में दिया और मर्द कहे के मैंने क़ुबूल किया)

जिस  में  कम से  कम ३१ ग्राम चांदी की कीमत का  महर वाजिब  है. उस का  भी  निकाह  के  वक़्त  देना  ज़रूरी  नहीं, बल्कि बेहतर है, वरना उधार  भी  रख  सकते  है.

जिस  में  क़ाज़ी  का  होना, ख़ुत्बे  और  वलीमे  का  होना, छुवारे  तक़सीम  करना  सुन्नत  है,  फ़र्ज़  या  वाजिब  नहीं. हनफ़ियाह  के  नज़दीक  निकाह  इतना  आसान  है  के  कोई  इस  तरह  निकाह  कर  ले  तो  जीना -बदकारी  में  मुब्तला  होने  की  नौबत  ही  न  आये.

इस्लामी  शादी

मजमू ए क़वानीन ए इस्लाम से मअख़ूज़

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२९ रबीउल अव्वल १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

क्या  ये  बात  सहीह  है  के  अवलाद   बालिग  हो  जाये  फिर  बाप  उस  की  जल्दी  शादी  न  कराये  और  अवलाद  खुद  ज़ीना में  मुब्तला  हो  जाये  तो  भी  उस  का  ज़िम्मेदार  उस  का  बाप  है ?

जवाब: حامدا و مصلیا و مسلما

जी हाँ, ये  बात  हदीस  से  साबित  है, एक शर्त के  साथ  पूरी  हदीस हस्बे  ज़ैल  है.

रसूलुल्लाह  सल्लल्लाहु  अलैहि वसल्लम  ने  फ़रमाया  के:

जिस  शख्स  के  यहाँ  लड़का  पैदा  हो  तो  उसे  चाहिए  के  वो  उसका  नाम  अच्छा  रखे  और  उसे  नेक  आदाब  सिखाये,

(यानि  शरीयत  के  अहकाम  और  आदाब, ज़िंदगी  के  इस्लामी  तरीके  सिखाये  ताकि  वो  दुनिया  व  आख़िरत  में  कामयाब  और  सर बुलंद  हो)

फिर  वो  बालिग़  हो  जाये  तो  उसका निकाह  करा दे,

अगर  लड़का  बालिग़  हो  ( और शादी  के  खर्चे  पर  वह  खुद  क़ुदरत  ना रखता  हो) और  उसका  बाप  (उसके  सादगी  से  निकाह  का  खर्चा  बर्दाश्त  करने  पर  क़ुदरत  रखता  हो  उसके  बावजूद) उसका  निकाह  ना  करे  और  फिर  वो  लड़का  बुराई  में  (ज़ीना) मुब्तला  हो  जाये  तो  उसका  गुनाह  बाप  पर  होगा

मिश्कात, २ /२७१

रसूलुल्लाह  सल्लल्लाहु  अलैहि वसल्लम  ने  फ़रमाया:

तौरात  में  लिखा  हुआ  हे  के  जिस  शख्स  की  लड़की  की  उम्र  १२  साल (बालिग़ ) हो  जाये  और  वह  (जोड़  का  रिश्ता  मिलने  के  बावजूद) उसका  निकाह  ना  करे.

फिर  वो  लड़की  बुराई  ( यानि  बदकारी, गैर के साथ शादी कर के मुर्तद हो जाये,  वगेरा) में  मुब्तला  हो  जाये  तो  उसका  गुनाह  उसके  बाप  पर हे.

मिश्कात,  २/२७२ 

आजकल  इंटरनेट  के  इस  दौर  में  अवलाद  को  पाकदामन  रखना  बाप  की  ज़िम्मे  ज़रूरी  है  के  सादगी  से  भी  निकाह  की  क़ुदरत  हो  जल्द  निकाह  करा दे.

इज़्दिवाजी  ज़िंदगी  के  शरई  मसाइल  और  उनका  हल,

सफ़ा ३९, ४०

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२८ रबीउल अव्वल १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

वलीमा कितने आदमी को खिलाना चाहिए ? 

 

जवाब

 

حامدا و مصلیا و مسلما

 

शरीअत की तरफ से इस की कोई ता’दाद मुतय्यन नहीं है, हर आदमी अपनी ख़ुशी से अपनी हैसियत और गुंजाईश  के मुताबिक़ लोगों वलीमा खिला दे।

 

हुज़ूर सलल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने हज़रत अब्दुररहमान इब्ने औफ रदी अल्लाहु अन्हु (जो इतने मालदार सहाबी है, के उन की वफ़ात के बाद उन की विरासत को सोना कुल्हाड़ी से तोड़ तोड़ कर तक़सीम किया गया) इन को उन के निकाह पर फ़रमाया, “वलीमा करो, अगरचे एक बकरी ही का क्यूँ न हो”

 

इस से मालूम हुवा के वलीमे का हुक्म गुंजायश के मुताबिक़ है

 

फतवा कास्मिया १२/५७२

 

सिर्फ बिलकुल क़रीबी रिश्ते के चंद आदमीयों को भी वलीमे की निय्यत से खिलाये तो भी वलीमे की सुन्नत अदा हो जाएगी। 

 

و الله اعلم بالصواب

 

इस्लामी तारीख़

२६ रबीउल अव्वल १४४० हिजरी 

 

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

1.एक शख्स बीवी से लवातात करता है (याने पीछे के रास्ते से ख़्वाहिश पूरी करता है) इसका यह करना कैसा है ?
अगर ऐसा हो गया तो इसकी तलाफ़ी की क्या सूरत है ?
अगर मर्द के साथ करे तो इसकी तलाफ़ी की क्या सूरत है ?

२.
हालात ए हैज़ में कभी अपनी ख्वाहिश से बीवी से लवातात करता है, कभी हाथ से फायदा उठता5 है, मनी खारिज करवाता है, कभी बीवी के जिस्म पर रगड कर ख़्वाहिश पूरी करता है, इनका करना कैसा है ?
अगर ऐसा हो गया तो इसकी तलाफ़ी की क्या सूरत है ?

जवाब:  حامد و مصلیا و مسلما

१. २.
लवातात किसी भी हालात में जाइज़ नही, ख़्वाह बीवी पाक हो या हालात ए हैज़ में हो, अगर ऐसा गलत काम हो जाए तो सचचे दिल से तौबह व इस्तिगफार लाज़िम है, और बेहतर है के तौबह की निय्यत से कुछ सदक़ह भी कर दे.

और ख़्वाहिश का तक़ाज़ह कुछ इस क़दर हो के गुनाह में मुब्तलाह होने का अन्देशा हो, और बीवी न-पाकि में हो, औरत की नाफ से लेकर घुटने के अलावह जिस्म के हिस्साः मसलन हाथ वगैरह से लज़्ज़त पूरी करने की गुंजाईश है, और रान वगैरह से बिना कुछ हाइल फायदा उठाना जाइज़ नहीं।

शामी ९/४८७
و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़ २४ मुहर्रमुल हराम १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

निकाह में लड़की वालों से मुतय्यन (फिक्स) कर के रूपया लेना जाइज़ है या नहीं ?

अगर किसी ने लिया हो तो उस के वलीमा में शिरकत करना कैसा है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

जाइज़ नहीं.

(महमूदुल फतावा ५/६९४)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

३० रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

 

शादी में खाने के बाद पैसे का कवर, नयोता, हदया, वेहवार देना कैसा है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

फकीहुल असर हज़रत मुफ्ती रशीद लुधयानी रहमतुल्लाहि अलय्हि तहरीर फ़रमाते है : ऐसे न्यौते में चंद खराबियाँ है।

१।

ये हदया (वेहवार ,चांदला) की रक़म या सामान ज़बर्दस्ती वसूल किया जाता है, इस तौर पर के न देनेवालों बुरा कहा जाता है।

(आजकल तो निकलने के रस्ते पर टेबल ही लगा दिया जाता और नाम लिखे जाते है, इसलिए आदमी शरमा शरमी में न देने का इरादा हो तो भी दे देता है, शर्म में डालकर दिली रज़ामंदी के बगैर वसूल करना भी जाइज़ नहीं)

२।

देनेवाली की निय्यत शोहरत और नाम कमाने की होती है, ऐसी निय्यत से जाइज़ काम भी ना जाइज़ हो जाते है।

३।

उस रस्म को फ़र्ज़ और वाज़िब की तरह पाबन्दी और एहतेमाम से अदा किया जाता है

(हैसिय्यत या इरादा न हो तो भी देते है)

हालां के इस क़िस्म की पाबन्दी और ज़रूरी समझने से जाइज़ और मुस्तहब  काम को भी छोड़ देना वाज़िब हो जाता है।

४।

ये रक़म और सामान बा क़ायदा लिखा जाता है, जिन का मोके पर अदा करना ज़रूरी समझा जाता है, और सख्त ज़रूरत के बगैर क़र्ज़ का लेन दैन ना जाइज़ है।

क़र्ज़ होने की सूरत में उस की आदायगी ,मौत होने की सुरत में उस में विरासत की तक़सीम उस का ईस्तिअमाल और इन्तिक़ाल के बाद आइन्दह ये क़र्ज़ा किस को अदा किया जाये इस के बहुत से पेचीदह मसाइल खड़े हो जाते है, जो मुफ़्तियाँन व उलेमा ए किराम से मालूम किये जा सकते है।

लिहाज़ा ये लैन दैन नाजाइज़ है।

(अहसनुल फ़तावा ५/१४८ से माखूज़)

و اللہ اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२९ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

निकाह के बारे में इस्लाम भी खानदान का ऐतिबार करता है ?

फुलां खानदान या फुलां बिरादरी ही में हम तो निकाह करेंगे ये सोच सहीह है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हर खानदान के रहन सहन खाने पीने की चीज़ें और उस के तरीके और अवक़ात, खानदान के रस्मो रिवाज, ज़बान, वगेरह चीजें अलग अलग होती है,

रिश्ता बाकी रहे और आपस में किसी क़िस्म का झगड़ा न हो इस लिए इन चीज़ों को आपस में मिलना ज़रूरी और बेहतर है,

और ऊँचे खानदान वाले नीचे खानदान वाले लड़के से निकाह करे तो इंसानी मिज़ाज उसे ऐब और शर्म समझता है, हालां के ये चीज़ें ऐब और शर्म की नहीं है, और हर चीज़ में असल  तरीका तो शरीअत ही का होना चाहिए, और असल इज़्ज़त की चीज़ तक़वा और परेज़गारी है,

लेकिन शरीअत ने निकाह के नाज़ुक रिश्ते को निभाने के लिए कुफु (निकाह में बराबरी) की रिआयत को ज़रूरी क़रार दिया, साथ साथ में निकाह के वाली (निकाह करने का इख़्तियार रखने वाले रिश्तेदार) की इजाज़त से गैर बराबरी में निकाह करने का इख़्तियार देकर असल शरई क़ानून को भी मलहूज़ रखा।

(दरसे तिर्मिज़ी ४/३४९ से माखूज)

و الله اعلم بالصواب

ईस्लामी तारीख़

१५ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

लड़की वाले को वलीमा करना कैसा है?

सुना है के हराम है, उन की दावत नहीं खानी चाहिए ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

लड़की वालों की तरफ से लड़के वालों के मुकाबले में वलीमा करना साबित नहीं।

हां अगर लडके वाले लड़की को लेने या शादी में शिरकत करने बतौरे मेहमान आये हो, और उन को बुलाया भी गया हो, फिर वह खाना खाएंगे,

मेहमान का इकराम करना तो शरीअत का हुक्म है, हुज़ूर ﷺ अपनी बेटी के यहाँ जाते थे तो बेटी आप ﷺ की खातिर तवाज़ोअ करती थी।

लिहाज़ा उन मेहमानो के खिलाने का इंतिज़ाम कर सकते है।

(फतावा महमूदिया १२/१४२)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१३ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

मंगनी की दावत का हुक्म

शरीअत में मंगनी किसे कहते हैं? मंगनी कैसी होनी चाहिए? अब हमारे इलाक़े में मगनियाँ भी शादी की तरह होने लगी हैं बड़ी बड़ी दावतें होती है मर्दों और औरतों की हाज़री होती है इसका क्या हुक्म है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

शरीअत में एक फ़रीक़ की जानिब से दूसरे फ़रीक़ (पार्टी) के सामने निकाह की तजवीज़ (पुख्तः इरादा) रखे जाने को मगनी कहा जाता है, जब फ़रीक़े सानी (दूसरी पार्टी) उस तजवीज़ को मंज़ूर कर लेता है तो मगनी का अमल मुकम्मल हो जाता है, शरीअत की निगाह में इसकी हैसियत एक वादे की है किसी उज्रे शरई के बगैर तोडना गुनाह है,

हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु फरमाते है के हज़रात फ़ातिमाः रदियल्लाहु अन्हा के लिए पैगामे निकाह लेकर में हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर हुवा जब आप के सामने बैठा तो खामोश हो गया, खुदा की क़सम में रोअब और जलाल की वजह से कुछ बोल न सका. खुद आप  ने दरयाफ़त किया के कैसे आये हो? क्या कोई काम है! में खामोश रहा तब आप  ने फ़रमाया शायद फ़ातिमाः की मगनी के लिए आये हो? मेने अर्ज़ किया जी हाँ.

(अल बिदायह वन निहाया ३/३४६)

जिसे  अल्लाह की इजाज़त से क़बूल फरमा लिया गया बस ज़ुबानी तौर पर सब कुछ तय हो गया, न लोग इकठ्ठा हुवे और न कोई ऐहतमाम हुवा.

मुआशरती. मसाइल सफा ७५

लिहाज़ा मंगनी के किये सबको जमा करना बड़ी ता’अदद में मर्दों औरतों की हाज़री उनकी दावत वगैरह शर’न ज़रूरी और पसन्दीदाह नहीं, बल्कि ख़वातीन (औरतों) की मावजूदगी जिन खराबियों को पैदा करती है वह लोग जानते ही हैं इस से बचना ज़रूरी है.

मंगनी शादी के मुताल्लिक़ पेश आनेवाले मसाइल का हल सफा १३

अज क़लम पिरो मुर्शिद हज़रत अक़दस मुफ़्ती अहमद खानपुरी साहब दा ब

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१० रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

दुल्हे का हार, सेहरा पहेनना और हाथ में कलगी (फ़ूलों का गुलदस्ता) रखना कैसा है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हार, सेहरा, और हाथ में कलगी रखना ये असल में  हिन्दुस्तान के गैर मुस्लिमों की रस्म है, जो नव मुस्लिम और इल्म से नावाक़िफ़ मुस्लमानो में बाकी रह गई है, और उन की सुहबत से दूसरे इस क़िस्म के गैर पाबन्द और एहतियात न करनेवाले मुस्लमानो में दाखील हो गई है।

इस्लिये इस छोड़ना वाज़िब है।

हिन्दुस्तान के उलेमा ने इसे मुशाबेहत की वजह से मना फ़रमाया है। 

हज़रत मुफ्ती किफ़ायतुल्लाह साहब, हज़रत मुफ्ती अज़ीज़ुर रहमान साहब, हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब वगैरह के फ़तवा में इस को मना लिखा है। और उन सब के उस्ताज़ुल असतीजा हज़रत मौलाना शाह इशाक दहेलवी रहमतुल्लाही अलय्हि (जिन को बरेलवी भी अपना बड़ा मानते है) उनके फ़तवा में भी मना किया गया है।

फ़तावा महमूदियाः १०/३१८

शादी में पेश आनेवाले मसाइल सफा ४९

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०९ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

दुलहन को लेने लोग बारात क्यूँ ले जाते है ?  इस में बहुत परेशानी होती है और खर्च ज़यादा होता है,

उम्मत के सामने इस के नुक़सानात को वाज़िह फरमाइये ताके इसका रिवाज ख़त्म हो।

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

पहले ज़माने में आमतौर पर एक दो सवार होते थे तो डाकू लूट लेते थे,

इसलिए दुलहन, उस के ज़ेवर और सामान की हिफाज़त के लिए कई आदमी उसे लेने के लीये जाते थे,  इस तरह बरात का रिवाज पड़ा होगा,

अब अक्सर रस्ते मॉमून हो गए है, लूटफाट आम तौर पर नहीं होती, इसलिए सब इस की ज़रूरत नहीं रही।

इस में चंद खराबियां है।

१।

बहुत सी जगह कुछ रिश्तेदार नाराज़ होते है के हमें बारत की दावत क्यूँ नहीं दी, दूल्हे के घरवालों को एक कशमकश रेहती है के किसी ले जाये और किसे छोडे, बाज़ मर्तबा नाराज़गी में रिश्ते भी टूट जाते है।

२।

नमाज़े क़ज़ा होती है।

३।

आमतौर पर बरात रवाना होने में सब के इन्तिज़ार में ताख़ीर और परेशानी होती है, निकाह के लिए वक़्त पर पहोंचने की जल्दी में बेधडक तेज़ रफ़्तार गाड़ी चलाई जाती है के जिस में कभी ऐक्सिडन्ट भी होते है।

४।

अक्सर बारातों में जित्ने को दावत दी गई हो उस से ज़यादा जाते है, बगैर दावत के जाने वाले को हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया है के चोर बनकर दाखील हुवा और लुटेरा बनकर निकला या उसे चोरी और लूट जैसा गुनाह होता है।

५।

ज़ियादा आदमी के पहोंच जाने की सुरत में मेज़बान की बड़ी बे इज़्ज़ती होती और इंतिज़ाम में बड़ी तकलीफ पहुंचती है, ऐसा करना हराम है।

६।

दुल्हेवाले बे हया बनकर सामने से लड़की वाले को कहते है हम १०० या २०० आदमी लाएंगे और लड़कीवाले शर्मा शर्मी में हाँ केह देते है, लेकिन ऐसा करने में उन को उनके इस्तिक़बाल और क़ियामो तआम के इंतिज़ाम में बड़ी परेशानी होती है, बाज़ों को सूदी क़र्ज़ा लेने तक की नौबत आ जाती है।

७।

बारात ले जाने में खर्च बहुत ज़यादा होता है इसलिए लड़के दूर जगहों में अच्छी लड़कियां मव्जूद होने के बावजूद निकाह के वास्ते क़रीब की लड़की ढूँढ़ने में निकाह में ताख़ीर होती है, बाज़ मर्तबा निकाह की ताख़ीर की वजह से लड़का ज़िना में मुब्तला हो जाता है,

८।

दुल्हन वालों का बारातियों के लिए ठहरने और खाना खिलाने का अलग से इंतेज़ाम करना पड़ता है, जिसमे कमी कोताही रह जाये तो रिश्ते में दरार पड़ती है या फिर निकाह के बाद लड़के के रिश्तेदार लड़की और उसके घर वालों को बुरा भला सुनाते है, ये भी खराबी बहोत जगह पाई जाती है।

और भी बहुत सी खराबी है जो गौर करने से मालूम होती है, एक गुनाह का भी इर्तिक़ाब होता हो तो उस के नाजाइज़ होने के लिए काफी है।

इस्लाहुर रसूम और इस्लामी शादी से माखूज़

बहिश्ती ज़ेवर से माखूज

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारिख :  ७ रबीउल आखर  १४४० हिजरी

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

बारात का शरअन क्या हुक्म है ?

कितने आदमी को ले जाना चाहिए?

बारात किस तरह ले जाये के सुन्नत के मुताबिक़ निकाह हो ???

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

बारात कोई शरई चीज़ नहीं,

नामो नमूद-दिख्लावे और इसराफ़ से बचते हुवे चंद लोग लड़के के साथ चले जाये और निकाह में शरीक हो जाए।

कीताबुंनवाज़िल ८\४५६

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०६ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

होने वाली मंगेतर को शादी बियाह के मौक़े पर बार बार देखना, उसे बात-चीत या मेसेज करना, अगर उस की इस्लाह की निय्यत से हो तो जाइज़ है या नहीं ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

निस्बत और मंगनी हो चुकने के बाद भी जब तक निकाह नहीं हुवा हो वह लड़की अपने मंगेतर लड़के के हक़ में अजनबिय्यह है,

और अजनबी औरत का जो हुकम है वोही उस मँगेतर लड़की पर जारी होगा, खत-ओ-किताबत.

(मेसेज, चैटिंग) चाहे इस्लाह व नसीहत पर मुश्तमिल हो फितना और ईस्तल्ज़ाज़ (लज़्ज़त हासिल करना) से खाली नहीं है,

और फुक़हा ने मर्द के हक़ में औरत (अजनबिय्यह) के झुटे (बचे हुवे) और औरत के हक़ में मर्द के झुटे को मकरूह लिखा है।

दुर्रे मुख्तार

मंगेतर और मखतूबा को पेहली बार देखने की शरीअत ने जो इजाज़त दी है, वह भी ज़रूरत की वजह से ख़िलाफ़े क़ियास है,

जो अपनी हद तक महदूद है, इसिलिये अगर एक मर्तबा देख चूका है तो दूसरी मर्तबा हराम है।

अगर तअल्लुक़ न रखने से किसी क़िस्म का अन्देशा हो तब भी मना, ना-जाइज़ काम का करना जाइज़ क़रार नहीं दिया जा सकता,

उसका आसान इलाज यह है के अक़्दे निकाह कर लिया जाए, चाहे रुखसती न हो, इस सुरत में इख़्तियार भी लड़के के हाथ में रहेगा,

और खत-ओ-किताबत, मेसेज, चेट्टिंग, कालिंग वगेरा भी जाइज़, बल्के मुस्तहसन (बहुत अच्छा) हो जाएगा।

महमूदुल फ़तवा: ४ /७५४, ७५५)

मुफ़्ती सिराज सीदात साहब दा ब्

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०५ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

हज़ूर सलल्लाहु अलैहि वसल्लम  का इत्तिबा का हम को हुक्म है, और आप का तरीक़ा हमारे लिए नमूना है, तो मुझे ये जानना है हुज़ूर ﷺ  ने किस के वलीमे में क्या खिलाया ?

जवाब: حامدا و مصلیا و مسلما

बहुत अच्छा सवाल है,

लोगों ने वलीमा करने की सुन्नत के नाम पर शानदार वलीमा करने और ज़यादा लोगों को खिलाने के चक्कर में निकाह में तखीर, सूदी क़र्ज़, खाने का बिगाद, वलीमे में फ़ख्र और  मुक़ाबला, देखा देखी शुरू कर दी है۔

लेकिन वलीमे में प्यारे नबी ﷺ   जिन की इत्तिबा का हम को हुक्म दिया है उन की सादगी और वलीमे में मुख़्तसर कम खर्च कर के निकाह को बा बरक़त बानाना भूल गए हैं, लिहाज़ा जिन अज़्वाजे मुतह्हरात (हुजूर ﷺ की पाक बीवियां) के वलीमा की सराहत किताबों में मिली उसे पेश किया जाता है।

हज़ूर ﷺ   ने हज़रत ज़ैनब रदियल्लाहु अन्हा का वलीमा (एक)  बकरी के गोष्ट से किया।
हज़रत उम्मे सलमा रदियल्लाहु अन्हा का वलीमा जव की रोटी से किया।
हज़रत सफिया रदियल्लाहु अन्हा का वलीमा खजूर, रोटी और घी से किया।
हज़रत आइशा रदियल्लाहु अन्हा का वलीमा एक प्याला दूध से किया।

हज़ूर ﷺ से मुहब्बत के दावे करने वाले इस सुन्नत पर या ऐसा सादा और मुख़्तसर वलीमा कर के दिखाए।

बहिश्ती जहेज़ सफा १४६ बा इज़ाफ़ा माखूज़

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०३ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

अ. जहेज़ (दहेज) का लैन दैन करना कैसा है?
ब.  बाज़ कमीटी भी जहेज़ का इंतेज़ाम करती है वह कैसा है?
जवाब:  حامدا و مصلیا و مسلما
अ.
जहेज़ (दहेज) का लैन दैन की २ सुरत है।

१. मुतालबा कर के याने माँगकर लेना ये रिश्वत के हुक्म में है, रिश्वत का लेना हराम है, और सख्त ज़रूरत के बगैर देना भी हराम है।

२. अगर बगैर माँगे रस्मो रिवाज की वजह से लड़कीवाले दे रहे है तो क़ायदा है के जो चीज़ मशहूर होती है वह शरत के दर्जे में होती है, लिहाज़ा बगैर मांगे ख़ामोशी से लेना भी जाइज़ नही।

हां लडकेवाले इन्कार कर दे के हम रस्मो रिवाज को नहीं मानते, हमें तो सिर्फ लड़की दे दो, फिर भी दे तो अगर अपनी हैसियत के मुताबिक, किसी भी क़िस्म का क़र्ज़ लिए बगैर और नुमाईश और दीखलावा किये बगैर दे तो लेने की गुंजाईश है.

तो भी आला दर्जा बेहतर ये है के लेने से सख्त इंकार कर दिया जाये, क्यूँ के आमतौर पर जहेज़ की रस्म की पाबन्दी करना ही मक़सूद होती है.

क्यूँ के अगर बेटी या दामाद को देना हो तो निकाह की तक़रीब में ही सब कुछ देने का इतना एहतेमाम क्यूँ किया जाता है !?

अपनी अवलाद को रिश्तेदार को बगैर दिखलावा किये हमेशा थोड़ा थोड़ा इंसान देता रहता है, उस के लिए शादी ही के दिन के इंतिख़ाब की ज़रूरत न थी। लिहाज़ा जहेज़ की हिम्मत अफजाई न हो इसलिए न लेना ही बेहतर है।

किताबुल फ़तावा ४/४२५
आप के मसाइल ५/१३७ से माखुज़

ब. खिदमत की बाज़ कमिटी गरीबो के लिये, जल्द शादी करवा कर गुनाहों से बचने के लिए रस्मो रिवाज से बचकर सुन्नत के मुताबिक़ दीनी मज्लिस में निकाह और घरेलू ज़रूरी सामान का इंतिज़ाम करते है वह बहुत मुनासीब है।

फतावा महमूदियाः ११/२५७ से माखुज़

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०१ रबीउल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

निकाह का आसान तरीक़ा क्या  है  जिस  में  कौन  सी  चीज़  फ़र्ज़  वाजिब  है  और  कौन सी  नहीं ?

 जवाब: حامدا و مصلیا و مسلما

निकाह  नाम  है  दो  आक़िल,  बालिग  कोई भी मर्द  या  एक  मर्द, दो कोई  भी  औरत, इन   गवाहों  की  मवजूदगी  में  मर्द  औरत  के  इज़ाब व  क़ुबूल  करने  का.

(याने औरत या उसका वकील भेजे हुवे से कहे के मैंने निकाह किया, या निकाह में दिया और मर्द कहे के मैंने क़ुबूल किया)

जिस  में  कम से  कम ३१ ग्राम चांदी की कीमत का  महर वाजिब  है. उस का  भी  निकाह  के  वक़्त  देना  ज़रूरी  नहीं, बल्कि बेहतर है, वरना उधार  भी  रख  सकते  है.

जिस  में  क़ाज़ी  का  होना, ख़ुत्बे  और  वलीमे  का  होना, छुवारे  तक़सीम  करना  सुन्नत  है,  फ़र्ज़  या  वाजिब  नहीं. हनफ़ियाह  के  नज़दीक  निकाह  इतना  आसान  है  के  कोई  इस  तरह  निकाह  कर  ले  तो  जीना -बदकारी  में  मुब्तला  होने  की  नौबत  ही  न  आये.

इस्लामी  शादी

मजमू ए क़वानीन ए इस्लाम से मअख़ूज़

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२९ रबीउल अव्वल १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

वलीमा कितने आदमी को खिलाना चाहिए ? 

 

जवाब

 

حامدا و مصلیا و مسلما

 

शरीअत की तरफ से इस की कोई ता’दाद मुतय्यन नहीं है, हर आदमी अपनी ख़ुशी से अपनी हैसियत और गुंजाईश  के मुताबिक़ लोगों वलीमा खिला दे।

 

हुज़ूर सलल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने हज़रत अब्दुररहमान इब्ने औफ रदी अल्लाहु अन्हु (जो इतने मालदार सहाबी है, के उन की वफ़ात के बाद उन की विरासत को सोना कुल्हाड़ी से तोड़ तोड़ कर तक़सीम किया गया) इन को उन के निकाह पर फ़रमाया, “वलीमा करो, अगरचे एक बकरी ही का क्यूँ न हो”

 

इस से मालूम हुवा के वलीमे का हुक्म गुंजायश के मुताबिक़ है

 

फतवा कास्मिया १२/५७२

 

सिर्फ बिलकुल क़रीबी रिश्ते के चंद आदमीयों को भी वलीमे की निय्यत से खिलाये तो भी वलीमे की सुन्नत अदा हो जाएगी। 

 

و الله اعلم بالصواب

 

इस्लामी तारीख़

२६ रबीउल अव्वल १४४० हिजरी 

 

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २५५३⭕

निकाह करने का तक़ाज़ा है लेकिन बीवी के महर और उसको रखने के लिए पैसा नहीं है तो उस के लिए क़र्ज़ लेने का क्या हुक्म है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

जिस शख्स को निकाह का शदीद तक़ाज़ा हो, और फिलहाल उसके पास माली वुस’अत न हो, तो बेहतर है के क़र्ज़ ले कर निकाह का इंतिज़ाम करे।

और जो शख्स अदायगी की निय्यत से पाक-दामनी के मक़सद से क़र्ज़ लेकर निकाह करेगा तो अल्लाह की तरफ से उसकी मदद होगी, इन शा अल्लाह।

हदीश शरीफ में रसूलुल्लाह ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया के तीन शख्स की मदद करना अल्लाह त’आला ने खुद अपने ज़िम्मे में लाजिम कर रखा है।

१। अल्लाह के रास्ते में ज़िहाद करने वाले।

२। वह गुलाम जो अपनी आज़ादी के लिए क़ीमत अदा करना चाहता हो।

३। वह निकाह करने वाला जो पाक-दामनी चाहता हो।

📗तिर्मिज़ी शरीफ हदीस नंबर १६५५

इस हदीश शरीफ से मालूम हुवा के इफ़्फ़त व ईस्मत-पाक दामनी की हिफाज़त और ज़िना से बचने के लिए जो शख्स निकाह का इरादा करेगा, अल्लाह की मदद उस के शामिल हाल होगी।
इन शा अल्लाह।

📘किताबुल मसाइल ४/३६,४४

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २५५५⭕

अगर किसी के पास हज के सफर के बकद्र माल जमा हो जाए, और उसे निकाह की भी ज़रुरत हो, तो उसे अव्वलन हज करना चाहिए या निकाह ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

इस बारे में ये तफ़सील है के
अगर अभी हज के सफर में देर हो, (मसलन : शाबान या मुहर्रम के महीने में माल हासिल हो, और हज के लिए लोग ज़ुल-क़दह में जाते है) तो पहले निकाह करने की इजाज़त है।

और हज का वक़्त क़रीब हो तो निकाह को मोअख़्ख़र करेगा, और पहले हज की अदायगी करेंगा।

बशर्ते के निकाह को मोअख़्ख़र करने में गुनाह में मुब्तला होने का यकीन न हो, अगर ऐसी कैफ़ियत हो तो बहरहाल निकाह को मुक़द्दम रखा जाएगा।

📚किताबुल मसाइल ३/८६

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २५५६⭕

शरी’अत कम उमरी में शादी की इजाज़त देती है ?
या उस के लिए कोई उम्र की हद है ?
किस उम्र निकाह करना बेहतर है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

निकाह के लिए शर’अन कोई मुतय्यन मुद्दत नहीं है, बल्कि उम्र में किसी भी हिस्से में निकाह हो सकता है। अलबत्ता बालिग़ होने से पहले लड़का या लड़की खुद निकाह का अक़्द नहीं कर सकते। बल्कि उन के वाली (वालीद, या दादा वगैरह) उन के मस्लिहतों को मद्दे नज़र रख कर निकाह कर सकते है।

सहीह अहादीस के मुताबिक़ उम्मुल मु’अमिनीन हज़रत आइशा (रदियअल्लाहु त’आला अन्हा) का निकाह ६ साल की उम्र में उन के वालिद हज़रत अबुबक्कर सिद्दीक़ (रदियअल्लाहु त’आला अन्हु) ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ कर दिया था। और ९ साल की उम्र में आप रदियअल्लाहु त’आला अन्हा की रुखसती अमल में आई।

लिहाज़ा जब लड़का लड़की दोनों बालिग़ हो जाए और हुक़ूक़े जवजिययत की अदायगी पर क़ादिर हो जाए और मुनासिब रिश्ता मिल जाए तो फ़ौरन निकाह कर लेना बेहतर है।फितनों से बचने का बेहतरीन रास्ता यही है।

(नॉट: इंडिया के नई लो के ऐतिबार से १५ साल की लड़की का निकाह भी क़ानून भी सहीह है।
वकिल इमरान मलिक सुरत।)

📘 दारुल-इफ्ता
दारुल उलूम देवबंद

माखूज़: दारुल-इफ्ता दारुल उलूम देवबंद
फतवा नंबर।:- ४२२४१
माखूज़: दारुल-इफ्ता जमीअत-उल-उलूम-उल-इस्लामययह बनोरी टाउन
फतवा नंबर।:- १४४००८२००६३५

و الله اعلم بالصواب