aaj ka sawal hindi

ब्लड कैंप में जो हज़रात ब्लड देते है या ख़िदमत करते है उन को ज़िम्मेदारों की तरफ से गिफ्ट दी जाती है, तो उस गिफ्ट का लेना किस के लिए जाइज़ और किस के लिए नाजाइज़ है ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

ब्लड को बेचना यानि उस का कोई एवज़-बदला लेना हराम है। लिहाज़ा जिन लोगों ने खून दिया है उन को गिफ्ट लेना जाइज़ नहीं।

हां, जिन हज़रात ने खून नहीं दिया है, बल्के कैंप को क़ामयाब बनाने के लिए ख़िदमत दी है, या कैंप में किसी मेहमान को बुलाया हो उन के लिए गिफ्ट लेना जाइज़ है।

(निजामुल फ़तावा जिल्द १ सफा ३५६ से माखूज़)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
०४शा’बानअलमुअज़्ज़म१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

मेने सुना है के इस्लाम में ओहदा मांग कर लेने की इजाज़त नहीं, आज कल लोग इलेक्शन में खुद को उम्मेदवार बना कर पैश करते है और लोगों से वोट देने की अपील करते है।
ऐसा करना कैसा है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

येह सहीह है के रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने किसी ओहदे को तलब करने से मना फ़रमाया, और यह भी फ़रमाया के जो किसी ओहदे को तलब करता है तो अल्लाह की मदद उस से हत जाती है, और वह अपने नफ़्स के हवाले कर दिया जाता है,

और जिस को बगैर मांगे ओहदा दिया जाये तो अल्लाह की तरफ से उस की मदद की जाती है।

किताबुल फतावा ६/२६१

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
१०शा’बानअलमुअज़्ज़म१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

११ अप्रिल को पूरी दुन्या में मेमन डे मनाना शुरू हुवा है, इस तरह दिन मनाने का शरीअत में क्या हुक्म है ?

जवाब

حامدا و रمصلیا مسلما

दे मनाना एक अगर खुराफात न हो तो एक अच्छा तरीक़ा है, ये दिन मनाना ऐसा है जैसे हम यौमे आज़ादी वगैरह सरकारी दिन मनाते है, इस का मक़्सद ज़िम्मेदारी से मालूम किया तो पता चला के पूरी दुन्या के तमाम मेमन मिल कर इस दिन ज़यादा से ज़यादा ख़िदमत के काम करे और दूसरी क़ौम के सामने अपने अख़लाक़ व सखावत को पेश करे,

लेकिन ये डे मानाने की शुरुआत बहुत अच्छी निय्यत और जज़्बे के साथ होती है लेकिन फिर आहिस्ता आहिस्ता इस में बहुत से खुराफ़ात, फ़ुज़ूल खर्चियाँ और गैर शरई चीज़ें दाखिल हो जाती है, इस की कई मिसालें हर क़ौम में है,

नाचीज़ दो मिसाल आप के सामने पेश करता है।

१। इसा अलैहिससलाम की पैदाइश का दिन मनाना बड़ी अच्छी नियत से ईसाईयों-खिरिस्तियों ने शुरूआ किया था, के इस दिन अपने नबी को याद करेंगे और चर्च में इबादत करेंगे और नबी का मेसेज दुन्या को देंगे, शुरूआत इसी तरह सादगी से हुई थी, लेकिन इस के बाद ३१ नया साल मनाने की रस्म चर्च से बाहर आयी और उस दिन, शराब, ज़िना और हर क़िस्म के खुराफ़ात होने लगे जिसे हम जानते है।

२। ताज़िये, इसे तैमूर लंग बादशाह ने बड़ी अच्छी निय्यत से अहले बैत हज़रत हुसैन रदिअल्लाहु अन्हु की मुहब्बत में शुरू किया था, उन के रोज़े की डुप्लीकेट बनाई थी और सादगी से ज़यारत करता था, बाद में ये कितना फेला और इस में क्या क्या खुराफ़ात और शिर्क बिदअत शामिल हो गए वह हमारी निग़ाह के सामने है।

ईसी तरह अगर मेमन डे मानाने पर पूरी तवज्जुह न रखी गई तो इस का भी हाल ऐसा हो सकता है।

मेमन डे मनाने में चंद खराबियां पैदा हो सकती है, लिहाज़ा उस का पूरा ध्यान ज़िम्मेदारियाँ को रखना ज़रूरी हैं, वरना अल्लाह न करे अक्सर जगह खुराफ़ात ग़ालिब आने की वजह से मेमन डे के नाजाइज़ होने का फ़तवा लग सकता है।

१। अपने मेमन होने पर फ़ख्र करना या किसी और क़ौम को हक़ीर-निचा समझना ये दोनों बातें जाइज़ नहीं, अपने नसब पर फ़ख्र करना क़यामत की निशानियों में से है।

२। मेमन डे को हद से ज़यादा सजावट और लाइटिंग की फ़ुज़ूल खर्ची न हो।

३। उस दिन खास गाने और म्यूजिक बजा कर उसे सेलेब्रटी न किया जाए।

४। उस दिन डांस कर के ख़ुशियाँ न मनाई जाए।

५। केक काट कर उस दिन को न मनाया जाए।

६। मेमन डे लिखी टी-शर्ट वगैरह कपडे पहन कर फखर, गरूर और फ़ुज़ूल खर्चो न की जाए।

७। इस डे को सेलेब्रटी करने आतिशबाजी-पटाखे न फोड़े जाए।

८। जो कुछ भी ख़िदमत की जाये अल्लाह को राज़ी करने और नबी सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम के तरीके पर इखलास के साथ की जाये, दुसरों को दिखलाना, नाम कमाना, शोहरत हासिल करना अपनी क़ौम की बड़ाई जतलाना मक़सूद न हो, ख़िदमत की तौफ़ीक़ अल्लाह देता है, उस पर शुक्र अदा करते हुवे अल्लाह की बरगाह में क़ुबूलियत की दुआ करते हुवे तमाम काम किये जाये।

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
०४शा’बानअलमुअज़्ज़म१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

खिराजे अकीदत-श्रद्धांजलि पेश करने का क्या तरीक़ा है ?

५ मिनट मौन धारण करना- खामोश रेहना कैसा है?

अक्सर गैर मुस्लिम मक़तूल-मरने वाले को शहीद केह सकते है ?

 जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

हमारे नॉन मुस्लिम भाई मरने वालों के फोटू पर फूल हार चढ़ा कर खिराजे अकीदत-श्रद्धांजलि पेश करते है,

यहूदि, इसाई मोम्बत्ती जला कर,

और मुसलमान क़ुरान पढ़ कर सदक़ा और नेक आमाल कर के उस का सवाब मरने वाले मुसलमान को बख़श कर खिराजे अक़ीदत पेश करे

ओर हर मरने वाले के रिष्तेदारों को तसल्ली-दिलासा और हिम्मत दे, और अल्लाह से उन के लिए उस का अच्छा बदला मिलने की दुआ दे, अगर ज़रूरतमन्द हो तो उन की मदद करे।

दुन्या और आख़िरत का शहीद ये ख़ास इस्तिलाह-परिभासा  मुसलमान के लिए खास तौर पर बोली जाती है,

अगर गैर मुस्लिमों के यहाँ हर मरने वाले मज़लूम के लिए शहीद बोलने का रिवाज हो तो वह बोल सकते है।

(शामी ९/५५२,१/४७२ से माखूज)

(मुफ़्ती जुनैद बम्बवी के फतवे का खुलासा)

و الله اعلم بالصواب

(इस्लामी तारीख़

१८ जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी(

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

जीना से गरीबी आती है, ऐडस वगैरह बीमारी आती है, इमान दिल से उस वक़्त निकल जाता है, वगैरह नुक़सान है।

मेरा दिल ज़िना-बदकारी करने को चाहता है तो इस से बचने का तरीक़ा क्या है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

१.

हज़ूर ﷺ  ने इस की तदबीर-आईडिया बताया है,

एक शख्स ने नबी ﷺ से ज़िना की इजाज़त मागी,

हुज़ूर ﷺ ने उस से सवाल किया के क्या तुम चाहते हो के कोई तुम्हारी बहन, बेटी, बीवी, माँ से ज़िना करे ?

तो उस ने अर्ज़ किया के हरगिज़ नहीं।

तो आप ने फ़रमाया तुम जिस से ज़िना करोगे वह भी किसी की बेटी बहन बीवी या माँ होगी तो दूसरे भी ये नहीं चाहते तो ये सुन कर उसे ज़िना से नफरत हो गयी।

२.

हज़रात इमाम शफ़ी रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते है के :

ज़िना एक क़र्ज़ है, जो जिनाकार के घरवालों से ज़रूर वुसूल किया जाएगा।

यानि हमारे घर की कोई भी औरत ज़रूर इस में मुब्तला होगी।

३.

अपने घर ही में रहे, जिस के साथ ज़िना में फँसने का खतरा हो उस के सामने न जाये, उस से बात भी न करे।

४.

बचने की ताक़त हासिल हो जाये उस के लिए किसी अल्लाह वाले बुजरुग से बैत हो जाये-उन से इस्लाही तअल्लुक़ क़ाइम करे, और मवका बा मवका उन की सोहबत-मुलाक़ात इख़्तियार करे।

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०९ जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

वैलेंटाइन’स डे की हकीकत क्या है?

ईस की शुरूआत कब से हुई?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

ईस की तारिख में बयान किया जाता है के आज से डेढ़ हज़ार साल पहले संत वैलेंटाइन नामी एक ईसाई पादरी था।

उस ने बेहयाई की सारी हदें पार करते हुए ईसाई लड़की से जीना(सेक्स) किया था।

इसी बात पर इंग्लैंड की हुकूमत ने १४ फेब्रुअरी को उसे फांसी की सजा दी थी।

उस की बरसी पहले मज़हब तक़रीब हुवा करती थी, मगर बाद मे इस दिन को इंग्लैंड की नौजवान नस्ल ने उसकी याद में मनाना शुरू कर दिया, और संत वैलेंटाइन उन के आइडियल बन गए।

(सेह रोज़ा दवाई २२ फ़रवरी २००० ईस्वी)

उपर दी हुई बातों से मालूम हुवा के ये मज़हबी तेहवार है, और अफ़सोस की बात अब मुस्लमानो ने भी इस बेहया और बेशरम नसल की तरह इसको मनाना शुरू कर दिया

याद रखे

अल्लाह के रसूल ﷺ की हदीस का मफ़हूम है

जो शख्स जिस क़ौम की मुशाबहत (तरीके) इख्तयार करेंगा वो उन्ही में शुमार होगा।

यानी बरोज़े क़यामत उन्ही जैसा हशर किआ जायेगा,

लिहाज़ा अपने इमान और अपने घर के नवजवानो के इमान पाकदमनी की हिफाज़त करे, उन को समझाए, और कल की रात बाहर न जाने दे, अपनी जवान लड़की और बहनो पर खास निगरानी रखे, वह किसी गलत तअल्लुक़ और हवश का शिकार न बने।

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०८ जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

१४ फेब्रुअरी को लड़का लड़की एक दूसरे को चोकलेट, गुलाब, और गिफ्ट और बहोत सारे हड़िये देते है,

एक दूसरे के हाथों में हाथ डाल कर, और गले लग कर, अपनी ख़ुशी अपने प्यार का इज़हार करते है, और भी बोहत सारे बहयाई, फहशी के काम करते है,

शर’अन और अकलन ये केसा है ??

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

वैलेंटाइन्स डे मनाना गैर इस्लामी है,

कुरान मजीद के रौशनी में इसका हुकम जान लेना चाहिए। इरशादे खुदावन्दी है,

ولاترکنوا إلى الذين ظلموا فتمسكم النار

ओर तुम इन लोगो के तरफ मिलान इख़्तेयार मत करो जिन्होंने अपने ऊपर ज़ुल्म किया, कही ऐसा नहो के तुम भी जहन्नम के मुस्तहिक़ बन जाव,

इसमे क़ाबले गोर ये है के आज उम्मते मुस्लिमा इनके रंग में रंगे जा रही है, अगरचे वो शरई एतेबार से नाजाइज़ व हराम ही क्यों न हो, लेकिन हमारे नवजवान भाईयो और बहनो को इसका होश नहीं है,

स्कूल और कॉलेजेस में हर साल १४ फेब्रुअरी को वैलेंटाइन्स डे के नाम से एक जशन मनाया जाता है, जिसमें आपस में स्टूडेंट्स एक दूसरे को गुलाब का फूल वगेरा पेश कर के मोहब्बत का इज़हार करते है, ये वैलेंटाइन्स डे मनाना शर’अन नाजाइज़ व हराम है,

ये वैलेंटाइन्स डे इस वजह से भी मना है के इस मौके पर तरह तरह के गैर शर’ई और हराम व नाजाइज़ उमूर का इरतेकाब किया जाता है

बदनज़री, बेपर्दगी, फ़ह्हाशि, व बेहयाई, अजनबी लड़के लड़किया का आपस में इख़्तिलात हसी मज़ाक़ बोसो व कीनार, नीज़ नाजाइज़ वा हराम ताल्लुक़ात को मज़बूत बनाने के लिए एक दूसरे को तोहफे का लेनदेन करते है,  इसके नतीजे में ज़ीना, का पेश आना या असबाबे ज़िना का वजूद होता है,

नबी करीम ﷺ  ने इरशाद फरमाया (मफ़हूम)

तूम में से किसे के सर में लोहे के सुई घोप दे जाए,, तो ये इसके लिए बेहतर है,

बा निस्बत इसके के वो ऐसी औरत को छुये जो इसके लिए हलाल नाहि,

معقل بن یسار رضی اللہ عنہ

رسول اللہ صلی علیہ وسلم قال:أن يطعن في رأس أحدكم بمخيط من حديد خير له من أن يمس أمرأة لا تحل له (الطبرانی فی الکبیر ٢١٢/٢۰)

इन तमाम उमूर के वजह से इस तेहवार या इस दिन को मनाना तो दुर, एक ग़ैरत मंद मुसलमान मोमिन मर्द औरत के लिए तसववुर करना भी मुश्किल होना चहिये, और इन तमाम उमूर के नाजाइज़ व हराम होने में कोई शक़ वा शुबा बाकी नहीं रहता।

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती सिराजुल हक़ सादाति मेवाती दा.ब्.

खादिम जामिआ सादत-ए-दारेन मोली नूह हरयाणा मेवात

७९८८७९१३६६

तसदीक़ व तशहील

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

वैलेंटाइन’स डे मनाना कैसा है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

वैलेंटाइन’स डे मनाना गैर इस्लामी है।

गैर-मुस्लिम के तेहवार सहीह मानकर या त’अज़ीम के इरादे से मनाना और उन के तरीके अपनाना कुफ़्र है।

कई बार शैतान मुसलमानो को नफ़्स के ज़रिये बहकता है और हमे लगता है के गैर-मुस्लिमो के तेहवार और तरीक़ा अच्छा है।

आज के दौर में गैरो के साथ मुसलमान लड़के और लड़किया भी वैलेंटाइन’स डे मनाते हैं और विश करते है, हाथ मिलाते हैं और गले मिलते हैं और रोज़, चॉकलेट, कार्ड और गिफ्ट देते है। ये सब बेहयाई के काम हैं और गुनाह ए कबीरह है। और गिफ्ट वगैरह देने में माल ज़ाया करना है और फ़ुज़ूल खर्ची करना भी गुनाह है।

ओर किसी को शहवत से देखना या छूना या इस के बारे में बात करना ये सब बेहयाई और बालद-निगाही और आज़ा-पर्दा का ज़ीना-बद फैली का गुनाह है। और कुछ लोग तो ज़िना हराम सेक्स भी करते है। किसी से बगैर निकाह के सेक्स करना ‘ज़ीना-बद फेली है और गुना ए कबीरह है।

अब हमें ये तय करना है के हमे इस्लामी तरीक़ा अपनाना है या गैरो का ?

पयारे आक़ा सय्यद उल अम्बिया मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के प्यारे उम्मतियो, गैरो के तेहवार और तरीके कितना भी अछे लगे लेकिन मुस्लमान को सिर्फ अपने मज़हब का सहीह तरीक़ा अपनाना चाहिए और इन सब गुनाहो से बचना चाहिए ताके अल्लाह और उस के रसूल ﷺ राज़ी हो।

आप लोग ये सब बातें अपने दोस्तों को बता कर उन्हें भी इन बेहयाई, अययाशी और फ़ुज़ूल खर्ची और गुनाहो वाले तेहवार मनाने से दूर रहने के लिए समझायें।

कीसी को नेक अमल करने के लिए केहना या गुनाह से बचने के लिए केहना इमानी फ़रीज़ा और बहुत बड़ी नेकी है ।

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०७ जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

किसी के इन्तिक़ाल पर मैय्यत के रिष्तेदारों की ताज़ियत -तसल्ली कितने दिन तक कर सकते है?

ताज़ियत किसकी करे?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

ताज़ियत सिर्फ तिन दिन तक कर सकते है, इस के बाद मकरूह है,

हाँ, सफर में हो तो फिर ३ दिन के बाद भी कर सकते है।

मैय्यत के तमाम रिश्तेदार की ताज़ियत करे, चाहे मर्द हो या औरत, छोटा हो या बड़ा, हाँ जवान औरत की ताज़ियत न करे।

(आलमगिरि १/४१२)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२८ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

क्रिश्मस डे क़रीब आता है तो स्कूल में फंक्शन होता है, उस में हमारे बाज़ मुस्लिम बच्चों को सांताक्लॉस का रूप बनाने को कहा जाता है, और बहोत सो को उस की टोपी पहनाई जाती है, तो क्या बचचे ये लिबास इस्लामी ऐतिबार से पहन सकते है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

इस्लामी शरीयत में गैर क़ौम से मुशाबेहत इख़्तियार करने की मुमानिअत-मना होना आया है, हदीस शरीफ में है जिस ने जिस क़ौम की मुशाबेहत-कॉपी इख़्तियार की उस का हश्र क़यामत में ज़िंदा किया जाना उसी के साथ होगा.

क्रिश्मस डे- (नाताल) नसारा का तेहवार है, उस में सांताक्लॉस का लिबास इख़्तियार करना उन की मज़हबी रस्म है,

लिहाज़ा सांताक्लॉस का रूप इख़्तियार करने की या उस की टोपी पहनने की बच्चों को भी इजाज़त न होगी, इस से उन के मज़हब का रंग उन पर चढ़ता है, और उन की गलत तरबियत होती है,

जिस का गुनाह तवज्जुह न देने की वजह से माँ बाप को होता है, लिहाज़ा उस से अपनी अवलाद को बचाना ज़रूरी है.

माखूज़ अज मजमउज़जवाएद ५/१६९

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१७ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

दिवाली के मौके पर गैर मुस्लिम की देखा देखि दुकान या माकन साफ करना या रंग रोगन करना केसा है ?

 जवाब:  حامدا و مصلیا و مسلما

अगर मक़सूद इन के मज़हब की ताज़ीम और रौनक बढ़ाना है तो न जाइज़ है,  अगर सिर्फ सफाई और ज़ीनत मक़सूद हो तो दिवाली से पहले मुशाबेहत पाए जाने की वजह से मना है, सफाई दिवाली बाद कर ले

‘दिवाली पर सफाई‘:

फतावा महमूदियाः १८/३३ से ३५ से ३५ और हाशियाह से माखूज़

फतावा क़ाज़ीखान ३/५७७ ८/१५५ से माखूज़.

و الله اعلم بالصواب

“दिवाली पर सफाई” By:

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

‘पटाखे फोड़ने के नुक़सानात‘: इस्लाम में पटाखे फोड़ना क्यों हराम है ?

जवाब:  حامدا و مصلیا و مسلما

“पटाखे फोड़ने के नुक़सानात“: पटाखे फोड़ने में दसयों हराम काम वजूद में आते है और उस में सैकड़ों नुक़सानात है, जिस में से कुछ पेश किये जाते है.

“पटाखे फोड़ने के नुक़सानात“

१. कानो के पर्दें बार बार तेज़ आवाज़ से कमज़ोर हो जाते है.

२. उस के धुवें से आँखें कमज़ोर होती है.

३. बारूद वाली हवा और धुवा गले में जाती है जिस से गले और फेफड़ें को नुकसान होता है.

४. अपने और दूसरों  के जान माल को जोखम में डालना.

५. हाथ पैर मुंह जल जाने का खतराः.और जल जाने के हज़ारों वाक़ियात  पेश आ चुके है.

६. रॉकेट से झोंपड़ों और घरो में आग लगना.

७. हवा का प्रदूषण-ख़राब होना.

८. रास्तों में कचरे का होना.

९. करोड़ों और लाखों रुपयों की फ़ुज़ूल खर्ची और पैसों की बर्बादी.

१०. बूढ़े बीमार और ताज़ा पैदा शुदा बच्चें चौंक जाते है.

११. पूरी रात पटाखे फूटने से उन को बहोत तकलीफ होती है और उन की नींद ख़राब होती है.

१२. मेटेनरी हॉस्पिटल के क़रीब फूटे तो सुववदी-बच्चा जननेवाली माँ परेशान होती है,  ताज़ा पैदा होने वाले बच्चे रोने लगते है इन को चुप करना मुश्किल हो जाता है.

१३. दरख्त के क़रीब पटाखे फूटते है तो परिंदे बहरे हो जाते है.

१४. परींदो के बच्चों का कलेजा फट जाता है और वह मौत के घाट उतर जाते है.

१५. कागज़ जो इल्म हासिल करने का ज़रियाः उस को जला दिया जाता है और लिखे हुवे कागज़ों की बे अदबी होती है, क़ुरान के सफ़े भी बाज़ जगा पाए गए है.

१६. गैर क़ौम की मुशाबेहत और उन के साथ हश्र होना वगैरह वगैरह.

इस्लाहुर रसूम सफ़ा १६ १८ इज़ाफ़े के साथ.

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़: २० सफर उल मुज़फ्फर १४४० हिजरी

“पटाखे फोड़ने के नुक़सानात“: मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

गरबा, डांडिया, नवरात्रि में शिरकत १५१०

‘गरबा, डांडिया, नवरात्रि‘: हिन्दुओं के त्यौहार गरबा (नव-रात्रि) में शिरकत करना कैसा है?

जवाब:   حامدا و مصلیا و مسلما

“गरबा, डांडिया, नवरात्रि” हिन्दुओं का मज़हबी त्यौहार है, जिसमें वह अम्बा देवी की मूर्ति या तस्वीर के तवाफ़ (चक्कर) लगा कर उसकी पूजा करते हैं, इसमें शिरकत करना गैरुल्लाह को पूजने के बराबर गुनाह है, जो कुफ़्र और सख्त गुनाह है.

काबा शरीफ के अलावह किसी भी चीज़ का तवाफ़ जाइज़ नहीं है, “गरबा, डांडिया, नवरात्रि” में कुफ़्र के अलावह म्यूज़िक, गाना गाना या सुनना, बद-निगाहि, ग़ैरों के साथ ताल्लुक़ात वगैरह कई गुनाह में मुब्तला होने का ज़रिया है, लिहाज़ा इस में शिरकत करना इमान बर्बाद करना और हराम है।

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़: १ सफर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २५६५⭕

आशूरह को मद्रसह और कारोबार बंद रखना चाहिए या चालू ?

🔵जवाब🔵

आशूरह के दिन मद्रसह और कारोबार बंद रखने में कई खराबियां है।


१।
शियों की मुशाबहत।

२।
शियों की रस्मो रिवाज की तक़वियत व ताईद।

३।
उस दिन शिया हज़रात अपने मज़हब के लिए बे पनाह मशक़्क़त और सख्त मेहनत का मुज़हिराह-ज़ाहिर करते हैं उसके बरखिलाफ अहले सुन्नत छुट्टी रखेंगे तो बे हिम्मत कमज़ोरी और आराम का मुजाहिराह-इज़हार होगा।

४।
उस दिन बेकार और फ़ारिग होने की वजह से ताज़िये के जुलूस या मातम व मरसिया की मज्लिस में शरीक़ हो कर कई ग़ुनाहों में मुब्तला हो जाएंगे।

📗 अहसनुल फ़तावा १/३९५

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नं २६२६⭕

बाल मुबारक के देखने का क्या हुक्म है ?

🔵 जवाब 🔵

हदीस शरीफ से साबित है के हुज़ुर ﷺ ने अपने बाल मुबारक सहाबा रदीअल्लाहु तआला अन्हुमा को तक़सीम फरमाए थे।

फतावा इब्ने तैमियाह मे है के हुज़ुर ﷺ ने अपने बाल मुबारक मुंडवा कर आधे सर के बाल अबु तल्हा रदी अल्लाहु तआला अन्हु को दिये और आधे लोगो के दरमियान तक़सीम फरमा दिये।

अगर किसी के पास हो तो ताज्जुब की बात नहीं।

अगर उस की सहीह और क़ाबिले एतिमाद सनद (पुरी चेईन हो के हम तक किस ज़रीये पहोंचा) हो तो उस की ताज़ीम-ज़्यारत करना बहोत बडी खुश नसीबी है।

अगर सनद ना हो और बनावटी होने का भी यक़ीन ना हो तो खामोश़ि इख्तियार कि जाये, ना उसकी तसदीक़ करे/सच्चा समजे, ना तकज़ीब/झुठलाये, ना ताज़ीम करे, ना तोहीन करे।

बाल मुबारक और दुसरे नबवी तबर्रुकात खैरो-बरकात को वाजिब करने वाले है, और उसकी ज़्यारत से अज्रो-सवाब मिलता है।

उसे देखने मे मर्दो और औरतो का मिलाप ना हो।

हज़रत आईशाह रद्दी अल्लाहु तआला अन्हा अपने ज़माने की औरतो के मुताल्लिक़ फरमाती है के रसुल्लाह ﷺ इस ज़माने की औरतो को देखते तो उन को मस्जीद मे जाने से मना फरमाते।

लिहाज़ा औरतो को जमा ना किया जाये।

(तबर्रुकाते मुबारक को हमारे गुनाहगार हाथ ना लगाये जाये। सिर्फ ज़ियारत पर बस किया जाये।)

✳ तबर्रुकात से बरकत हासिल करने का सहीह और जाइज़ तरीक़ा ये है के खास तारीख तय किये बगैर लोगो को जमा करने का एहतिमाम किये बगैर जब दिल चाहे ज़ियारत करे कराये।

सहाबा के ज़माने मे दस्तूर था के किसी नज़र वगैरह की तकलीफ़ हो जाती तो उम्मुल मोमीनीन हज़रत उम्मे सलमाह रदीअल्लाहु तआला अन्हा के पास पानी का प्याला भेज दिया जाता, आप के पास बाल मुबारक थे। उनको चांदी की नल्की मे महेफूज़ रखा था, पानी मे उस नल्की डाल देते थे और वो पानी मरीज़ को पिलाया जाता था।

📚 क़ुस्तलानि शरहे बुखारी जि.८/ सफा ३८२

हज़रत अस्मा रदीअल्लाहु अन्हा के पास हुज़ुर ﷺ का कुर्ता मुबारक था, फरमाती है के हम उसे पानी मे धोकर वो पानी अपने बिमारों को बगर्ज़े शिफा मरीज़ को पिला दिया करते है।

📚 सहीह मुस्लिम २/१९०

📗 फतावा रहीमियह जदीद बाब-उल-अंबिया जिल्द ३/ सफा ४० से ४२ का खुलासा उर्दु की आसानी के साथ

हम एहले सुन्नत वल जमात तबर्रुकात से बरकत हासिल होने को मानते है। लेकिन उसे सब कुछ ना समझे। नजात तो आमाल से होगी, बिला आमाल व इत्तिबा ए नबी ﷺ सिर्फ ज़ाहिरी मुहब्बत का ढोंग और मुहब्बत के दावे काफी नहीं।

गैर-मुक़ल्लिद नाम के एहले हदीस असल वहाबी तबर्रुकात से बरकत हासिल करने को नहीं मानते।

अल्लाह जल्ले-शानहु हमे सच्ची और कामिल मुहब्बतो ईस्क़े रसुल सल्लललाहू अलयही वसल्लम नसीब फरमाये।

आमीन।

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २६३३⭕

मेरे बहुत से दोस्त व अहबाब नॉन मुस्लिम है, मेरे यहाँ अगर किसी का इंतेक़ाल हो जाये या कोई मुसीबत पेश आ जाये तो वो हमारे यहाँ ता’ज़ियत के लिए आते हे।
तो क्या अगर नॉन मुस्लिमो में से किसी का इंतेक़ाल हो जाये तो उसको ताज़ियत-पुरशा देने का क्या हुक्मा हे ?
अगर पुरशा देना जाइज़ होतो उसका क्या तरीक़ा हे ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

नॉन मुस्लिमो की ख़ुशी और गमी में इंसानी, समाजी रिश्ते की वजह से शरीक़ होना दुरुस्त हे, बल्कि बेहतर हे, ताकि उन पर इस्लाम की फराख-कुशादा दिली और मुस्लमानो की खुश अख़लाक़ी का नक़्श-सिक्का क़याम हो सके।

इसलिए नॉन मुस्लिमो की ता’जियत भी की जा सकती है।

फरक ये हे के मुस्लमानो की ताज़ियत करते हुए वफ़ात पाने वाले के लिए दुआ ऐ मग्फिरत करनी चाहिये, नॉन मुस्लिम मरनेवाले के घरवालों के लिए मुहब्बत और तअल्लुक़ का इज़हार किया जाए, घार वालों को सबर धीरज नसीब हो ऐसे दुआ करे।

एहले ईल्म ने नॉन मुस्लिम की ता’जियत के लिए ये कलिमात लिख्खे हैं,

اعظم اللہ اجرك و احسن عزاءك

अ’जमल्लाहु अजरका व अहसनु ईज़ा’इक।

📗किताबुल फ़तावा १०/३४४
बा हवाला
📕 फ़तावा हिन्दीययह १/३६२

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज  का  सवाल  नंबर –  २६४८ ⭕

( अ ) मेरी  बीवी  लंबी  मुद्दत  से  बीमारी  में  मुब्तला  है  जिस  की  वजह  से  कमज़ोर  और  कमताक़त  है  कोई  काम  नहीं  हो  सकता. ६ / ७ साल  से  ये  हालात  है. इलाज  मुआलज के  बावजूद  कोई  फ़र्क़  नहीं  इस  हालात  में  हमल के  दिनों  में  तबीअत  खराब  रहती  है. कमज़ोरी  में  मज़ीद  इज़ाफ़ा  हो  जाता  है  ऐसी  हालात  में  ऑपरेशन  कराना जाइज़ है या  नहीं  डॉक्टर  हकीम  कहते  है  के  तुम  आपरेशन  नहीं  कराओगे  तो  तबीअत  ऐसी  ही  रहेगी  लिहाज़ा  क्या  किया  जाये ?

( ब )  मेरे  दोस्त  के  ३  बच्चे  सिजर  से  आये  है  उनको  भी  डॉक्टर  ने  बोला  है  ऑपरेशन  कराना  ज़रूरी  है  चौथा  बच्चा  अब  अगर  आप  की  बीवी  से  पैदा  होगा  तो  उस  की  जान  को  खतरा  है ।

حامدا و مصلیا و مسلما

🔵 जवाब 🔵

(अ –  ब )  जब  कमज़ोरी  और  तबियत  की  खराबी  की  वजह  से  या  सिजर  की  वजह  से  हमल  को  बाकी  रखना  मुश्किल  है  हमल  बर्दाश्त  नहीं  हो  सकता  तो  सब  से  पहले  ऐसा  इलाज  किया  जावे  जिस  से  हमल  न  ठहरे  और  दवाई  होती  रहे  फिर  अगर  ये  वक़्ती  तदबीर – आईडिया  मुफीद  साबित  न  हो  तो  अखीरी  दर्जे  में  मुस्लमान, दीनदार  माहिर  हकीम  या  मुसलमान  दीनदार  तजर्बहकार  डॉक्टर  के  कहने  के  मुताबिक़  ऑपरेशन  कराना  जाइज़  है । इस  बारे  में  गैर  मुस्लिम  हकीम  या  डॉक्टर  कई  सलाह -मशवेरा  के  ऐतिबार  नहीं  है ।

📗फतावा  रहीमियह  १० /१८१ करांची

📘फतावा कास्मियाह  २३ /२६६
 

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

आज़ का सवाल नंबर २६७३

इस्लाम में औरतों के हक़ कम और फैसला सिर्फ मर्द का चलता है क्या ये बात सहीह है ?

🔵जवाब🔵

इंसान के बुनियादी हुकुक जान, माल, इज्जत की हिफाजत और इंसानी जज्बात का ख्याल, इंसानी जरूरत इसमें मर्द, औरत दोनों को इस्लाम ने बराबर करार दिया है।

अलबत्ता मर्द को औरत पर सदर और अमीर और फैसल बनाया है ताकि दोनों के इख्तिलाफ में फैसला हो सके, और बाझ चीजों में मर्द को औरतों के मुकाबले में खुसुसीय्यत दी है, क्योंकि मर्द और औरत दोनों में फितरत, जिस्म और आदत के एअतेबार से फर्क है, इसलिए बाझ इख्तियार मर्द को दिए है, औरत को नहीं,

जैसे नमाज का इमाम, काझी, हाकीम बनना, अजान देना, तलाक देना, तलाक से रुजू करना वगैरा।

औरतों की आवाज पर्दे की चीज है, और अक्सर औरतों में कुव्वते फैसला, कुव्वते बर्दाश्त, सब्र मर्दों के मुकाबले में कम होती है, इसलिए बकीया इख्तियार औरतों को नहीं दिए, वरना मुआशरेमें बहुत नुकसान और खराबीया पैदा होती।

📗सूरह बकरह
🔰आयत :२२८
तफसीर मआरीफुल कुर्आन व आसान तफसीर से माखुझ।

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

आज का सवाल नंबर २६७४

कया कुरान में चेहरे के परदे- नक़ाब का हुक्म सराहतन-साफ़ साफ़ है ?
बाज़ लोग कहते है चेहरे का पर्दा कुरान से साबित नहीं।
ये बात सहीह है ?

🔵जवाब🔵

हां, साफ हुक्म साबित है जैसे के

पहली दलील
📕क़ुरान का पाराह २२ सुरह अहज़ाब में आयत नंबर ५९ में अल्लाह तआला फ़रमाते है

یایہا النبی قل لازاجک و بناتک و نساء المومنین یدنین علیہن من جلابیبہن

अय नबी ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! आप अपनी पाक बीबियों और अपनी बेटियोँ और मूअमिन औरतों को फ़रमा दिजिये के अपने चेहरे पर अपनी चादर का कुछ हिस्सा लटकाये रखे।

उस ज़माने में नक़ाब नहीं बने थे लिहाज़ा चेहरे को छुपाने के लिए चादर का कोना लटका लिया जाता, जिस में से एक आँख भी रास्ता वगैरह देखने के लिए खुली रखी जाती थी।

दूसरी दलील
📘पाराह १८ सुरह नूर में आयात नंबर ३१ में है

و لا یبدین زینتہن

ओर अपनी ज़ीनत ज़ाहिर न करे

(ज़ीनत की चीज़ें होंठ, गाल, आंख, नाक ये सब चेहरे में ही आता है। औरत में ज़ीनत का असल मरकज़ चेहरा है, लिहाज़ा उसे तो दूसरे आज़ा के मुकाबले में खास तौर पर खुला न रखना चाहिए बल्कि ढंकना चाहिए)

तीसरी दलील
📗पाराह २२, सूरह अहज़ाब आयत ५४ में सहाबा रदी अल्लाहु अन्हुम जैसी निगाह को पाक रखने वाली जमात को हुक्म है

اِذَا سَاَلْتُمُوْہُنَّ مَتَاعًا فَسْئَلُوْہُنَّ مِنْ وَّرَآءِ حِجَابٍ ؕ ذٰلِکُمْ اَطْہَرُ لِقُلُوْبِکُمْ وَ قُلُوْبِہِنَّ ؕ

जब पैगम्बर की बीवियों (जो हमारी रूहानी माएं है) से कोई चीज़ माँगो तो परदे के पीछे से मांगो।

पाक बीबियों के बारे में बुरा वस्वसा भी नहीं आ सकता था, फिर भी परदे के पीछे से बात करने का हुक्म है, तो दूसरी आम औरतों का चेहरा देखने की और मरदों को चेहरा दिखाने की आम इजाज़त कैसे हो सकती है।

लिहाज़ा चेहरे के परदे को शरीअत का हुक्म न मानने वाले लोग गुमराह है।

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल न. २७१०⭕

न्यू ईयर मनाना या मनाने वालों को उन की लाइटिंग और आतिशबाज़ी को देखने जाना केसा है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

न्यू ईयर मनाना ये ईसाईयों-नसारा का तरीका है.
हुज़ूर सलल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है :
जिसने जिस क़ौम की मुशाबेहत-कॉपी-नक़ल उतारी कल क़यामत में उस को उन ही के साथ उठाया जायेगा

यानि उस का शुमार भी उन ही में होगा.

क़ाज़ी सनाउल्लाह पानीपती रहमतुल्लाहि अलैहि ने मसला लिखा है के
कोई शख्स दिवाली में बाहर निकले और दिवाली की (रौशनी-आतिशबाज़ी वगैरह) को देखकर कहे के कितना अच्छा तरीका है तो उस के तमाम नेक अमाल बर्बाद हो जायेंगे.

📗माला बुड्ढामिनहु

इसी तरह न्यू ईयर मनाने वालों को देखने जाना भी जाइज़ नहीं, क्यों के हुज़ूर सलल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशादे मुबारक है के
जिस ने जिस क़ौम की तादाद को बढ़ाया उस का शुमार भी उन ही में होगा

लिहाज़ा इस रात में बहार रौशनी आतिशबाज़ी देखने जाना, खाने पिने की पार्टी करना, नए साल की मुबारकबादी देना, साल की ख़ुशी मनाना, दूसरे को गिफ्ट देना, वगैरह जितने तरीके उन के तरीके है सब नाजाइज़ और ईमान को बर्बाद करनेवाले है.

इबरत के लिए एक क़िस्सा पेश करता हूँ👇👇👇

📄नसरानीओ के तौर-तरीके पसंद करने वाले आलिम का इबरतनाक क़िस्साह📄

हज़रात इमाम-इ-रब्बानी मौलाना रशीद अहमद गंगोही रह. ने इरशाद फ़रमाया :
कानपूर में कोई नसरानी जो किसी आ’ला ओहदे पर था वह मुसलमान हो गया था, मगर असलिय्यत छुपा राखी थी, उसका तबादला (ट्रांसफर) किसी दूसरी जगह हो गया, उसने उन मौलवी साहब को जिससे उसने इस्लाम की बातें सीखी थी अपने तबादला से मुत्तले’ किया (इत्तेला दी) और तमन्ना की के किसी दीनदार शख्स को मुझे दें, जिससे इल्म हासिल करता रहूं, चुनांचे मौलवी साहब ने अपने एक शागिर्द को उनके साथ कर दिया, अरसे बाद ये नसरानी (जो मुस्लमान हो चूका था) वो बीमार हुवा तो मौलवी साहब के शागिर्द को कुछ रुपये दिए और कहा के जब में मर जाऊं और ईसाई जब मुझे अपने क़ब्रस्तान में दफ़न कर आये तो रात को जा कर मुझे वहां से निकलना और मुसलमानो के क़ब्रस्तान में दफ़न कर देना, वैसा ही हुवा, जब मौलवी साहब के शागिर्द ने हस्बे वसिय्यत जब क़ब्र खोली तो देखा के उसमे वो नसरानी नहीं अलबत्ता वो मौलवी साहब पड़े हुवे है, तो सख्त परेशां (शर्मिंदा) हुवा के ये क्या माज़रा है..!

मेरे उस्ताद यहां कैसे..!

आखिर दरयाफ्त से मालूम हुआ के मौलाना साहब नसरानी के टोरो तरीक़ो को पसंद करते थे और उसे अच्छा जानते थे.

📘(इर्शादते हज़रात गंगोही रह. सफा ६५)👇🏻👇🏻👇🏻
मेरे भाइयो ये मौलवी साहब सिर्फ गैरों के तरीकों को पसंद करते थे उस पर चलते नहीं थे, तो अल्लाह ने दुनिया ही में जिसका तरीक़ा उनको पसंद था उसके साथ हश्र कर दिया, तो गैरों के तरीकों पर शौक़ से चलते है बल्कि उस पर नाज़ करते है तो हमारा क्या हश्र होगा..!

सोचो ! और अपनी अवलाद भाई बहन दोस्त अहबाब को समझाइये, या कम से कम ये मेसेज भेजकर या पढ़कर सुनकर उन को इन गैरों की ख़ुशी में शिरकत से रोकें

👏🏻अल्लाह हमें तौफ़ीक़ दे, आमीन।

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २७१२⭕

क्या हैप्पी न्यू ईयर, साल मुबारक कहना ना-जाइज़ और बिदअत है ?
क्या इसमें गैरों से मुशाबेहत नहीं ?

🔵आज का जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

हैप्पी न्यू ईयर कहने में नसारा-खिस्री-क्रिस्चियन क़ौम से मुशाबेहत है
लिहाज़ा ना-जाइज़ है.

📗किताबुल फतावा ६/१२५ से माखूज़.

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.