aaj ka sawal hindi

११ गियारहवी की नियाज़ खाने की हक़ीक़त क्या है ?

क्या मालदार आदमी गियारहवी का खाना खा सकता है ?

और गरीबो का उस दावत में शिरकत का क्या हुक्म है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

किसी भी इस्लामी महीने की गियारहवी (११) तारीख को महबूबे सुब्हानी पीराने पीर हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रह. की निय्यत से जो खाना पकाया जाता है उसे गियारहवी कहते हैं.

इख्तिलाफ ए उम्मत और सिरते मुस्तक़ीम
हज़रत मुफ़्ती युसूफ लुधयानी शहीद रह. की किताब

अगर वह खाना हज़रत शैख़ रह. के नाम की मन्नत का हो, या उनका तकररुब हासिल करना हो, यानी नियाज़ करेंगे तो हज़रत खुश हो कर हमारी मुराद पूरी करेंगे तो वह हराम है, आम तौर पर यही निय्यत होती है, और उनके नाम की मन्नत मानना शिर्क है, मन्नत सिर्फ अल्लाह के नाम की ही मानना जाइज़ है.

किसी ऊँचे से ऊँचे बुलंद रुतबा मख्लूक़ के नाम की मन्नत मानना हराम और शिर्क है, और ऐसी हराम मन्नत का खाना खाना मालदार और गरीब किसी के लिए भी जाइज़ नहीं.

(शामी: २/१२८ २/२९८)

अगर हज़रत शैख़ जीलानी रह. के इसाले सवाब की गरज़ से अल्लाह ता’अला के नाम की मन्नत मानी हो, या मन्नत माने बगैर हज़रत शैख़ के इसाले सवाब के खातिर पका कर खिलाये तो ऐसा खाना गरीब लोग खा सकते हैं, मालदार नहीं खा सकता, क्यों के मन्नत का खाना मालदार के लिए जाइज़ नहीं, और गरीबों को खिला कर सदक़ह का इसाले सवाब कर सकते हैं, अलबत्ता इसाले सवाब के खाने के लिए कोई तारीख और दिन ज़रूरी समझना यह बिदअत और नाजाइज़ है.

शामी: १ फतावा महमूदियाः: १० /९८
जुब्दतुल फतावा गुजराती: १/२०६

و الله اعلم بالصواب

फतावा सेक्शन
मुफ़्ती सिराज चिखली नवसारी गुजरात

तस्दीक़ व इज़ाफ़ा
मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

बहुत से इलाके में शबे बरात में क़ब्रस्तान एहतेमाम के साथ हर साल जाते है, और एक दूसरे को इस की तरग़ीब देते है, बल्के दोस्त अहबाब को जमा कर के इज्तिमाई शकल में भी जाते है।
तो इस का क्या हुक्म है?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

हज़ूर सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम अपनी पूरी ज़िन्दगी में शबे बरात में सिर्फ एक मर्तबा जन्नतुल बक़ीअ क़ब्रिस्तान गए है, वह भी आहिस्ता से उठ कर और छुप कर, के किसी को पता न चले।

किसी तरह हज़रत आइशा रदिअल्लाहु अन्हा की आँख खुल गई और वह हुज़ूर के पीछे गई, और उन को पता चल गया।

फिकह का उसूल है के जो चीज़ जिस दर्जे में साबित हो उस को उसी दर्जे में रखा जाये, उस को उस से आगे न बढाया जाये।

लिहाज़ा क़ब्रस्तान जाना मुस्तहब अमल ठहरा, उस को सुन्नत के दर्जे तक न पोहंचाया जाये, इसे आज कल लोगों ने शबे बरात के आमाल में दाखील कर लिया है, इतना एहतेमाम करते है के गोया क़ब्रस्तान जाये बगैर शबे बरात की इबादत मुकम्मल होगी ही नहीं ! अगरचे उस के एक दो दिन पहले कब्रस्तान जाकर आये हो लेकिन इस दिन ज़रूर जायेंगे।

एसा एहतमाम दुरुस्त नहीं, अलबत्ता ज़रूरी और इस रात की सुन्नत समझे बगैर इनफिरादी तौर पर बगैर ऐलान के जाना चाहे तो जा सकते है।

माहनामा अल बलाग
इल्मी ख़ुत्बात से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
१५शा’बानअलमुअज़्ज़म१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

कीसी का इन्तिक़ाल हो जाये तो घरवालों को कितने दिन सोग मनाना जाइज़ है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

मरहूम की बेवा के अलावा दूसरे घरवालों और रिशतेदारों को ३ दिन से ज़यादा सोग मनाना जाइज़ नहीं।

(लिहाज़ा आजकल जो लोग ३ दिन बाद भी तय शुदा निकाह नहीं करते या निकाह, ईद वगैरह ख़ुशी के जाइज़ मोके पर नहीं जाते ये सहीह नहीं।)

(जदीद मुआमलात के शरई अहकाम ३/२५३)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१८ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

११/गियारहवी की नियाज़ खाने की हक़ीक़त क्या है ?

क्या मालदार आदमी गियारहवी का खाना खा सकता है ?

और गरीबो का उस दावत में शिरकत का क्या हुक्म है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

किसी भी इस्लामी महीने की गियारहवी (११) तारीख को महबूबे सुब्हानी पीराने पीर हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रह. की निय्यत से जो खाना पकाया जाता है उसे गियारहवी कहते हैं.

इख्तिलाफ ए उम्मत और सिरते मुस्तक़ीम

हज़रत मुफ़्ती युसूफ लुधयानी शहीद रह. की किताब

गर वह खाना हज़रत शैख़ रह. के नाम की मन्नत का हो तो वह हराम है, और उनके नाम की मन्नत मानना शिर्क है, मन्नत सिर्फ अल्लाह के नाम की ही मानना जाइज़ है.

किसी ऊँचे से ऊँचे बुलंद रुतबा मख्लूक़ के नाम की मन्नत मानना हराम और शिर्क है, और ऐसी हराम मन्नत का खाना खाना मालदार और गरीब किसी के लिए भी जाइज़ नहीं.

(शामी: २/१२८ २/२९८)

अगर हज़रत शैख़ जीलानी रह. के इसाले सवाब की गरज़ से अल्लाह ता’अला के नाम की मन्नत मानी हो, या मन्नत माने बगैर हज़रत शैख़ के इसाले सवाब के खातिर पका कर खिलाये तो ऐसा खाना गरीब लोग खा सकते हैं, मालदार नहीं खा सकता, क्यों के मन्नत का खाना मालदार के लिए जाइज़ नहीं, और गरीबों को खिला कर सदक़ह का इसाले सवाब कर सकते हैं, इसाले सवाब के खाने के लिए कोई तारीख और दिन ज़रूरी समझना यह बिदअत और नाजाइज़ है.

(शामी: १ फतावा महमूदियाः: १० /९८)

(जुब्दतुल फतावा गुजराती: १/२०६)

(फतावा सेक्शन)

मुफ़्ती सिराज चिखली नवसारी गुजरात

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१५ रबी उल आखर १४४० हिजरी

तस्दीक़

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

(उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.)

 

मुहर्रम के दिनों में जो लोग शरबत की सबील (परब) लगाते हैं वह जाइज़ है या नहीं ? इस में चंदा देना जाइज़ है या हराम ?

जवाब:  حامدا و مصلیا و مسلما

मुहर्रम का शरबत १४८६ | शरबत या पानी ही पिलाने की पाबन्दी गलत और गैर साबित है. अगर सर्दी का मौसम हो तब भी शरबत ही पिलाया जाए! (ऐसा मुहल्लाह (स्ट्रीट) हो जिस में हर घर में ठंडा और मटके का पानी मव्जूद है तो जहां पानी की ज़रूरत नहीं वहाँ भी पानी के मटके ही की सबील लगाने का क्या मक़सद है?)

एक गलत अक़ीदह को भी इस में दखल है वह यह है के हज़रत हुसैन रदिअल्लाहु अन्हु के मुताल्लिक मशहूर है के पियासे शहीद किये गए और यह शरबत और पानी उन के पास पहुंच कर उन की पियास बुझायेगा.

इस अक़ीदह की इस्लाह ज़रूरी है. यह शरबत वहाँ नहीं पहुंचता, न उन को इस शरबत की ज़रूरत है. अल्लाह पाक ने उनके लिए जन्नत में आला से आला (बेहतरीन) ने’मते कर राखी हैं जिन के मुक़ाबलाः में यहाँ का शरबत कोई हैसियत नहीं रखता.

फतावा महमूदियाः दाभेल २०/२७८
و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २५६८⭕

1️⃣
कया फ़रमाते हैं उलेमा ए किराम इस बारे में के मुहर्रम में खिचड़ा ही पकाया जाए ?
खीचड़े के सबूत के तौर पर बयान किया जाता है के नूह علیہ السلام की कश्ती आशूरह के दिन जुडी पहाड पर ठहरि तो उन्होंने बतौरे शुकराना खिचड़ा पकाया था इसलिए हम भी पकाते है।
इस रिवायात का क्या हुक्म है?
बरेलवी रज़ाखानी और देवबंद के माने हुवे हवाले से जवाब देने की गुज़ारीश।

2️⃣
आशूरह के दिन खिचड़ा पकाने वालों को चंदा देना और चंदा वसूल करना केसा है ?

3️⃣
खिचड़ा हम ना पकाये, और कहीं से आ जाये तो ले सकते या नहीं ?

🔵जवाब🔵

حامد و مصلیا و مسلما

1️⃣
हज़रत नूह علیہ السلام की कश्ती ने तूफान से नजात पायी और जुडी पहाड़ पर ठहरी, नूह علیہ السلام ने बतौरे शुकराना कश्ती में मौजुद ७ क़िस्म के गल्लो (अनाज) का हबूब (खिचड़ा) बनाया।
इस रिवायात को भी देवबंदी व बरेलवी उलमा के सरताज हज़रत मौलाना शाह अब्दुल हक़ महदीसे देहल्वी रहमतुल्लाहि अलय्हि ने मौज़ूअ (बनावटी) क़रार दिया है।
📚मा सबत बिस सुन्नह १६/६

मौज़ूअ (बनावटी) हदीस की मिसाल देते हुवे फ़रमाते हैं के
क फीस सलाति वल इख्तिहालि, व तबख्खील हुबूबी व ज़ालिक कुल्लहू मवज़ूउन व मुफ़्तरा
जैसे नमाज़ की फ़ज़ीलत, सुरमा डालने की और खिचड़ा पकाने की और इसके अलावा तमाम फ़ज़ीलत मौज़ूआ और ईफ्टरा (बोहतान) है,
📚बरेलवी और उलेमा ए देवबंद की मानी हुयी किताब मा सबत बिस सुन्नह
सफ़ा १७

लिहाज़ा खिचड़ा ही पकाना ज़रूरी नही।
अहलो अयाल को पसंद हो वह ही पकाना चाहिए। उस दिन अहलो अयाल पर वुस’अट (कुछ ज़ियादह) खर्च करने की फ़ज़ीलत मुफ्त में तक़सीम होने वाले खीचड़े की वजह से ब’अजों की छुत जाती है।

2️⃣
इस को सवाब समझ कर बनाना बिदअत और ना जाइज़ है। इस में जानी या माली हिस्सा लेना भी दुरुस्त नही,
मशहुर किताब ‘अल बिदयाह वननिहायह’ तारिख इतिहास की पाये की अहम् पुरानी किताब है, जिसे बरेलवी उलमा भी मानते है, उस में साफ़ लिखा है के खिचड़ा पकाना, उस दिन ख़ुशी मनाना खार्जियों (अहले बैत-खानदाने नबी सलल्लाहु अलैहिवसल्लम के दुश्मनो) का शिआर -खास तरीका है।

📕 अल बिदयाह वननिहायह ८/२०३

3️⃣
अगर घर पर कोई खिचड़ा भेजे तो उसे लेना भी न चाहिये, ता के बिदअत और रस्म पर तम्बीह हो सके, और पकाने वालों की इस्लाह हो।

📗किफ़ायतुल मुफ्ती १/२२६

📕बहिश्ती ज़ेवर ६/६१

📘दीनी मसाइल और उन का हल सफा ८५,८६ से माखूज।
हज़रत मुफ्ती सल्मान मन्सूर पूरी दा. ब.की किताब।

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नंबर २५६७⭕

वो कोनसे आ’माल है जो आशूरह के दिन याने १० मुहर्रम को सुन्नत से साबित नहीं है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

❌ १) ग़ुस्ल करना यानि खास आशूरह के दिन की निय्यत से

❌ २) कपडे बदलना

❌ ३) खुशबू लगाना

❌ ४) सुरमा लगाना

❌ ५) मख़सूस नमाज़ अदा करना

❌ ६) मरसिया ख्वानी करना

❌ ७) मस्जिद में जमा हो कर नवाफिल पढ़ना

❌ ८) मातम करना

❌ ९) क़ब्रो पर मिटटी डालना

❌ १०) ता’जिया बनाना

❌ ११) नंगे सर रहना

❌ १२) नंगे पैर रहना

❌ १३) काला कपडा पहनना

❌ १४) सर पर खाक डालना

❌ १५) सर को पीटना

❌ १६) बच्चों को क़ैदी फ़क़ीर बनाना

❌ १७) शरबत बनाना

❌ १८) शरबत पिलाना

❌ १९) मख़सूस क़िस्म का खाना बनाना

❌ २०) सिर्फ मुहर्रम ही में सबील लगाना

🔰मा सबत बीस सुन्नह में बरेलवी और देवबंदी उलामा के मुअतामद शाह अब्दुल हक मूहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह ने इन चीज़ों के फजाईल की तमाम रिवायत को मावजुआ (बनावटी) करार दिया है।

📚फतावा महमूदियह ३/२७४ और उसके आस पास
و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल २६२०⭕

रस्मी मीलाद का सिलसिला कब और कहाँ से शुरू हुवा ?

🔵जवाब🔵
حامدا و مصلیا مسلما

महफिले मीलाद छठी (६) सदी गुजरने के बाद सुलतान अरबल के ज़माने से शरू हुवा है, जैसा के तारीख इब्ने खलकान में है, और उसी वक़्त से उलेमा उस की तरदीद (मुखालिफत) करते आ रहे है।
📗फतावा महमूदियाः ३/८७
📘किताबंनवाज़िल १/५५१

बरेलवी हज़रत के हकीम उल उम्मत मुफ़्ती अहमद यार खान नईमी फ़रमाते है के:
“इमाम सखावी रह. ने फरमाया के मिलाद शरीफ तीनो ज़मानो में किसी ने नहीं किया, बाद में इज़ाद हुवा।”
📙जा अल हक़ : सफा २३६

बरेलवी मौलवी फैज़ अहमद ओवैसी लिखते है के:
‘वाक़ई सलफ-ओ-सालेहीन ने यह अमल नहीं किया।’
📗ग़ौसुल इबाद : सफा ५०

बरेलवी अल्लामा ग़ुलाम रसूल सईदी फ़रमाते है के:
‘महफ़िल ए मिलाद की हैय्यत ए इस्तेमाई हर चंद के बिद्दअत है।’
📕शरह मुस्लिम : जिल्द ३ : सफा १८५

हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पीर के दिन रोज़ा रखते थे और फ़रमाते थे के मेरी विलादत पीर के रोज़ हुई, इसलिये में रोज़ा रखता हुं। (मिश्कात)

सुन्नत तरीक़े पर विलादत मनाना हो तो रोज़ा रखो।
अब जिस दिन विलादत हुई उस दिन ईद मनाना कैसे जाइज़ होगा ? ईद के दिन रोज़ा रखना हराम है, प्यारे आक़ा ने उस दिन रोज़ा रख कर ईद का तसव्वुर की जड़ ही काट दी। उस दिन मनाने का तसव्वुर और हालात उस वक़्त भी मव्जूद थे, ईसाई-नसारा इसा अलैहिससलाम की पैदाइश मनाते थे, फिर भी न हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उस दिन को ईद मनायी, ना सहाबा ए किराम रदि अल्लाहु अन्हुम ने, जीनकी इत्तिबा का हम को हुक्म है, और हम अपने को अहले सुन्नत वल जमात यानि सहाबा की जमात की पेरवी करने वाला कहते है, न ताबीइन ने, न तब’य ताबिन ने, ना चारों इमाम ने, ना चारों सिलसिले के किसी बुजृगों ने।

लिहाज़ा ये ईद मनाना ग़ैरों का तरीका और बिदअत ठहरा, गैर भी राम जयंति, किशन जयंती वगैरह मनाते है, उस दिन केक काटना, बर्थडे मनाना बिला शुबह यहूदी और ईसाइयों का तरीका है, जिस पर सख्त वईद है, लिहाज़ा इस से बचना चाहिए।

و الله اعلم بالصواب