मंगेतर से बात करना, मेसेज करना वग़ैरह का हुक्म, और उस का इलाज

मंगेतर से बात करना,

मेसेज करना वग़ैरह का हुक्म,

और उस का इलाज

आज का सवाल नंबर १५७५

होने वाली मंगेतर को शादी बियाह के मौक़े पर बार बार देखना, उसे बात-चीत या मेसेज करना, अगर उस की इस्लाह की निय्यत से हो तो जाइज़ है या नहीं ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

निस्बत और मंगनी हो चुकने के बाद भी जब तक निकाह नहीं हुवा हो वह लड़की अपने मंगेतर लड़के के हक़ में अजनबिय्यह है,

और अजनबी औरत का जो हुकम है वोही उस मँगेतर लड़की पर जारी होगा, खत-ओ-किताबत.

(मेसेज, चैटिंग) चाहे इस्लाह व नसीहत पर मुश्तमिल हो फितना और ईस्तल्ज़ाज़ (लज़्ज़त हासिल करना) से खाली नहीं है,

और फुक़हा ने मर्द के हक़ में औरत (अजनबिय्यह) के झुटे (बचे हुवे) और औरत के हक़ में मर्द के झुटे को मकरूह लिखा है।

दुर्रे मुख्तार

मंगेतर और मखतूबा को पेहली बार देखने की शरीअत ने जो इजाज़त दी है, वह भी ज़रूरत की वजह से ख़िलाफ़े क़ियास है,

जो अपनी हद तक महदूद है, इसिलिये अगर एक मर्तबा देख चूका है तो दूसरी मर्तबा हराम है।

अगर तअल्लुक़ न रखने से किसी क़िस्म का अन्देशा हो तब भी मना, ना-जाइज़ काम का करना जाइज़ क़रार नहीं दिया जा सकता,

उसका आसान इलाज यह है के अक़्दे निकाह कर लिया जाए, चाहे रुखसती न हो, इस सुरत में इख़्तियार भी लड़के के हाथ में रहेगा,

और खत-ओ-किताबत, मेसेज, चेट्टिंग, कालिंग वगेरा भी जाइज़, बल्के मुस्तहसन (बहुत अच्छा) हो जाएगा।

महमूदुल फ़तवा: ४ /७५४, ७५५)

मुफ़्ती सिराज सीदात साहब दा ब्

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०५ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

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