aaj ka sawal hindi

कीसी का इन्तिक़ाल हो जाये तो घरवालों को कितने दिन सोग मनाना जाइज़ है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

मरहूम की बेवा के अलावा दूसरे घरवालों और रिशतेदारों को ३ दिन से ज़यादा सोग मनाना जाइज़ नहीं।

(लिहाज़ा आजकल जो लोग ३ दिन बाद भी तय शुदा निकाह नहीं करते या निकाह, ईद वगैरह ख़ुशी के जाइज़ मोके पर नहीं जाते ये सहीह नहीं।)

(जदीद मुआमलात के शरई अहकाम ३/२५३)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१८ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

 

‘औरत का मर्द की इजाज़त‘ के साथ ही जाना कैसा है ? इजाज़त ज़रूरी है?

और मर्द को औरत को इजाज़त देना कब जाइज़ है ?

जवाब:  حامدا و مصلیا و مسلما

“औरत का मर्द की इजाज़त” और शरई परदे के साथ जाना फर्ज़े ऍन और ज़रूरी है.

ये इजाज़त चाहे सराहतन -साफ़ साफ हो या दलालतन यानि औरत को ये यक़ीन या ग़ालिब गुमान हो के ये ज़रूरी काम है, इसलिए मेरे मर्द को पुछे बगैर निकलने का पता चलेगा तो मर्द नाराज़ न होगा या में इस काम के लिए अगर इजाज़त मागूँगी तो मनानहीं करेगा, तो ये इजाज़त समझि जाएगी।

मर्द गैर शरई और गैर ज़रूरी काम के लिए औरत को घर से बाहर निकलने इजाज़त देगा तो गुनेहगार होगा।

उम्दतुल फ़िक़ह १/१०६

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़: २१ सफर उल मुज़फ्फर १४४० हिजरी

“औरत का मर्द की इजाज़त“: मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर २५९१⭕

ओरत टीचिंग कर सकती है?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

पढ़ने वाली औरतें, या छोटे बच्चे हो तो तालीम दे सकती है।

अगर बड़े लड़के हो तो परदे के शराइत का लिहाज़ करते हुवे फ़ितने का अंदेशा न हो तो गुंजाईश है।

बाशर्त के तालीम जाइज़ उमूर-कामों की होनी चाहिये।

📕महमूदुल फ़तावा ८/२८

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नंबर -२५९०⭕

बीवी के लिए चाचा ख़ुसर (ससुर के भाई) से और शोहर के मामु (सास के भाई) से परदह है?

बा’ज़ लोग कहते हैं के तक़वे की रो से है फ़तवे के रो से नहि।
सहीह क्या है?


🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

चाचा ख़ुसर और शोहर का मामु महरम में से नहि, लिहाज़ा और कोई हुरमत (महरम होने) का रिश्ता न हो तो उस से परदह है।

📕महमूदुल फ़तवा ६/२८

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नंबर २५९९⭕

मेरी बीवी के दांतों पर काले दाग हो गए है, जो दिखने में ख़राब लगते है।
तो क्या उस की सफाई, फ़िर उस पर खोल चढाना गैर महरम मर्द डॉक्टर के पास करवा सकते है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

ये इलाज ज़ीनत (सजावट, श्रृंगार) के वास्ते है, जो गैर महरम के पास कराना जाइज़ नहीं।

📚महमूदुल फ़तावा ८/२७

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नंबर २६०६⭕

एक आदमी अपनी हयाती ही में अपना माल और जायदाद तक़सीम करना चाहता है,
ये मरने से पहले हदया होने की वजह से लड़का लड़की को बराबर बराबर देना चाहता है, और बीवी को कुछ भी देने का इरादह नहीं तो क्या हुक्म है ?


🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

बख्शीश और हदया में लड़का लड़की को बराबर देना तो सहीह है।
लकिन बीवी को महरूम करना मक़सद हो तो गुनेहगार है।

📗महमूदुल फ़तावा ८ /३५६

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नंबर – २६१३⭕

मदँ और औरत जब पाक है तो उनकी शमँगाह का जाहिरी हीस्सा पाक है या नापाक?                                 
अगर हमबिस्तरी के दौरान मदँ औरत को अपनी शमँगाह मुँह मे देवे, या चाटे ,या चटवाये उसकी शमँगाह चुमे तो जाईज है या नहीं?
ऐसे मसाइल पूछने में शमँ महसूस होती है लेकिन जरुरतन दरीयाफत किया है   माफ   फरमाईयें  ।         

  🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما
     
हजरत सैयद मुफती अबदुरँरहिम लाजपुरी रहमतुललाहअलैयही तहरीर फरमाते है की,  दिन  के मसाईल और अहकाम दरियाफत करने मे शमँ व हया को आड़ न बनाना चाहिए. अगर शमँ व हया का लिहाज कर के दिनी अहकाम की मालूमात ना की जाऐ तो शरई अहकाम का ईलम कैसे होगा?   
कुरआन मे है, “अल्लाह तआला हक बात कहने मे किसी का लिहाज नहीं करते”
बेशक़  शमँगाह का जाहीरी हिस्सा पाक है लेकिन ये जरुरी नहीं की हर पाक चीज़ को मुँह लगाया जाये, और मुँह मे लिया जावे, उसको चुमा जाए ओर चाटा जाए ….
नाक की रुतुबात , नीक,सेंड पाक है तो क्या नाक के अंदरुनी हिस्से को जबान लगाना ओर उसके रुतुबात को मुंह मे लैना पसंदीदा आदत हो सकती है? ओर उसकी ईजाजत हो सकती है?
पाखाना की जगह का जाहिरी हिस्सा भी नापाक नहीं. पाक है तो क्या उसको भी चुमने चाटना की ईजाजत  होगी? !!!!!
नहीं  हरगिज़ नहीं…… 
ईसी तरह मदँ की अपनी शमँगाह औरत के मुँह मे देना जाईज नहीं. शख्त मकरुह व गुनाह है………     
जिस मुंह से वह अल्लाह का नाम लेती है ‘क़ुरआन पढ़ती है, हुजुर सल्ललाहु अलयही व सल्लम पर दुरुद शरीफ पढ़ती हे ऊस मुंह मे नापाकी देने को कैसे गवारा किया जा सकता है?  असतगफिरुललाह………..             
शायर कहता हैं.
(फारसी शेर का तजुँमा)                                           
हजार बार घौऐ अपने मुंह को मुश्क व गुलाब से़.                                
फीरभी तेरा नाम लैना बहुत ही बेअदबी है.                                    

ये गैर कौमौ का कलचर है । ओर प्रिंट ओर ईलेकटोनीक मीडिया की गलत इस्तेमाल की नहूसत है. जो इस्लामी मिजाज़ के बिलकुल खिलाफ़ है. शमँगाह चुमना कुतौं / बकरो वगैरह हैवानीयत की खसलत के मुसाबह कॉपी है. ओर  मुंह मे देना तो अैसी बुरी चीज़ है की नर जानवर भी अपनी माँदाओ के साथ ऐसा नहीं करते….                    
ये तो उस सुरत मे जब मदँ की शमँगाह की सख्ती पैदा ना हुई हो … ओर सख्ती पैदा हो गई हो फिर बीवी की मुँह मे शमँगाह दी जाये तो मज़ी ( मनी से पहले निकलने वाला पानी) का निकलना यकीनी है. और मज़ी गलीज़ नजासत ओर सखत नापाक है. 
नापाकी को मुँह मे देना और लेना हराम हे.  ओर आज कल की गैरौं की तहज़ीब की नक़ल कर के मुखमैथुन करना यानी मुंह मे मनी खारिज करना सख्त हराम ओर ईऩ्तेहाई घीनौवनी हरकत है ।

📗 फतावा रहीमीयह जीलद 10/178 ब हवाला  आलमारी हजफौ ईजाफे के साथ.
                                          
📕जामिया बिनौरीया आजमाया.  कराची.  सीरियल नं.  9868.              
 अल्लाह तआला पूरी उम्मतकी  गैरौंकी तहज़ीब और मीडिया के गलत इस्तेमाल से पुरी हिफाज़त फरमाए …… आमीन..

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का  सवाल  नंबर ~२६१४ ⭕

बीवी  का  पिस्तान  मुंह  में  ले  सकते  है ?
अगर  कोई  बीवी  का  दूध  पी ले   तो  क्या  बीवी  हराम  हो  जायेगी ?

🔵जवाब🔵

हाँ  बीवी  का  पिस्तान मुंह  में  ले  सकते  है,

और  दूध  अगर  मुंह  में  आ  जाये  तो  उसे  फ़ौरन  थूक  दे, अगर  कोई  पी  गया  तो  बीवी हराम  तो  नहीं होगी और  ना  निकाह  पर  कोई  असर  पड़ा, लेकिन  उसने  ये  गन्दा  और  गुनाह  का  काम  किया,

👉आइन्दाह ऐसी  हरकत  ना करने  का  अहद  करे, और  इस  से  तौबा   करे.

📗फतावा कास्मिया  २२ /५१

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नंबर २६१६⭕

हालाते हैज़ में या वेसे ही बीवी से आगे के बजाये पीछे के रास्ते से सुहबत की,
तो कया इस से निकाह टूट जाता है?
अगर ऐसा कर लिया तो इस की तलाफ़ी की क्या सुरत है?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

इस गैर इंसानी हरकत से निकाह नहीं टूटेगा, अगरचे ये इन्तिहाई बुरा और सख्त तरीन कबीरा गुनाह है

इस से सचचे दिल से तौबा और इस्तिगफार करना ज़रूरी है, और तौबा की निय्यत से कुछ सदक़ह भी कर दे।

📗किताबुननवाज़िल ८/५५५

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २६२९⭕

शोहर शादी के बाद अपनी बीवी को उसके वालिदेन से मुलाक़ात करने से रोक सकता है ?
कया उसका रोकना दुरुस्त है?
ओर बीवी पर उसकी ईता’अत करना वाजिब है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

निकाह की वजह से पहले रिश्ते ख़त्म नहीं हो जाते बल्कि पहले के रिश्ते उसी अहमियत के साथ बाक़ी रहते है।

इजदीवाजी रिश्ता तो ऐसा है के टूट सकता है, और तोडा जा सकता है, लेकिन वालिदेन और औलाद का रिश्ता अटूट है, इसलिये यह कैसे दुरुस्त हो सकता है के शोहर अपनी बीवी को उसके वालिदेन से या महरम रिश्तेदारों से मुलाक़ात करने से रोक ले ?

यह कता’रहमी (रिश्ता नाता तोड़ना) है और कता’रहमी हराम है।

औरत को अपने वालिदेन से मिलने ओर वालिदेन को अपनी बेटी से मुलाक़ात करने का हक़ हासिल है, बल्कि फुक़हा ने लिखा है के अगर औरत के वालिदेन और उसके महरम रिश्तेदार उसी शहर में मौजूद हो तो उनसे मुलाक़ात करने से नहीं रोक सकते।

तफ़सील यह है के वालिदैन अगर बेटी को मिलने आ सकते हैं तो वो आए मुलाक़ात करके चले जाए।

और अगर उनका आना मुमकिन न हो तो हफ्ते में एक मर्तबा वालिदेन से मिलने जा सकती है।
लेकिन आने जाने का खर्च शोहर से लेगी, और महीने या साल में एक दफ़ा महरम रिश्तेदारो, भाई, चचा वगैरह से मुलाक़ात करने का हक़ हासिल है, शोहर इस से रोक नहीं सकता।

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २६३०⭕

मेरे शोहर कमाते नहीं है, न मेरा खर्च सहीह तौर पर देते है, न बच्चों की तालिम के इख़राजात अदा करते है, बार बार केहने के बावजूद कोई तवज्जुह नहीं दी।

इसी लिए मजबूर होकर मैने एक स्कूल में मुलाज़िमत इख़्तियार कर ली है। इसी से घर की ज़रूरियात पूरी होती है।

अब वह मुझ पर दबाव डाल रहे है, के तुम मुलाज़िमत छोड़ दो, में मेहनत मज़दूरी करुँगा।

इस सूरत में शर’अन मुझे क्या करना चाहिए ?
कया में उनकी इजाज़त के बगैर मुलाज़िमत कर सकती हु ?


🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

असल में कमाना मर्द की ज़िम्मेदारी है और घर के अन्दर के काम को संभालना औरत के ज़िम्मे है।

आपके शोहर का मेहनत मज़दूरी करने जी चुराना अपनी शर’ई ज़िम्मेदारी से भागना है। इसलिए आम हालात में औरत का शोहर की इजाज़त के बगैर मुलाज़िमत करना जाइज़ नहीं।

लेकिन अगर शोहर अपने फ़राइज़ अदा न करता हो, तो शोहर की इजाज़त के बगैर भी औरत के लिए अपनी बुनियादी ज़रूरियात को पूरा करने की गरज़ से शशरई परदे के साथ मुलाज़िमत करना जाइज़ है।
(जब शोहर पाबन्दी के साथ कमाकर खर्चा पूरा करना शुरू कर दे उस वक़्त मुलाज़मत छोड़ देना ज़रूरी होगा)।

📗किताबुल फ़तावा ९/३२५ से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

आज का सवाल नंबर २६४०

किसी ने अपनी बीवी को माँ कहा तो क्या हुक्म है ?
जिहार तो नहीं हुवा ना?

जिहार किसे कहते हैं?
जीस से निकाह पर असर पडता है।

जवाब

حامد ومصلیا و مسلما

अगर किसी ने अपनी बीवी को कहा के :
“तू मेरी माँ के बराबर है” या
“तू मेरी माँ जैसी है” या
“तुम तो मेरी माँ हो”.
मक़सद इस से बीवी की बुजुर्गी और इज़्ज़त करना हो,
या इस निय्यत से कहा हो के तू उम्र में मेरी माँ के बराबर है, तो निकाह पर कोई असर नहीं पड़ा।

या ऐसे ही बक दिया, कोई निय्यत नहीं की तो भी कुछ भी नहीं हुवा।

अगर इस निय्यत से कहा के
“तू मुझ पर मेरी माँ की तरह हराम है” या
“इस से तलाक़ देने या छोड़ने की निय्यत हो”
तो तलाक़े बाईंन पड़ जाएगी।
याने एक तलाक़ पड़ कर निकाह ख़त्म हो जाएगा।

या उस केहने से निय्यत हो के
“में तुझे तलाक़ तो नहीं देता, मगर तू रोटी कपडा ले और यहाँ पड़ी रेह, में तुझसे सोहबत नहीं करुँगा”
तो इस से भी तलाक़े बाईंन पड़ेगी।

दरसी बहिश्ती ज़ेवर सफा ३९२

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

आज का सवाल नंबर २६४१

कल ज़िहार की ता’रीफ़ बतायी थी उसका हुक्म क्या है ?
कया बीवी से दोबारह निकाह करना पडेगा ?

जवाब

حامد ومصلیا و مسلما

जिहार करने (माँ की तरह अपने पर हराम करने) से बीवी निकाह से तो नहीं निकलेगी,
मगर बीवी से सोहबत करना, बोसा देना, शहवत से हाथ लगाना यह सब हराम हो जाएगा।

जब तक के उसका कफ़्फ़ाराह अदा न करे, चाहे ईसी हालत में कितने ही साल निकल जाऍं।

हां, जब कफ़्फ़ाराह अदा कर देगा तो उसके बाद दोनों मिया बीवी की तरह रह सकते हैं, नया निकाह पढने की ज़रुरत नहीं।

उसका कफ़्फ़ाराह वही है जो रोज़ह तोड़ने का कफ़्फ़ाराह है।

बहिश्ती ज़ेवर सफा ३९३

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज  का  सवाल  नंबर –  २६४८ ⭕

( अ ) मेरी  बीवी  लंबी  मुद्दत  से  बीमारी  में  मुब्तला  है  जिस  की  वजह  से  कमज़ोर  और  कमताक़त  है  कोई  काम  नहीं  हो  सकता. ६ / ७ साल  से  ये  हालात  है. इलाज  मुआलज के  बावजूद  कोई  फ़र्क़  नहीं  इस  हालात  में  हमल के  दिनों  में  तबीअत  खराब  रहती  है. कमज़ोरी  में  मज़ीद  इज़ाफ़ा  हो  जाता  है  ऐसी  हालात  में  ऑपरेशन  कराना जाइज़ है या  नहीं  डॉक्टर  हकीम  कहते  है  के  तुम  आपरेशन  नहीं  कराओगे  तो  तबीअत  ऐसी  ही  रहेगी  लिहाज़ा  क्या  किया  जाये ?

( ब )  मेरे  दोस्त  के  ३  बच्चे  सिजर  से  आये  है  उनको  भी  डॉक्टर  ने  बोला  है  ऑपरेशन  कराना  ज़रूरी  है  चौथा  बच्चा  अब  अगर  आप  की  बीवी  से  पैदा  होगा  तो  उस  की  जान  को  खतरा  है ।

حامدا و مصلیا و مسلما

🔵 जवाब 🔵

(अ –  ब )  जब  कमज़ोरी  और  तबियत  की  खराबी  की  वजह  से  या  सिजर  की  वजह  से  हमल  को  बाकी  रखना  मुश्किल  है  हमल  बर्दाश्त  नहीं  हो  सकता  तो  सब  से  पहले  ऐसा  इलाज  किया  जावे  जिस  से  हमल  न  ठहरे  और  दवाई  होती  रहे  फिर  अगर  ये  वक़्ती  तदबीर – आईडिया  मुफीद  साबित  न  हो  तो  अखीरी  दर्जे  में  मुस्लमान, दीनदार  माहिर  हकीम  या  मुसलमान  दीनदार  तजर्बहकार  डॉक्टर  के  कहने  के  मुताबिक़  ऑपरेशन  कराना  जाइज़  है । इस  बारे  में  गैर  मुस्लिम  हकीम  या  डॉक्टर  कई  सलाह -मशवेरा  के  ऐतिबार  नहीं  है ।

📗फतावा  रहीमियह  १० /१८१ करांची

📘फतावा कास्मियाह  २३ /२६६
 

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

आज का सवाल नंबर ~२६६६

इस्लाम में औरत को एक ही शादी की इजाज़त दी है, और मर्द को चार शादी की इजाज़त दी है, औरत के साथ ऐसी नाइन्साफी क्यों ?
और शौहर के तलाक देने या उसकी मौत के बाद इद्दत पूरी किये बगैर दूसरा निकाह क्यों नही कर सकती ??

🔵जवाब🔵
حامدا و مصلیا و مسلما

इसकी बहोत सी वुज़ूहात है,
जिस में से एक वजह नीचे दिए गए वाक़िये से मालूम होगी वाक़िया पेश किया जाता है।

सायन्स के डायरे में क़ुरानी मो’अजिज़ात की एक झलक

एक माहिर जिनीन ,यहूदी (जो दीनी आलिम भी था) खुले तौर पर कहता है के रूए ज़मींन पर मुस्लमान खातून से ज़्यादा पाक बाज़ और साफ़ सुथरी किसी भी मज़हब की खातून नहीं है।

पुरा वाक़िया यूँ है के
अल्बर्ट आइंस्टीन इंस्टीटूट से तअल्लुक़ रखने वाला एक माहिरे जिनींन (हमल की जाँच का माहिर) यहूदी पेश्वा रोबर्ट ने अपने इस्लाम क़ुबूल करने का एलान किया, जिसकी वाहिद वजह यह बनी के क़ुरान में मज़कूर मुतल्लक़ा (तलाक़ शुदा औरत) की इद्दत के हुक्म से वाक़फ़ियात और इद्दत के लिए तीन महीने का जो वक़्त दिया गया है उसके पीछे की हिक्मत।

अल्लाह का फर्मान है
“والمطلقات یتربصن بأنفسهن ثلاثة قروء”
[البقرة:२२८]
“मुतल्लक़ा अपने आप को तीन हैज़-मासिक तक रोके रखे”

इस आयत ने डी.एन.ए के रिसर्च में एक अजीब जानकारी हासिल करने का रास्ता खोला, और यह पता चला के मर्द की मनि (स्पर्म) में प्रोटीन दूसरे मर्द के मुक़ाबले ६२% परसेंट अलग होता है। और औरत का जिस्म एक कंप्यूटर की तरह है, जब कोई मर्द हम बिस्तरी/सोहबत करता है तो औरत का जिस्म मर्द के बैक्टिरिया को जज़्ब (सेव) कर लेता है।

इस लिए तलाक़ के फ़ौरन बाद अगर औरत किसी दूसरे मर्द से शादी कर ले या फिर एक वक़्त में कई लोगो के साथ जिस्मानी तअल्लुक़ क़ाइम रखे तो इसके बदन/जिस्म में कई डी.एन.ए की प्रिंट/छाप बेक्टेरिआ की शक्ल में जमा हो जाते है, जो खतरनाक वायरस बन जाते है, और जिस्म के अंदर जान लेवा बीमारिया पैदा होने का सबब बनती है। साइंस ने पता लगाया के तलाक़ के बाद एक हैज़/मासिक गुज़रने से ३२% से ३५% परसेंट तक प्रोटीन ख़त्म हो जाते है,
ओर दूसरे हैज़ आने से ६७% से ७२% तक मर्द के डी.एन.ए की छाप कम हो जाती है,
ओर तीसरे हैज़ में ९९.९% का खत्म हो जाता है और फिर औरत का जिस्म बाक़ी डी.एन.ए के असर से बिलकुल पाक हो जाता है।
ओर बगैर किसी साइड इफ़ेक्ट व् नुक़सान के नए डी.एन.ए की प्रिंट क़ुबूल करने के लिए तैयार हो जाता है।

एक तवायफ/कॉल गर्ल कई लोगो से तअल्लुक़ बनाती है। जिसकी वजह से उसके जिस्म में अलग अलग मर्दो की मनि (स्पर्म) चली जाती है और जिस्म में अलग अलग डीएनए की छाप जमा हो जाती है, और इसके नतीजे में वह कई बड़ी बड़ी बीमारियो की शिकार हो जाती है।

ओर रही बात इन्तिक़ाल हुए मर्द की बेवा की इद्दत तो इसकी इद्दत तलाक़ शुदा औरत से ज़्यादा है, क्युंके
गम टेंशन की वजह से पिछले डीएनए का असर जल्दी ख़त्म नहीं होता और इसे ख़त्म होने के लिए पहले से ज़्यादा वक़्त चाहिए होता है । इसी की रिआयत करते हुए ऐसी औरत के लिए चार महीने और दस दिन की इद्दत रखी गयी है, फ़रमाने इलाही है ।
“والذين يتوفون منكم و يذرون أزواجا يتربصن بأنفسهن أربعة أشهر و عشرا”
[البقرة:٢٣٤]
“और तुम में से जिसकी वफ़ात हो जाये और अपनी बीवियाँ छोडे तो चाहिए के वह चार महीने दस दिन अपने आप को रोके रखे”

इस हक़ीक़त से राह पाकर एक माहिर डॉक्टर ने अमेरिका के दो अलग अलग इलाक़ो में तहक़ीक़ की, एक मोहल्ला जहाँ अफ्रीकन पाबंद मुस्लमान रहेते है वहां की तमाम औरतो में सिर्फ एक शोहर ही का डीएनए का असर पाया गया, जब के दूसरे मोहल्ले जहाँ असल अमेरिकन आज़ाद औरते रहेती है इन्मे एक से ज़्यादा दो तीन लोगो तक के डीएनए का असर पया गया। जब डॉक्टर ने खुद अपनी बीवी का ब्लड टेस्ट किया तो चोंका देने वाली हक़ीक़त सामने आयी के इसकी बीवी में तीन अलग अलग लोगो के डीएनए पाये गये, जिसका मतलब यह था के इसकी बीवी इसे धोका दे रही थी, और यह के इसके तीन बच्चो में से सिर्फ एक इसका अपना बच्चा है।

इसके बाद डॉक्टर पूरी तरह काइल हो गया के सिर्फ इस्लाम ही वह दिन है जो औरतो की हिफाज़त और समाज की पाकीज़गी की ज़मानत-गेरेंटी देता है। और इस बात की भी के मुस्लमान औरते दुनिया की सबसे साफ़ सुथरी पाक दामन व् पाक बाज़ होती है।

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و الله اعلم بالصواب
✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

आज़ का सवाल नंबर २६७३

इस्लाम में औरतों के हक़ कम और फैसला सिर्फ मर्द का चलता है क्या ये बात सहीह है ?

🔵जवाब🔵

इंसान के बुनियादी हुकुक जान, माल, इज्जत की हिफाजत और इंसानी जज्बात का ख्याल, इंसानी जरूरत इसमें मर्द, औरत दोनों को इस्लाम ने बराबर करार दिया है।

अलबत्ता मर्द को औरत पर सदर और अमीर और फैसल बनाया है ताकि दोनों के इख्तिलाफ में फैसला हो सके, और बाझ चीजों में मर्द को औरतों के मुकाबले में खुसुसीय्यत दी है, क्योंकि मर्द और औरत दोनों में फितरत, जिस्म और आदत के एअतेबार से फर्क है, इसलिए बाझ इख्तियार मर्द को दिए है, औरत को नहीं,

जैसे नमाज का इमाम, काझी, हाकीम बनना, अजान देना, तलाक देना, तलाक से रुजू करना वगैरा।

औरतों की आवाज पर्दे की चीज है, और अक्सर औरतों में कुव्वते फैसला, कुव्वते बर्दाश्त, सब्र मर्दों के मुकाबले में कम होती है, इसलिए बकीया इख्तियार औरतों को नहीं दिए, वरना मुआशरेमें बहुत नुकसान और खराबीया पैदा होती।

📗सूरह बकरह
🔰आयत :२२८
तफसीर मआरीफुल कुर्आन व आसान तफसीर से माखुझ।

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

आज का सवाल नंबर २६७४

कया कुरान में चेहरे के परदे- नक़ाब का हुक्म सराहतन-साफ़ साफ़ है ?
बाज़ लोग कहते है चेहरे का पर्दा कुरान से साबित नहीं।
ये बात सहीह है ?

🔵जवाब🔵

हां, साफ हुक्म साबित है जैसे के

पहली दलील
📕क़ुरान का पाराह २२ सुरह अहज़ाब में आयत नंबर ५९ में अल्लाह तआला फ़रमाते है

یایہا النبی قل لازاجک و بناتک و نساء المومنین یدنین علیہن من جلابیبہن

अय नबी ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! आप अपनी पाक बीबियों और अपनी बेटियोँ और मूअमिन औरतों को फ़रमा दिजिये के अपने चेहरे पर अपनी चादर का कुछ हिस्सा लटकाये रखे।

उस ज़माने में नक़ाब नहीं बने थे लिहाज़ा चेहरे को छुपाने के लिए चादर का कोना लटका लिया जाता, जिस में से एक आँख भी रास्ता वगैरह देखने के लिए खुली रखी जाती थी।

दूसरी दलील
📘पाराह १८ सुरह नूर में आयात नंबर ३१ में है

و لا یبدین زینتہن

ओर अपनी ज़ीनत ज़ाहिर न करे

(ज़ीनत की चीज़ें होंठ, गाल, आंख, नाक ये सब चेहरे में ही आता है। औरत में ज़ीनत का असल मरकज़ चेहरा है, लिहाज़ा उसे तो दूसरे आज़ा के मुकाबले में खास तौर पर खुला न रखना चाहिए बल्कि ढंकना चाहिए)

तीसरी दलील
📗पाराह २२, सूरह अहज़ाब आयत ५४ में सहाबा रदी अल्लाहु अन्हुम जैसी निगाह को पाक रखने वाली जमात को हुक्म है

اِذَا سَاَلْتُمُوْہُنَّ مَتَاعًا فَسْئَلُوْہُنَّ مِنْ وَّرَآءِ حِجَابٍ ؕ ذٰلِکُمْ اَطْہَرُ لِقُلُوْبِکُمْ وَ قُلُوْبِہِنَّ ؕ

जब पैगम्बर की बीवियों (जो हमारी रूहानी माएं है) से कोई चीज़ माँगो तो परदे के पीछे से मांगो।

पाक बीबियों के बारे में बुरा वस्वसा भी नहीं आ सकता था, फिर भी परदे के पीछे से बात करने का हुक्म है, तो दूसरी आम औरतों का चेहरा देखने की और मरदों को चेहरा दिखाने की आम इजाज़त कैसे हो सकती है।

लिहाज़ा चेहरे के परदे को शरीअत का हुक्म न मानने वाले लोग गुमराह है।

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.