aaj ka sawal hindi

⭕आज का सवाल नंबर – २५४७⭕

ऐसी बीमारी जिस में मौत हो जाने का जनने ग़ालिब हो उस मरज़ुल मौत मे वारिस ( जिस को मरनेवाले से विरासत का हिस्सा मिलनेवाला हो उस ) बेटे को बरी करना- क़र्ज़ा मुआफ करना कैसे है?
वसिय्यत करना वारिस और गैर वारिस के लिए क्या हुक्म है?

🔵 जवाब 🔵

حامدا و مصلیا مسلما


मरज़उल मौत में वारिस का क़र्ज़ा मुआफ करना सहीह नहि, अजनबी का क़र्ज़ा मुआफ करना सहीह है।

चुंके वारिस के लिए वसिय्यत सहीह नहीं और मरज़ुल मौत में किसी को बरी करना वसिय्यत के हुक्म में है, इस लिए वारिस को बरी करना भी सहीह न होगा और अजनबी के लिए वसिय्यत सहीह है इसलिए उस को बरी करना भी सहीह होगा लेकिन अजनबी को भी सिर्फ एक तिहाई(१/३)-३३% माल के बकद्र ही बरी कर सकता है क्युंके तिहायी से ज़्यादा की वसिय्यत बातिल है-मोअतबर नहीं तो बरी करने- क़र्ज़ा मुआफ करने का भी सहीह नहि।

(फिक़ही ज़वाबित २/ १९०)

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २५४९⭕

इन्तिक़ाल के कितने दिन के बाद मरहूम की मीरास (विरसा) तक़सीम करना चाहिए?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

शरीअत का हुक्म है के तरका (मैय्यत के छोडे हुवे माल) में जिन हुक़ूक़ की अदायगी वाजिब है, मसलन कफ़न दफ़न का खर्च्, क़र्ज़, जाइज़ वसिय्यत हो तो उसकी अदायगी के बाद बाक़ी मीरास जल्द वारिसों के दरमियान तक़सीम कर दी जाए।

ताख़ीर होने से बहुत ज़ियादह पेचीदगियाँ (दुश्वारियां) और बद-गुमानियाँ पैदा हो जाती है, बाज़ मर्तबा ज़ियादह ताख़ीर होने से तक़सीमे मीरास में सख्त उलझने और मुश्किलात पैदा हो जाती है। मसलो को हल करने में परेशानियाँ हो जाती हैं। और हक़-तल्फी तक की नौबत आ जाती है।

ये ख़्यालात बिलकुल बेकार है के मरहूम का तरका (विरसा) फ़ौरन तक़सीम किया जाये तो दुनिया यह कहेगी के बस इसी का इन्तिज़ार था के मरहूम की आँख बंध हो और उसके माल सामान पर क़बजह कर लिया जाए।

मगर अल्लाह त’आला के हुक्म के आगे यह सब ख़्यालात और जज़्बात बेकार है, सब वारिसों को बता दिया जाये के तरका की तक़सीम अल्लाह त’आला का हुक्म है, लिहाज़ा उसके मुताबिक़ जल्द से जल्द अमल किया जाए।

📗अहकामे मैयित सफा १८५

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नंबर २५६२⭕

मे बड़ा भाई हूँ ,वालिद साहब का इन्तिक़ाल हो गया है, उस वक़्त से कारोबार मैने संभाला था, मेरी दूसरी दो बड़ी बहन और दो छोटे भाई है, सब साथ में रहते है, और खर्चा में चलाता हूं।

उनकी तरफ से विरासत की तक़सीम का कोई तक़ाज़ा नहीं, एक बहन की शादी भी मैने कराई, सब माल मिलकत में जो कुछ कारोबार के लिए करना हो हम ने एक दूसरे को इजाज़त दी है।
तो क्या फिर भी विरासत की तक़सीम शरीअत में ज़रूरी है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

आप के भाई बहन आप के माँ तहत- अंदर में है इसलिये शरमा शरमी में कुछ नहीं कहते, मगर दिल से कोई इजाज़त नहीं देता।
इस लिए उन की ज़ाहिरी इजाज़त मुअ’तबर नहीं, जिस की बिना पर एक वारिस का तमाम माल पर क़ब्ज़ा कर लेना बिलकुल हराम और नाजाइज़ है।

खासकर उस सुरत में जब के बाज़ वारिस ना बालिग़ या पागल या गायब हो क्यूँ के गायब की इजाज़त का कुछ इल्म नहीं और ना बालिग़ और पागल खुश दिली से साफ़ साफ़ इजाज़त दे तो भी उन की इजाज़त मुअ’तबर नहीं।

लिहाज़ा अज़ाबे क़ब्र और अज़ाबे जहन्नम से दरे और ज़ुल्म व माल दबाने से बाज़ आये, और वारिसों को जल्द अज़ जल्द उन का हक़ पोहचाए।

📗अहकामे मैयित सफा १९० बा हवाले
📘 वाई’जे इस्लामे हक़ीक़ी

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २५७४⭕

बा’ज़ बहनो को उनका विरासत का हिस्सा भाई नहीं देते, और उन पर कुछ ऐहसान करके मुआफ करवा लेते हैं।
तो क्या इस तरह मुआफ करने से मुआफ हो जायेगा ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

विरासत के ज़रिये जो मिलकत वारिसों की तरफ मुन्तक़िल होती है ज़बरदस्ती (गलेपडु) की मिलकियत है, न उसमे वारिसो का क़ुबूल करना शर्त है, न उसका उसी पर राज़ी होना ज़रूरी है।

बल्के अगर वह ज़बान से साफ़ तौर पर यूँ भी कहे के में अपना हिस्सा नहीं लेता तब भी वह शर’अन अपने हिस्सा का मालिक हो चुका।

📕(मा’रीफ़ुल कुर’आन: २/३१२)

जो लोग बहनो को हिस्सा नहीं देते और वह यह समझ कर दिल ना चाहते हुवे भी शरमा शरमी माफ़ कर देती हैं के मिलने वाला तो है ही नहीं तो क्यूँ भाइयो से बुराई लेवे…!!!

ऐसी मुआफी से शर’अन मुआफ नहीं होता।

उनका हक़ भाइयो के ज़िम्मे वाजिब रहता है, यह मीरास दबाने वाले सख्त गुनह्गार हैं।

इस्मे बा’ज़ बच्चिया ना-बालिग़ भी होती है, उसको हिस्सा न देना डबल गुनाह, एक गुनाह वारिसे शर’ई का हिस्सा दबाने का, और दूसरा यतीम के माल को खाने का।

(लिहाज़ा किसी को उसकी बहन ने मुआफ कर दिया हो फिर भी हिस्सा पहुंचाये, वरना आख़िरत में इसका हिसाब देना पडेगा।

👉हक़ीक़त में मुआफ उस वक़्त होगा जब वह अपने हिस्सा पर क़ब्ज़ा कर ले, और खूश दिली से बिला शर्म और दबाव के वापस कर दे)

📘(मा’रीफ़ुल कुर’आन: २/३२१)

📗महमूदुल फ़तवा ८/५०८

و الله اعلم بالصواب