वज़न पर जानवर को खरीदना बेचना २१६७

वजन करके जानवर को खरीदने कैसा है ?
इसमें धोखा नहीं होता है क्यों क्यूंकि वज़न से क़ीमत का इत्मिनान हो जाता है।

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

जानवर तोल के तोले जाने वाली चीज़ों में दाखिल नहीं है, इस लिए हिदायह और फत्हुल क़दीर आलमगीरी वगैरह में इस मुआमले को नाजायज लिखा है।

नाजायज होने की वजह यह है कि मामले से पहले ना जानवर का वज़न मालूम होता है, ना उसकी कीमत मालूम होती है, तो यह मुआमला मजहूल- नामालूम हो गया, लेकिन जब जानवर को तोल लिया जाए उस वक़्त उसका वज़न और और कीमत मालूम होकर जहालत ख़त्म हो जाती है।

रही बात वज़न से जानवर का मुकम्मल गोश्त मालूम नहीं होता है, जानवर सुकड़कर कर या साँस फुला कर घटा बढ़ा देता है तो यह थोड़ी सी जहालत माफ़ है, उर्फ़ यानी बाजार का ऐसा रिवाज जिस में खरीदार और और बेचने वाला दोनों राज़ी है लिहाजा यह मामला आख़िरकार सहीह हो जायेगा।

दारुल दारुल उलूम देओबंद के जैसे नाजायज होने का फतवा है वैसे ही ऊपर दी गई तफ़सील के साथ जवाज़ का भी फ़तवा मौजुद है, उस पर भी अमल की गुंजाईश है, लेकिन क़ुरबानी एक इबादत है, जिस को सहीह तरीक़े से अदा करना ही तक़वा है, जो उस का मक़सूद है, लिहाज़ा जब तक हो सके इस इख़्तिलाफ़ी तरीके से बचना चाहिए और एहतियात का पहलु इख़्तियार करना चाहिए।

जाइज़ के कहनेवाले
१। अहसनुल फ़तवा
२। किताबुंन नवाज़िल
३। देवबन्द के दूसरा फ़तवा

नाजाइज़ कहनेवाले
१। फतावा रहीमियह १०/४८
२। देवबन्द का पहला फ़तवा
३। हिदयाह फत्हुल क़दीर

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा व सेक्रेटरी जमीयते उलमा सूरत शहर, गुजरात, इंडिया

दूध से मलाई निकालकर बेचना १९४४

दूध से मलाई निकालने के बाद दूध को अलग से बेचना कैसा है ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

दूध ख़ुदा ए पाक की उम्दह नेअमत है, खालिस दूध में जो लज़्ज़त है वह उस में नहीं रेहती जिस में से मलाई निकाल ली जाये।

लिहाज़ा उस को इस तरह बिगाड कर बेचना मख़लूक़े ख़ुदा को ख़ालिस चीज़ से महरूम करने और नेअमत की नाशुक्री के बराबर है।

हां, अगर बतला दे और उस वजह से क़ीमत भी कम कर दे और धोका न दे तो जाइज़ है।

फ़तवा रहीमीयह करांची ९/२१४

و الله اعلم بالصواب

हिजरी तारीख़ : १७ / रबीउल आखर १४४१ हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा व सेक्रेटरी जमीयते उलमा सूरत शहर, गुजरात, इंडिया

 

ख़राब अंडा वापस देना १९४३

अंडा ख़रीदने के बाद तोडा तो वह गन्दा निकला, तो वापस देकर पैसे लेना कैसा है ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

जाइज़ है।
ये अंडा किसी काम का नहीं था, तो इसे बेचना बातिल (हराम) हुवा।
लिहाज़ा जो क़ीमत दी थी वह वापस ले सकता है।

हिदायाह आखिरन बाबू बाईल फ़ासिद सफा २७
फतावा रहीमियह करांची ९/२०९

हिजरी तारीख़ : १६ / रबीउल आखर ~ १४४१ हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा व सेक्रेटरी जमीयते उलमा सूरत शहर, गुजरात, इंडिया

मेमोरी कार्ड में फिल्म और गाना डाउनलोड करने का कारोबार करने वाले की कमाई १९२१

मेमरी कार्ड में फिल्म और गाना डाउनलोड करने का कारोबार करते है उन की कमाई कैसी है ?

जवाब
حامدا و مصلیا مسلما

उन की कमाई मकरूहे तहरीमी (हराम के क़रीब क़रीब) है।

दरसी सवाल जवाब सफा ३१
बा हवाला मजमउल अन्हूर ४/१८८

हिजरी तारीख़ :
२४ / रबीउल अव्वल ~ १४४१ हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

पतंग और उसकी दोर चढाने-घिसने का कारोबार १६०२

पतंगबाजो ओर उसके मुतल्लीक सामानकी तिजारत करने का शरई लिहाज़ से क्या हुक्म है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

पतंग के मुताल्लीक़ सामान की तिजारत का हुक्म ये है कि ये तिजारत” ईआ़नतुन अलल मासियह” ( गुनाह पर मदद करने) की बिना पर नाजायज़ है

(फतावा महमुदीया – 16 / 134)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०१ जमादिउल अव्वल १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

दिवाली के दिये, आँगन के रंग, घण्टी वग़ैरह बेचने का हुकम १५३६

हमारे वालिद साहब दुकान पर ‘दिवाली के दिये आँगन के रंग‘ लाइटिंग, पूजा की घंटि, सिन्दूर बेचते है.

कया ये चीज़ें बेचना जाइज़ है? आमदनी हलाल है?

 

जवाब:  حامدا و مصلیا و مسلما

इन तमाम चीज़ों का जाइज़ ईस्तिअमाल भी है, और ये चीज़ें दूसरे कामों में भी ईस्तिअमाल हो सकती है.

लिहाज़ा उस के नाजाइज़ ईस्तिअमाल की ज़िम्मेदारी बेचने वाले पर नहीं है, बल्के ईस्तिअमाल करने वाले पर है.

लिहाज़ा इन चीज़ों का बेचना जाइज़ और आम्दानी हलाल होगी।

 

फतवा कास्मिया जिल्द २९ सफा ३२४ से ३२७

बा हवाला शामी और अशबाह से माखूज़

अलबत्ताह दिवाली के मोके पर इन चीज़ों के बेचने से बचना बेहतर है।

किताबं नवाज़िल १०/२२७ से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़: २६ सफर उल मुज़फ्फर १४४० हिजरी