क्रिसमस डे में सांता क्लॉस बनाना १५८७

क्रिश्मस डे क़रीब आता है तो स्कूल में फंक्शन होता है, उस में हमारे बाज़ मुस्लिम बच्चों को सांताक्लॉस का रूप बनाने को कहा जाता है, और बहोत सो को उस की टोपी पहनाई जाती है, तो क्या बचचे ये लिबास इस्लामी ऐतिबार से पहन सकते है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

इस्लामी शरीयत में गैर क़ौम से मुशाबेहत इख़्तियार करने की मुमानिअत-मना होना आया है, हदीस शरीफ में है जिस ने जिस क़ौम की मुशाबेहत-कॉपी इख़्तियार की उस का हश्र क़यामत में ज़िंदा किया जाना उसी के साथ होगा.

क्रिश्मस डे- (नाताल) नसारा का तेहवार है, उस में सांताक्लॉस का लिबास इख़्तियार करना उन की मज़हबी रस्म है,

लिहाज़ा सांताक्लॉस का रूप इख़्तियार करने की या उस की टोपी पहनने की बच्चों को भी इजाज़त न होगी, इस से उन के मज़हब का रंग उन पर चढ़ता है, और उन की गलत तरबियत होती है,

जिस का गुनाह तवज्जुह न देने की वजह से माँ बाप को होता है, लिहाज़ा उस से अपनी अवलाद को बचाना ज़रूरी है.

माखूज़ अज मजमउज़जवाएद ५/१६९

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१७ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

Toggle मुशाबहत का मतलब और इबरतनाक किस्सा १६०४

जो किसी कोम की मुशाबहत इख़्तियार करे वो उन्ही में से है, इसका क्या मतलब है ? तफ्सील से बताएं.

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हदीस का मतलब ये है के जो शख्स किसी भी गैर कोम – मज़हब वालों की मुशाबहत, नक़्क़ाली और कॉपी उनकी मज़हबी चीजों में उनकी मज़हबी निशानियों, ख़ुशी और गमी में करेगा उसका हश्र यानी क़यामत के दिन उठाया जाना उन्हों के साथ होगा, उसका शुमार भी काफिरों में होगा, यानि उनके लिए अज़ाब और जहन्नम में जाने का फैसला होगा, हश्र का मतलब समझने के अल्लाह ने दुनिया ही में कई वाकियात हमें दिखा दिए जिसमे से एक मोअतबर वाकिया पेश करता हुं.

नसरानियों के तोरो तरीके पसंद करने वाले आलिम का इबरतनाक किस्सा

हज़रत इमामे रब्बानी मौलाना रशीद अहमद गंगोही रह. ने इरशाद फ़रमाया :

कानपूर में कोई नसरानी जो किसी आला ओहदे पर था, वो मुसलमान हो गया था, मगर असलियत छुपा रखी थी, इत्तेफ़ाक़ से उसका तबादला [ट्रांसफर] किसी दूसरी जगह हो गया, उसने उन मोलवी साहब को जिससे उसने इस्लाम की बातें सीखी थी अपने तबादला से मुत्तला किया, [इत्तेला दी], और तमन्ना की के किसी दीनदार शख्स को मुझे दे, जिससे इल्म हासिल करता राहु, चुनाचे मोलवी साहब ने अपने एक शागिर्द को उनके साथ कर दिया,

कुछ अरसे बाद ये नसरानी [जो मुसलमान हो चूका था]  वो बीमार हुवा तो मोलवी साहब के शागिर्द को कुछ रुपये दिए, और कहा के जब में मर जाऊ, और ईसाई जब मुझे अपने कब्रस्तान में दफ़न कराये तो रात को जाकर मुझे वहां से निकाल लेना, और मुसलमानो के कब्रस्तान में दफ़न कर देना,

चुनांचे वैसा ही हुवा, जब मोलवी साहब के शागिर्द ने हस्बे वसिय्यत जब क़ब्र खोली तो देखा के उसमे वो नसरानी नहीं है, अलबत्ता वो मोलवी साहब पड़े हुवे है, तो सख्त परेशान [शर्मिंदा] हुवा के ये क्या माज़रा है..!! मेरे उस्ताद यहाँ कैसे…!!!

आखिर दरयाफ्त से मालूम हुवा के मौलाना साहब नसरानी के तोरो तरीके को पसंद करते थे, और उसे अच्छा जानते थे,

[इरशादाते हज़रत गंगोही रह. सफा ६५]

मेरे भाइयो..!!

ये मोलवी साहब सिर्फ गैरों के तरीकों को पसंद करते थे, उस पर चलते नहीं थे, तो अल्लाह ने दुनिया ही में जिसका तरीक़ा उनको पसंद था उसके साथ हश्र कर दिया,

हम तो गैरो के तरीको पर चलते है..! बल्कि उस पर नाज़ करते है.! और फख्र से मानते है, तो हमारा क्या हश्र होगा..?

सोचो..!!

और अपनी शक्लो सूरत, लिबास, रहन सहन, ख़ुशी गमी में इस्लामी तरीको को लाये और हम गैरों के तेहवार मानाने से बचे. अल्लाह हमें तौफीक दे.

आमीन.

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०३ जमादि उल अव्वल १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

मेमन दिन मनाना १६९२

११ अप्रिल को पूरी दुन्या में मेमन डे मनाना शुरू हुवा है, इस तरह दिन मनाने का शरीअत में क्या हुक्म है ?

जवाब

حامدا و रمصلیا مسلما

दे मनाना एक अगर खुराफात न हो तो एक अच्छा तरीक़ा है, ये दिन मनाना ऐसा है जैसे हम यौमे आज़ादी वगैरह सरकारी दिन मनाते है, इस का मक़्सद ज़िम्मेदारी से मालूम किया तो पता चला के पूरी दुन्या के तमाम मेमन मिल कर इस दिन ज़यादा से ज़यादा ख़िदमत के काम करे और दूसरी क़ौम के सामने अपने अख़लाक़ व सखावत को पेश करे,

लेकिन ये डे मानाने की शुरुआत बहुत अच्छी निय्यत और जज़्बे के साथ होती है लेकिन फिर आहिस्ता आहिस्ता इस में बहुत से खुराफ़ात, फ़ुज़ूल खर्चियाँ और गैर शरई चीज़ें दाखिल हो जाती है, इस की कई मिसालें हर क़ौम में है,

नाचीज़ दो मिसाल आप के सामने पेश करता है।

१। इसा अलैहिससलाम की पैदाइश का दिन मनाना बड़ी अच्छी नियत से ईसाईयों-खिरिस्तियों ने शुरूआ किया था, के इस दिन अपने नबी को याद करेंगे और चर्च में इबादत करेंगे और नबी का मेसेज दुन्या को देंगे, शुरूआत इसी तरह सादगी से हुई थी, लेकिन इस के बाद ३१ नया साल मनाने की रस्म चर्च से बाहर आयी और उस दिन, शराब, ज़िना और हर क़िस्म के खुराफ़ात होने लगे जिसे हम जानते है।

२। ताज़िये, इसे तैमूर लंग बादशाह ने बड़ी अच्छी निय्यत से अहले बैत हज़रत हुसैन रदिअल्लाहु अन्हु की मुहब्बत में शुरू किया था, उन के रोज़े की डुप्लीकेट बनाई थी और सादगी से ज़यारत करता था, बाद में ये कितना फेला और इस में क्या क्या खुराफ़ात और शिर्क बिदअत शामिल हो गए वह हमारी निग़ाह के सामने है।

ईसी तरह अगर मेमन डे मानाने पर पूरी तवज्जुह न रखी गई तो इस का भी हाल ऐसा हो सकता है।

मेमन डे मनाने में चंद खराबियां पैदा हो सकती है, लिहाज़ा उस का पूरा ध्यान ज़िम्मेदारियाँ को रखना ज़रूरी हैं, वरना अल्लाह न करे अक्सर जगह खुराफ़ात ग़ालिब आने की वजह से मेमन डे के नाजाइज़ होने का फ़तवा लग सकता है।

१। अपने मेमन होने पर फ़ख्र करना या किसी और क़ौम को हक़ीर-निचा समझना ये दोनों बातें जाइज़ नहीं, अपने नसब पर फ़ख्र करना क़यामत की निशानियों में से है।

२। मेमन डे को हद से ज़यादा सजावट और लाइटिंग की फ़ुज़ूल खर्ची न हो।

३। उस दिन खास गाने और म्यूजिक बजा कर उसे सेलेब्रटी न किया जाए।

४। उस दिन डांस कर के ख़ुशियाँ न मनाई जाए।

५। केक काट कर उस दिन को न मनाया जाए।

६। मेमन डे लिखी टी-शर्ट वगैरह कपडे पहन कर फखर, गरूर और फ़ुज़ूल खर्चो न की जाए।

७। इस डे को सेलेब्रटी करने आतिशबाजी-पटाखे न फोड़े जाए।

८। जो कुछ भी ख़िदमत की जाये अल्लाह को राज़ी करने और नबी सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम के तरीके पर इखलास के साथ की जाये, दुसरों को दिखलाना, नाम कमाना, शोहरत हासिल करना अपनी क़ौम की बड़ाई जतलाना मक़सूद न हो, ख़िदमत की तौफ़ीक़ अल्लाह देता है, उस पर शुक्र अदा करते हुवे अल्लाह की बरगाह में क़ुबूलियत की दुआ करते हुवे तमाम काम किये जाये।

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
०४~शा’बान~अल~मुअज़्ज़म~१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

सर के बाल कटवाने का तरीका१९८९

सर के बाल कटवाने का क्या तरीक़ा है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

सर के बाल कटाने में इस बात का लिहाज़ रखना ज़रुरी हे के सर के कुछ हिस्से के बाल कटाना और कुछ हिस्से के बाक़ी रखना हराम हे,

जैसे सिर्फ सामने के बाल कटाना और बाकि छोड़ देना, ये हराम हे,

मगरिबी तेहज़ीब (वेस्टर्न सिविलाइज़ेशन) की जाल मे फसने वालो में मुख़्तलिफ़ क़िस्म के बालो (हेयर स्टाइल्स) का रिवाज हे,
जिनमे स्क्रू कट, बज कट, अंडर कट, वगेरा शामिल हे, तो याद रखे के ये सब तरीके हराम और अल्लाह की नराज़गी का सबब हे,

बाल कटाने का दुरुस्त तरीक़ा ये हे के हर तरफ से बराबर बाल कटाये जाये, छोटे बड़े न हो, या फिर पूरा हलक़ (मुंडवाना) कराया जाये,
औरतों को बाल कटाना बिलकुल ही जाइज़ नहीं, अगरचे शोहर हुक्म करे तब भि दुरूस्त नहीं है, कोई बीमारी पैदा हो जाये जिसकी वजहसे कटवाना ज़रूरी हो जाये तो कटाने में कोई हरज नहीं

قطعت شعر راسھا اثمت و لعنت ، زاد فی البزازیة : و ان کان باذن الزوج ؛ لانہ لا طاعۃ لمخلوق فی معصیۃ الخالق… الخ (رد المحتار ، 6/407 ، باب الحظر و الاباحۃ)
نیز دیکھیں (البحر الرائق ، کتاب الکراھیۃ 8/375)

و الله اعلم بالصواب

मुफ़्ती बन्दे इलाही कुरैशी
खादिम-ए-क़ुरान मदरसा मदीनतुल इल्म, गणदेवी.

 

तस्दीक़ मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

हाथ पर मेहंदी लगाना १५८२

हाथ पर महेंदी लगाने का औरतों, मरदों और बच्चों का क्या हुक्म है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

ओरतों को हाथ और पैर पर महेंदी लगाना सुन्नत है, लेकिन तस्वीर न बनाये।

मरदों को बतौरे ज़ीनत मेहंदी लगाना ना-जाइज़ और मकरूह है।

ना-बालिग बच्चों को भी मेहंदी लगाना जाइज़ नहीं, हाँ, बतौरे इलाज दवाई के तौर पर लगाना जाइज़ है।

(बालों और नाखूनो के मसाइल सफा ४३)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

१२ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

हार, सेहरा पहनना, कलगी रखना १५७९

दुल्हे का हार, सेहरा पहेनना और हाथ में कलगी (फ़ूलों का गुलदस्ता) रखना कैसा है ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हार, सेहरा, और हाथ में कलगी रखना ये असल में  हिन्दुस्तान के गैर मुस्लिमों की रस्म है, जो नव मुस्लिम और इल्म से नावाक़िफ़ मुस्लमानो में बाकी रह गई है, और उन की सुहबत से दूसरे इस क़िस्म के गैर पाबन्द और एहतियात न करनेवाले मुस्लमानो में दाखील हो गई है।

इस्लिये इस छोड़ना वाज़िब है।

हिन्दुस्तान के उलेमा ने इसे मुशाबेहत की वजह से मना फ़रमाया है। 

हज़रत मुफ्ती किफ़ायतुल्लाह साहब, हज़रत मुफ्ती अज़ीज़ुर रहमान साहब, हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब वगैरह के फ़तवा में इस को मना लिखा है। और उन सब के उस्ताज़ुल असतीजा हज़रत मौलाना शाह इशाक दहेलवी रहमतुल्लाही अलय्हि (जिन को बरेलवी भी अपना बड़ा मानते है) उनके फ़तवा में भी मना किया गया है।

फ़तावा महमूदियाः १०/३१८

शादी में पेश आनेवाले मसाइल सफा ४९

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०९ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

हैप्पी न्यू ईयर कहना १५९४

क्या हैप्पी न्यू ईयर, साल मुबारक कहना ना-जाइज़ और बिदअत है ?

क्या इसमें गैरों से मुशाबेहत नहीं ?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हैप्पी न्यू ईयर कहने में नसारा-खिस्री-क्रिस्चियन क़ौम से मुशाबेहत है

लिहाज़ा ना-जाइज़ है.

(किताबुल फतावा ६/१२५ से माखूज़)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२३ रबी उल आखर १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.