aaj ka sawal hindi

कया मरहूम की रूह घर पर आ सकती है ?
इस बारे हज़रत अली रदि अल्लाहू अन्हु की रिवायात है तो उस का क्या जवाब है ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

मुरदे की रूह अगर नेक है तो वह बदबुदार दुन्या में नहीं आएगी, यहाँ के अहवाल दूसरे नेक मुर्दों के ज़रिये उन को मालूम हो जाते है।

ओर रूह बद (बुरी) है तो अज़ाब के फ़रिश्ते उन को छोड़ते नहीं है।

मरने के बाद क्या होगा

लिहाज़ा रूह आने के बारे में जितनी भी रिवायात है सब मव्जूआ मनघडत और बनावटी है।

ये बात हज़रत मुल्ला अली करि रह.ने जिन्हे बरेलवी हज़रात भी मानते है अपनी किताब “तबक़ातुल हनफिययह” में कही है।

फ़तवा महमूदियाः १/६०९

ओर ये रिवायात अक़्ल के भी खिलाफ है के जब उन की पुकार चीख चीख कर केहने के बा वजूद कोई सुनता नहीं है, मायूस हो जाती है तो हर हफते क्यूँ आती है, इसाले सवाब की ऐसी मुहताज हर रूह नहीं होती है, उस रिवायात में सब को मुहताज बना दिया है।

हिजरी तारीख़ : १४/ रबीउल आखर ~ १४४१ हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा व सेक्रेटरी जमीयते उलमा सूरत शहर, गुजरात, इंडिया

शबे बरात में अल्लाह तआला ८ लोगों पर अपनी नज़रे रहमत नहीं फरमाते है और उन की मगफिरत नहीं फरमाते है वह ८ शख्स कोन है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

वह ८ शख्स जो इस मुबारक रात में भी मगफिरत से महरूम रहेंगे जब तक के सच्ची तौबा न कर ले और गुनाह को छोड़ न दे

१. मुशरिक (अल्लाह की जात या सिफ़त में किसी को भी शरीक करनेवाला)
२. माँ बाप का नाफ़रमान
३. रिश्ता तोड़ने वाला
४.किना: कपट: वेर रखनेवाला
५. शराबी
६.जानी (जीना करने वाला)
७. तखनो के निचे कपड़ा लटकानेवाला
८.जादूगर (जादू करनेवाला)

सुनने माजा, मुसनद अहमद, दारमि शो’बुल इमांन से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

 

शबे बरात के कब और कितने रोज़े रखे?

आज का सवाल न. १७०२

शबे बारात के कितने रोज़े रखने है और कब?
और इस रात की इबादत कब और कौन से दिन करनी है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

शाबान के महीने में हुज़ूर صل اللہ علیہ وسلم कसरत से रोज़े रखते थे, जब पूछा गया तो फ़रमाया, इस रात में वफ़ात के फैसले होते है, जब मेरा फैसला हो तो में पसंद करता हूँ के उस वक़्त में रोज़े से हूँ.
(अल हदीस)

वैसे हर महीने में १३,१४,१५ के रोज़े जिसे ”अय्यामे बीज “कहते सुन्नत है, लिहाज़ा चाहो तो इस महीने में कसरत से रोज़े रखो, ये दिन रख लो या शबे बारात के दूसरे दिन एक रोज़ा रख लो.

इंडिया में २० अप्रैल २०१९ सनीचर के दिन मगरिब बाद से सुबह सादिक़ तक पूरी रात या अक्सर रात या जिस क़दर हिम्मत हो इबादत करनी है, और इतवार के दिन २१ अप्रैल २०१९ को एक रोज़ा रखना भी काफी है, दो रोज़े रखने का हुक्म आशूरह की तरह इस महीने में नहीं है. और १५ शाबान ही के रोज़े को सुन्नत न समझे।

*मदाइल ए शबे बरात व शबे क़द्र और अल ब्लाग माहनामा से माखूज़.

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
१४शा’बानअलमुअज़्ज़म१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

क्या शबे बरात में नमाज़ और दिन में रोज़े का सुबूत साबित है?
बाज़ हज़रात कहते हैं इस की रिवायत बहुत ज़ईफ़ है लिहाज़ा इस रात का मानना सहीह नहीं क्या ये बात सहीह है?

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

शबे बरात में बिला किसी क़ैद व खुसूसियत के मुतलक़ नमाज़ का सुबूत है (रात के किसी खास वक़्त में किसी खास तरीके से के फुलां सूरत इतनी मर्तबा पढ़ो इस तरह की नमाज़ साबित नहीं) हर शख्स अपने तौर पर इबादत करे, जिस में किसी नुमाइश (रियाकारी) और किसी रस्म और आयते मख़सूसाह (मस्जिद ही में इजतमई शकल बनाकर नमाज़ पढ़ना नवाफिल की जमात करने) की पाबन्दी न हो तो मुस्तहसन (पसन्दीदाह) है.

सुबूत

हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है के रसूलुल्लाह सलल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जब १५ शाबान की रात हो तो उस की रात में नमाज़ और उस के दिन को रोज़ा रखो अल्लाह ताला सूरज डूबने के वक़्त (रोज़ाना रात के तीन हिस्से गुज़रने बाद) आसमान दुनिया की तरफ मुतवज्जह होते है और फरमाते है
“है कोई मगफिरत चाहने वाला के उसे मुआफ करूँ, है कोई रिज़्क़ चाहने वाला के उसे रिज़्क़ आता करूँ, है कोई परेशां हाल के उस की परेशानी दूर करूँ, है कोई ऐसा, है कोई वैसा, यहाँ तक के सुबह सादिक़ हो जाती है.

इब्ने माजह किताब इक़ामतीस सलत बाबु मा जा फी लैलतीं निस्फी मिन शाˋबान सफा ९९ क़दीमी

फतवा महमूदियाः ३/२६४ दाभैल

गैर मुक़ल्लिद के बड़े अल्लम्ह नासिर अल्बानी ने रिवायत नक़ल की है के हज़रत मुआज बिन जबल रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है के हुज़ूर सलल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : अल्लाह ताला १५ शाबान की रात में अपनी मख्लूक़ की तरफ मुतवज्जह होते है और मुशरिक और दिल में किना रखनेवालों के अलावह सब की मगफिरत कर देते है

तबरानी इब्ने हिब्बान

ये रिवायत ८ सहाबा से मुख्तलिफ सनद से मरवी है लिहाज़ा ये हदीस बेशक सहीह है, आगे लिखते है के सख्त ज़ईफ़ होने से ये हदीस सलामत है, शेख क़ासमी रहमतुल्लाहि अलैहि ने इस्लाहुल मसजिद सफा १०७ पर उलमा ए जारहो तदील के हवाले से जो लिखा के १५ शाबान की रात की इबादत किसी भी सहीह हदीस से साबित नहीं ये कहना सिर्फ जल्द बाज़ी और हमारी तरह हदीस के तुरुक और उस की तहक़ीक़ की खूब मेहनत न करने का नतीजाः है. शेख अल्बानी की कलम ख़त्म हुवा.

फ़ज़ाईलुलैलतीननिस्फी मिन शाबान सफा २२

शैख़ अल्लाम्ह मुहद्दिस अब्दुल मालिक अब्दुल हक़ मक्की रहमतुल्लाहि अलैहि कि इस किताब में १५ शाबान की इबादत का १५ रिवायत से सुबूत और सहाबा ताबीइन से इस के मानने का सुबूत और दलील मव्जूद है, इस किताब को भी इस मेसेज के साथ भेजा जा रहा है, लिहाज़ा इसे पढ़े और न माननेवालों को पहुंचाए, अल्लाह की ज़ात से उम्मीद है १५ शाबान की रात की इबादत के सुबूत का इंकार करने वाले अपनी ज़िद से बाज़ आएंगे और हक़ बात को तस्लीम करेंगे.

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़
१३शा’बानअलमुअज़्ज़म१४४०~हिज़री

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन.
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

सहाबी किसे कहते है ?

जवाब

حامدا و مصلیا مسلما

जीस ने हुज़ूर ﷺ को इमान की हालत में देखा हो, या मुलाक़ात की हो, और इमान की हालत में इन्तिक़ाल हुवा हो उसे सहाबी कहते है।

(इस्लामी अक़ाइद सफा २४)

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

२२ जुमाद अल उखरा १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

जो किसी कोम की मुशाबहत इख़्तियार करे वो उन्ही में से है, इसका क्या मतलब है ? तफ्सील से बताएं.

जवाब

حامدا و مصلیا و مسلما

हदीस का मतलब ये है के जो शख्स किसी भी गैर कोम – मज़हब वालों की मुशाबहत, नक़्क़ाली और कॉपी उनकी मज़हबी चीजों में उनकी मज़हबी निशानियों, ख़ुशी और गमी में करेगा उसका हश्र यानी क़यामत के दिन उठाया जाना उन्हों के साथ होगा, उसका शुमार भी काफिरों में होगा, यानि उनके लिए अज़ाब और जहन्नम में जाने का फैसला होगा, हश्र का मतलब समझने के अल्लाह ने दुनिया ही में कई वाकियात हमें दिखा दिए जिसमे से एक मोअतबर वाकिया पेश करता हुं.

नसरानियों के तोरो तरीके पसंद करने वाले आलिम का इबरतनाक किस्सा

हज़रत इमामे रब्बानी मौलाना रशीद अहमद गंगोही रह. ने इरशाद फ़रमाया :

कानपूर में कोई नसरानी जो किसी आला ओहदे पर था, वो मुसलमान हो गया था, मगर असलियत छुपा रखी थी, इत्तेफ़ाक़ से उसका तबादला [ट्रांसफर] किसी दूसरी जगह हो गया, उसने उन मोलवी साहब को जिससे उसने इस्लाम की बातें सीखी थी अपने तबादला से मुत्तला किया, [इत्तेला दी], और तमन्ना की के किसी दीनदार शख्स को मुझे दे, जिससे इल्म हासिल करता राहु, चुनाचे मोलवी साहब ने अपने एक शागिर्द को उनके साथ कर दिया,

कुछ अरसे बाद ये नसरानी [जो मुसलमान हो चूका था]  वो बीमार हुवा तो मोलवी साहब के शागिर्द को कुछ रुपये दिए, और कहा के जब में मर जाऊ, और ईसाई जब मुझे अपने कब्रस्तान में दफ़न कराये तो रात को जाकर मुझे वहां से निकाल लेना, और मुसलमानो के कब्रस्तान में दफ़न कर देना,

चुनांचे वैसा ही हुवा, जब मोलवी साहब के शागिर्द ने हस्बे वसिय्यत जब क़ब्र खोली तो देखा के उसमे वो नसरानी नहीं है, अलबत्ता वो मोलवी साहब पड़े हुवे है, तो सख्त परेशान [शर्मिंदा] हुवा के ये क्या माज़रा है..!! मेरे उस्ताद यहाँ कैसे…!!!

आखिर दरयाफ्त से मालूम हुवा के मौलाना साहब नसरानी के तोरो तरीके को पसंद करते थे, और उसे अच्छा जानते थे,

[इरशादाते हज़रत गंगोही रह. सफा ६५]

मेरे भाइयो..!!

ये मोलवी साहब सिर्फ गैरों के तरीकों को पसंद करते थे, उस पर चलते नहीं थे, तो अल्लाह ने दुनिया ही में जिसका तरीक़ा उनको पसंद था उसके साथ हश्र कर दिया,

हम तो गैरो के तरीको पर चलते है..! बल्कि उस पर नाज़ करते है.! और फख्र से मानते है, तो हमारा क्या हश्र होगा..?

सोचो..!!

और अपनी शक्लो सूरत, लिबास, रहन सहन, ख़ुशी गमी में इस्लामी तरीको को लाये और हम गैरों के तेहवार मानाने से बचे. अल्लाह हमें तौफीक दे.

आमीन.

و الله اعلم بالصواب

इस्लामी तारीख़

०३ जमादि उल अव्वल १४४० हिजरी

मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन

उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

⭕आज का सवाल नंबर – २६२३⭕

इत्र लगाने का सुन्नत तरीका क्या है?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

इत्र (अत्तर) का लगाने का सुन्नत तरीका यह है के इत्र लेकर उसे हथेली में रगड़े-मसले, फिर उसे दाढ़ी और कपडों में लगाए।

📗 सुननो आदाब सफा ५९

📘बा हवाला मजमूआ ज़वाईद् तीबी बदल वुज़ू जिल्द १, सफा २२, हदीस नंबर१२३३

दायें (सीधे, राइट) हाथ से इत्र लेकर बाएं (उल्टे, लेफ्ट) हाथ की हथेली पर डाले, उसके बाद दोनों हथेली को मल ले, और दायें (सीधी, राइट) तरफ से लगाना शुरू करे, हदीस में दायें तरफ से हर अच्छे काम की शुरूआत करना साबित है।

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल २६२५⭕

तेल (हेयर-ओइल) लगाने का सुन्नत तरीका क्या है ?

🔵जवाब🔵

حامد و مصلیا و مسلما

हज़रत मा आइशा रदि अल्लाहू त’आला अन्हा फरमाती है के :
हज़ूर صلی الله عليه وسلم जब तेल लगाते तो पहले बाएं (लेफ्ट) हथेली में लेते, फिर भवों से शुरुआत फ़रमाते, फिर पलकों पर, फिर सर पर लगाते।

📗कंज़ुल उम्माल ७/२३४ हदीस १८२९९

शरहे शीर’अतुल इस्लाम किताब सफा २५६ पर है के :
पलकों के बाद मूंछ दाढ़ी और फिर सर पर लगाते।

📘सुनन व आदाब सफा ६७

दाढ़ी मुबारक में तेल लगाते तो दाढ़ी के उस हिस्से से शुरू फ़रमाते जो गर्दन से मिला हुवा है, सर में तेल लगाते तो पेशानी मुबारक के रुख से शुरू फ़रमाते।

📗खसाईले नबवी व नबवी लयलोनहार सफा ४१५

इश्क़े नबवी के दावे करने वालों से पुछो तेल लगाने का सुन्नत तरीका क्या है ?

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नंबर २६२८⭕

हुक़ूक़ की अदायगी बहुत ज़रूरी है, और हर एक से तअल्लुक़ के कुछ आदाब होते है जिस के अदा करने से दुन्या आख़िरत में कामयाबी मिलती है।
रसूलुल्लाह ﷺ के क्या हुक़ूक़ व आदाब है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا و مسلما

हज़ूर ﷺ की बारगाह के आदाब व हुक़ूक़ दर्जे ज़ैल है।

१।
आप ﷺ पर इमान लाना।

२।
आप ﷺ की इताअत व पेरवी करना।

३।
सब से ज़यादा आप ﷺ से मुहब्बत करना।

४।
आप ﷺ के मुताल्लिक़ सब से अफ़ज़ल होने का एतिक़ाद करना।

५।
आप ﷺ के खातमुन नबीय्यीन होने का एतिक़ाद रख्ना।

६।
आप ﷺ के मुताल्लिक़ मासूम व बे गुनाह होने का यक़ीन करना।

७।
आप ﷺ की अदना-मामूली मुख़ालिफत से भी अपने आप को बचाना।

८।
आप ﷺ की मुहब्बत में गुलु-हद से आगे बढ़ना (यानि अल्लाह ता`अला के साथ मख़सूस सिफ़त को आप ﷺ के लिए साबित मानने से बचना)

९।
कसरत से आप ﷺ पर दुरूदो सलाम भेजते रेहना।

१०।
अहले बैत और आप ﷺ की आलो अवलाद से मुहब्बत रख्ना।

११।
सहाबा रदी अल्लाहु अन्हुम से मुहब्बत रखना।

१२।
आप के लाए हुवे दीन को फैलाने में अपनी जात से ज्यादा जानो माल लगाना।

📗सुनने आदाब सफा २२ से २४ से माखूज़

و الله اعلم بالصواب

 

⭕आज का सवाल नंबर २६३२⭕

कपडे पहने तो पहले आम तौर पर इज़ार (सलवार) पहले पहनी जाती है, लेकिन एक आलिम से सुना के पहले क़मीस (कुरता) पहननी चाहिए।
क्या यह बात हदीस से साबित है ?

🔵जवाब🔵

حامدا و مصلیا مسلما

जी,
तबरानी की रिवायत में है जिसको अल्लामह इब्ने हजर असकलानी रह. ने सहीह क़रार दिया है।

📕(अल ईसाबह ७/१२०)

अँबिया अलैहिस्सलाम तहबन्द (लुंगी) से पहले कुरता पहनते थे।

अल्लामह मनावी रहमतुल्लाही अलय्हि इस से शरह में लिखते है के अँबिया अलैहिस्सलाम सलवार से पहले क़मीस पहनना पसंद करते थे, और उसको पहले पहनने का एहतेमाम करते थे,

इसलिये के यह पूरे बदन को ढंकता है, और सलवार सिर्फ निचे के हिस्सा को ही ढंकता है।

लिहाज़ा अगर सतर पर किसी की नज़र पड़ने का खतरा न हो तो पहले कुरता पहनना चाहिये।

📗अल मुजमल कबीर २२/८४३

📘फैज़ुल क़दीर २/५३२

उस्ताज़े मुहतरम हज़रत शैख़ तल्हा मन्यार मक्की सुम्मा सुरती दाब. की तहक़ीक़ से माखूज़।

و الله اعلم بالصواب

⭕आज का सवाल नंबर २६५१⭕

मेरे यहाँ बच्चा पैदा हुवा, शरीअत में बच्चा पैदा हो तो क्या करना चाहिए ?

🔵जवाब🔵

حامد ومصلیا و مسلما

१️⃣। बच्चा पैदा हो उसे तहनीक करायी जाए याने घुट्टी दी जाए याने किसी नैक सालेह या बुजुर्ग शख्श से खजूर चबवायी जाए,
और वह खजूर बच्चे के तालु पर चिपका दी जाये, बच्चे के पेट में सब से पहले उस नैक आदमी का लुआब (थूक) वाली ग़िज़ा जाएगी, जिस का असर उस की पूरी ज़िन्दगी पर पडेगा।
इस की शरीअत में बड़ी ऐहमियत है।

आजकल इस सुन्नत पर अमल करने वाले बहुत ही कम लोग हैं।

बाकी कल…..
اِ نْ شَآ ءَ اللّهُ  

📗हदयाह ए खवातीन
📘बहिश्ती ज़ेवर

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

आज का सवाल नंबर – २६६७

गैर मुस्लीम लोगों कि तरफ से यह ऐतिराज़ कीया जाता है के हुज़ुर सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम ने हज़.आइशा रदीयल्लाहु अन्हा से जीन की उम्र सिर्फ 6 सील थी जो बेटी की उम्र है उन्से इस उम्र में निकाह क्युं किया ?

🔵जवाब🔵
حامدا و مصلیا و مسلما

निकाह 6 साल की उम्र हुआ लैकिन रुख्सती(बीदाई) 9 साल की उम्र (गर्म मुल्को में बालीग की- पक्की उम्र वाली होने कि उम्र) में हुई थी,अरब में बडी उम्र वाले का छोटी उम्र वाले से निकाह करना आम था, कोइ तअज्जुब की चीज़  ही नहीं थी इसलीये कुफ्फार और यहुदीयों ने नबी सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम पर बहोत से ऐतिराज़ – इश्काल किये और नबी सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम को (अल्लाह की पनाह ) बुरे अल्काब जैसे कि जादुगर, दिवाना झूठा वगैरह कहा लैकिन आज- कल के काफिरों ने जिन लकब का ईस्तेमाल किया वोह किसी ने नहीं किया, इस कम उम्र की शादी की असल वजह नुबुव्वत और खिलाफत (नबी की जगा संभालने का ओहदा) के दरमीयान तअल्लुक की मज़बुती थी, क्योंकि नबी ए करीम  सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम के बाद खिलाफत का सिलसिला अल्लाह को हज़रत अबुबक्र रदी.से चलाना था और हज़रत आईशा हज़रत अबुबक्र रदीअल्ल्लाहु अन्हु की बेटी थी खिलाफत को नबी के घराने से जोडना मकसुद था , ईसलिये इन कि बेटी से निकाह किया ओर इस्लाम मे क़ायदा है के माँ बाप बचपन में निकाह कराये तो लड़की को बालिग होने के बाद सिर्फ ज़बान से केहकर निकाह तोड़ने का इख़्तियार-इजाज़त होती है हज़रात आइशा रदी.ने उस निकाह को ख़ुशी और फख्र ( गर्व ) के साथ बाकी रखा और पूरी ज़िन्दगी इस पर फख्र करती रही ।
अरब की गर्म (होट) आबोहवा ईन्सानी बदन को बढाने (डेवलपमेन्ट) में ईम्पोर्टन्ट -खास रोल अदा करती है और दुसरी बात येह अल्लाह तआला कुछ लोगों को हाइट-बोडी उम्र और दिमाग (ब्रेइन) पावर एबीलीटी दुसरे लोगों से बढ कर देता है.अल्लाह तो बहोत बडा है अगर वोह किसी बात का हूक्म दे और छोटी लड़की से बडी से बडी उम्र की लडकी का काम लेना चाहे तो वोह काम हो जाता है । और काम लिया भी । औरतो में  सब से ज़्यादा इस्लाम के क़ानून की जाननेवाली मुफ्तिया थी बड़े बडे सहाबा इन से मसअला पूछते थे ।
लेकिन ये सचाई वोह लोग नहीं मानते जिन के दिलों पर मुहर:सील लगा दीया गया है.अल्लाह तआला कुर्आन में इर्शाद फरमाते है के,
“अल्लाह ने इन (कुफ्फार) के दिलों और उन्के कानों पर मुहर:सील लगा दी है और उन्की आँखो पर परदह पड़ गया है (इस्लिये उनकी समज़ में नहीं आता) वोह सख्त अज़ाब के मुस्तहिक (लायक) हैं । (सूरह ऐ बकरह आयत-७)

एक नवजवान ने बताया के आजकल 12 साल की लड़कीया 55 साल के सलमान खान से शादी करने के लिए बेचेन हैं क्या कोई इन लड़कियो पर इश्काल व ऐतराज़ कर सकता है?
و الله اعلم بالصواب
✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.

आज का सवाल नंबर २६६८

हुज़ुर सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम ने ११ निकाह क्युं कीये ?

🔵 जवाब 🔵

एक मर्द के लीये बहोत सी बीवीयाँ रखना इस्लाम से पेहले तकरीबन दुनिया के तमाम मज़हब में जाईज़ था।

हिन्दुस्तान, ईरान, मिसर्, युनान, काबुल वगैरह मूल्को की हर कौम में कसरत से सदीयों की रस्म जारी थी, और उस की फितरी ज़रुरतों से आज भी कोइ इन्कार नहीं कर सकता।

कृष्ण जो हिंदुओं में बडे वाजीबुत्त ताज़िम (आदरणीय) माने जाते है उन्की सैंकडो बीवीयाँ थी,
गूगल पर सर्च कर के देखा तो लिखा है के उन की १६१०८ सोलह हज़ार एक सौ आठ पत्नियाँ थी ।
जो लोग ऐतराज़ करते है वह अपने मज़हब में भी झाँक कर देख ले तो कभी दुसरों के मज़हब के पेश्वा पर ऊंगली नहीं उठाएंगे ।

मनुजी जो हिन्दुओं और आर्यों में सब के नज़दीक पैशवा और बुज़ुर्ग माने जाते है, घर्म शास्ञ में लीखते हैं के:
“अगर एक आदमी की चार  पाँच औरते हों और उन में से एक साहिबे औलाद (बच्चो वाली) हो तो बाकी भी साहिबे औलाद केहलाती है।
📓मनु अध्याय ९ श्लोक १८३)

हुज़ुर सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम ने 11 औरतों से निकाह किया इस्की मस्लीहतें और हिकमतैं है,

१. नबी सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम का हर अमल उम्मते मुस्लीमह के लीये दस्तुर, कानून, सबक की हैसीयत रखता है, इसलीये आप सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम की ज़ीन्दगी का हर पहलु उम्मत के सामने अल्लाह को लाना था और अन्दर की जी़न्दगी के हालात, जैसे की तन्हाई की ईबादत की मशक्कत (बंदगी और मेहनत) और शौक उम्मत के सामने लाना था।

२. मुख्तलीफ उम्र और मुख्तलीफ खानदान और मुख्तलीफ मीजाज़ की औरतों के साथ सादगी से निकाह करने का ईन्सानो को तरीकह मालूम हो, हुज़ुर सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम को मालुम था के लोग खान्दानी रिवाज की वजह से निकाह में बहोत खर्च करेंगे उन्के लीये सादगी के नमुने पैश किये।

३. अैसी मुख्तलीफ औरतों के साथ रेहने का, उन्की तरबीयत करने का, उन्को बरदाश्त करने का, उन्के सामने अख्लाक़ पैश करने का तरीक़ह उम्मत को मालुम हो।

४. घर की चार दिवारी जहां कोइ देखने वाला नहीं होता और ईन्सान अपने बीवी-बच्चो से बेतकल्लुफ होता है फीर भी उन्के साथ हुस्ने सुलुक की पुरी अदायगी का तरीक़ह उम्मत के सामने आए।

५. बीवी के साथ तन्हाई के मसाइल जीसको बीवी ही देख सकती है वोह भी उम्मत तक पहोंचाने वाली कसरत से हो।

६. औरतों की पाकी-नापाकी के मसाईल 👉🏼जीसे गैर महरम (पराइ) औरतें पूछने में शर्म करती हैं बीवीयों के ज़रीये उम्मत तक पहोंच जाए।

७. अैसी औरतों को मदद करने के लीये और उन्के गम दूर करने के लीये जीन्के शौहर (पति) लडाई में शहीद कर दीये गए और वोह बे-सरोसामान रेह गइ तो उन्की दिलदारी और सहारा देने के लीए।

८. मुख्तलीफ कौमो के लोगों की मुसलमानों के साथ लडाई थी और वोह दूश्मनी रखते थे, उन्के साथ अच्छे तअल्लुकात और रीश्तेदीरी काईम हो जाए,
कयुंकी निकाह की वजह से अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम उन्के रिश्तेदार बन जाए और उन्के दुश्मन दोस्त हो जाए, और खुन-खराबा रुक जाए वगैरह।

आप सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम ने सब से पेहला निकाह २५ साल की उम्र में एक ४० साल की बुढी बेवा हज़रत खदीजा रदि. से किया, जो दो शौहरों के निकाह में रेह चुकी थी, दोनो से औलाद भी थी, दो लडकों और तीन लडकीयों की इस तरह ५ बच्चों की माँ थीं. येह निकाह की दर्खवास्त खुद हज़रत खदीजा रदी. की जानिब से थी 👉🏼जीसको बारगाहे नुबुव्वत में रद्द-मना न किया गया और निकाह कर के अपनी उम्र के २५ साल उन्ही के साथ गुज़ारे, और सब औलाद भी उन्से हूइ।

जब उम्रे शरीफ़ ५० साल से भी आगे बढ गइ तब बाकी दस निकाह शरई ज़रुरतों की वजह से मुख्तलीफ हालात में कीए गए,
येह सब की सब बीवीयाँ हज़रत आईशह रदी़. के सिवाय बेवा थी, और बाज़ औलाद वाली थी, और सब औरतें आप सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम के निकाह में खुश थी, और सुखी थी।

इन सब बातों को देखकर कोइ सहीह अक्ल रखने वाला आसानी येह फैसला कर सकता है कि येह तमाम निकाह (अल्लाह की पनाह) नफसानी ख्वाहीशात पुरी करने के लीये नहीं थे।

जब हज़रत खदीजह रदी. का इन्तीकाल हुआ उस वकत लाखो लोग इस्लाम में दाखील हो चुके थे, खूबसुरत से खूबसुरत और तमाम कुंवारी औरतें नबी सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम के निकाह में आने को फखर् और दुनीया आखिरत में कामीयाबी समजती थी, फीर भी आप सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम ने ईस्लामी फायदह के लीये बेवाओं से निकाह किया।

हुज़ुर सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम को जान से मारने की और हर तरह से बदनाम करने की मुशरीकीन और यहुदीयों ने कोशीश की, बहुत से इल्ज़ामात लगाए, नबी सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम को जादुगर, पागल, शाईर कहा गया, लेकिन इन सब निकाहों को देखकर कीसी ने भी नबी सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम को (अल्लाह की पनाह) शहवत परस्त वगैरह इस लाइन के बूरे अल्काब कीसी ने भी नहीं दिये, कयुंके हुज़ुर सल्लल्लाहु अलयही वसल्लम की पाकीज़ह पाकदामनी वाली पुरी ज़ींदगी उन्के सामने थी।

📗 सिरते खातमुल अम्बीया और
📘 सिरते मूस्तफा से माखुज़ हज़्फो ईज़ाफे के साथ

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✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.